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झारखंड: बूचड़खाने बंद, आदिवासियों को खाने के लाले
- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, अनगड़ा (रांची) से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
झारखंड सरकार के राज्य में तमाम बूचड़खानों को बंद करने के फ़ैसले से आदिवासी बड़ी मुश्किल में पड़ गए हैं. राज्य में एक भी लाइसेंसी बूचड़खाना नहीं है. ऐसे में तमाम बूचड़खाने बंद होने से आदिवासियों की अर्थव्यवस्था पर चोट पहुंची है.
वजह ये है कि आदिवासी समुदाय का मुख्य व्यवसाय पशुपालन है लेकिन अब उनके पशु बिक ही नहीं रहे हैं.
रांगामाटी बरवा टोली के हरिलाल बेदिया इन दिनों परेशान हैं. इनकी बड़ी बेटी ने दसवीं का इम्तिहान दिया है.
उसका अब इंटर में एडमिशन होगा. इसके लिए उन्हें पैसों की सख्त ज़रूरत है. इसके अलावा बाकी की पांच और संतानों की स्कूल फ़ीस, किताबें और ड्रेस के लिए भी पैसे चाहिए. लेकिन, इनके पास पैसे ही नहीं है. बूचड़खानों की बंदी इनकी परेशानी की मुख्य वजह है.
आदिवासी करते हैं पशुपालन
वे आदिवासी हैं और पशुपालन उनके घर की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है. उनका गांव राजधानी रांची से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर पहाड़ों के बीच बसा है.
हरिलाल बेदिया ने कहा, "मेरे पास कुल 35 बकरियां हैं. अगर बूचड़खाने खुले होते, तो मेरा एक खस्सी (बकरा) दस हजार रुपए में बिक जाता. छोटी बकरी के बदले भी दो-तीन हज़ार मिल ही जाते. मैं पिछले कई सप्ताह से जोन्हा हाट नहीं गया क्योंकि, वहां अब पशुओं के खरीददार नहीं आ रहे हैं."
जोन्हा में शनिवार को साप्ताहिक हटिया (बाज़ार) लगती है.
कर्ज़ लेकर की शादी
इसी गांव के मगदीश बेदिया ने चार दिन पहले अपने बेटे की शादी की है. उनके पास भी 25 बकरियां हैं. अगर सारी बकरियां-बकरे एक साथ बेच दिए जाएं, तो इन्हें करीब दो लाख रुपये मिल जाएंगे. लेकिन अपने बेटे की शादी की दावत के लिए इन्हें महाजन से कर्ज़ लेना पड़ा.
मगदीश बेदिया ने बताया कि इसके अलावा और कोई चारा नहीं था. घर में इतनी बकरियां होने के बावजूद इनके यहां हुई दावत में शाकाहारी खाना परोसा गया क्योंकि कोई खस्सी मारने वाला नहीं था.
आमतौर पर इनकी दावतों में खस्सी का मांस और हड़िया (खुद से बनायी शराब) परोसा जाता रहा है.
सबकी हालत पतली
सादमा गांव के दुर्गा मुंडा ने 40 बकरियां पाली हैं. उन्हें भी बाहर पढ़ने वाली अपनी बेटी की फीस के लिए चार खस्सी बेचनी थी. वे नहीं बेच पाए. उन्होंने बताया कि खस्सी को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में भी परेशानी है. क्या पता कब कोई आ जाए और जानवर ले जाने के कारण मारपीट करने लगे.
रांगामाटी बरवा टोली के कृष्णा बेदिया की हालत भी ऐसी ही है.
मुर्गों को भी राहत
बूचड़खानों की बंदी के बाद मुर्गों का बिकना भी बंद है. रांची-गेतलसूद मार्ग पर पोल्ट्री फार्म चलाने वाले बुधेश्वर बेदिया ने बीबीसी से कहा, ''माहौल खराब है. मुर्गा बेचे तो फंस जाएंगे. इसलिए, किसी तरह घर का खर्च चला रहे हैं.''
आदिवासी विरोधी सरकार?
मुख्य विपक्षी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा के बजरंग लोहरा सरकार को आदिवासी विरोधी करार देते हैं. वहीं, अनगड़ा के पूर्व प्रमुख और आजसू पार्टी की केंद्रीय समिति के सदस्य राजेंद्र शाही मुंडा ने कहा कि सरकार को बंद बूचड़खानों को शीघ्र खुलवाने की पहल करनी चाहिए.
सिविल सोसायटी चिंतित
चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता और 'खान खनिज और अधिकार' के संपादक जेवियर डायस ने बीबीसी से कहा,''पशुपालन आदिवासियों का परंपरागत पेशा है. खेतीबाड़ी, मजदूरी व पशुपालन कर आदिवासी अपना जीवन चलाते हैं. उनके लिए खस्सी या बकरी एटीएम के समान है. जिससे जब चाहें पैसा मिल सकता है.''
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