REALITY CHECK : कांग्रेस और माओवादियों के बीच रिश्ते के बीजेपी के दावे का सच

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी हिंदी
भारतीय जनता पार्टी के महासचिव राम माधव ने हाल ही में आरोप लगाया है कि 'माओवादियों के शहरी नेटवर्क' को 'कांग्रेस पार्टी का समर्थन' मिल रहा है.
ये बयान राम माधव ने तब दिया जब कई सामाजिक कार्यकर्ताओं को 'माओवादियों के शहरी नेटवर्क' का हिस्सा बताकर देश के विभिन्न इलाकों से गिरफ्तार किया गया.
राम माधव ने कहा कि "इन शहरी माओवादियों को कांग्रेस मदद कर रही है." उन्होंने कांग्रेस पर उन संगठनों की मदद का भी आरोप लगाया है जो ''भारत विरोधी गतिविधियों'' में लिप्त हैं.

इसी बीच भारतीय जनता पार्टी का यह भी कहना है कि उनकी पार्टी के कई नेता माओवादियों के निशाने पर हैं.
भारतीय जनता पार्टी के दावे अपनी जगह, मगर दूसरी तरफ ये भी हक़ीक़त रही है कि माओवादी, कांग्रेस को अपना 'ज़्यादा बड़ा दुश्मन' मानते रहे हैं. कांग्रेस के शासनकाल के दौरान भी नक्सल विरोधी अभियान के बहाने सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी निशाना बनाया गया.
माओवादियों ने सत्तर के दशक की शुरुआत में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी क़स्बे से मज़दूर, किसानों और भूमिहीनों के अधिकार और सामंतवादियों के ख़िलाफ़ 'संघर्ष' शुरू किया था. फिर जो कुछ हुआ वो इतिहास के पन्नों में दर्ज होता चला गया.
सत्तर के ही शुरुआत में ही पश्चिम बंगाल में सिद्धार्थ शंकर रे के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए अप्रत्याशित तरीके से बल का प्रयोग किया, जिसमें कई लोग मारे गए थे.

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नक्सलबाड़ी का आंदोलन कुचल दिया गया
केंद्र और राज्य की कांग्रेसी सरकारों को लगा कि उन्होंने इस आंदोलन को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया है. मगर उसी दौरान देश के अलग अलग हिस्सों में मज़दूरों और किसानों के संघर्ष शुरू होने लगे.
कांग्रेस शासित अविभाजित बिहार और अविभाजित आंध्र प्रदेश में किसान, मज़दूर और बंधुआ मज़दूर गोलबंद होने लगे. भूमि सुधार की मांग और पूंजीपतियों और सामंतवादियों के ख़िलाफ़ अलग-अलग संगठन इन संघर्षों को नेतृत्व देने लगे. इसी दौरान माओवादी भी इन संगठनों से जुड़ गए.
जहां आंध्र प्रदेश में भाकपा-माले (पीपल्स वार ग्रुप) ने संघर्ष शुरू किया, वहीं अविभाजित बिहार में संगठन काम करने लगे, जिनमें भाकपा-माले (पार्टी यूनिटी) और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) के अलावा भी कई संगठन थे जो लोगों को लामबंद कर रहे थे.
ये संगठन भी चीन के माओत्से तुंग के तरीकों को ही अपना आदर्श मानने लगे और उसी तरीके से अपने संघर्ष को और भी ज़्यादा सघन किया. कुछ संगठन वर्चस्व को लेकर आपस में भी लड़ रहे थे.
इन प्रदेशों में कांग्रेस की सरकारें थीं और इन आंदोलनों के दौरान, सामंतवादियों की निजी सेनाओं, सत्ता और आंदोलनकारियों के बीच ख़ूनी संघर्ष होने लगे. सैकड़ों लोग इस संघर्ष में मारे गए. आंदोलनकारी संगठनों के लिए कांग्रेस 'सबसे बड़ी शत्रु' बनी रही चूँकि सत्ता उसी के हाथों में थी.
जब भूमि रक्त-रंजित होनी शुरू हुई तो शांति वार्ताओं के कई प्रयास भी हुए.
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वार्ता और फिर सरकार की कार्रवाई
वर्ष 2004 के अक्तूबर महीने की 20 तारीख़ को आंध्र प्रदेश के तत्कालीन कांग्रेस के मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी ने तीन महीनों के संघर्ष विराम की घोषणा की और 'पीपल्स वार ग्रुप' के प्रतिनिधियों को वार्ता का न्योता दिया.
आंध्र के माओवादी नेता इसके पक्ष में नहीं थे. इस वार्ता की मध्यस्थता के लिए एसआर शंकर, जी कल्याण राव, क्रांतिकारी कवि ग़दर, के जी कन्नाबीरन और पत्रकार पी वेंकटेश राव को चुना गया.
पहली बार ऐसा हुआ कि आंध्र प्रदेश के नल्ला मल्ला के जंगलों से बड़े माओवादी नेता अपने हथियार लेकर वार्ता के लिए निकले. वार्ता का कोई परिणाम सामने नहीं आया.
माओवादियों का आरोप है कि शांति वार्ता के बाद जब उनके नेता लौट रहे थे तभी पुलिस ने घात लगाकर उनपर हमला कर दिया. फिर आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की सरकार ने माओवादियों के ख़िलाफ़ ज़ोरदार अभियान शुरू किया. इस दौरान उनके ठिकानों को ध्वस्त भी किया गया और नेताओं को मुठभेड़ में मारा भी गया.
आंध्र प्रदेश के नल्ला-मल्ला के जंगलों से भाग कर माओवादी छापामार अविभाजित मध्य प्रदेश के बस्तर के इलाक़े में शरण लेने घुसे. बस्तर में पहले से ही सीपीआई-माले और एमसीसी के लोग काम कर रहे थे.
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मनमोहन सिंह का वो बयान
इसी बीच सीपीआई-माले (पीपल्स वॉर ग्रुप) और बिहार में सीपीआई-माले (पार्टी यूनिटी) का विलय हो गया. फिर एमसीसी और पीडब्लूजी का भी विलय हुआ और एक नए संगठन- भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का गठन हुआ जिसके बाद राज्य और माओवादियों के बीच संघर्ष पहले से भी ज़्यादा बड़ा हो गया.
छत्तीसगढ़ कांग्रेस के कद्दावर नेता महेंद्र कर्मा ने इसी दौरान बस्तर के इलाक़े में माओवादियों के ख़िलाफ़ 'सलवा जुडूम' नाम से अभियान शुरू किया. इस अभियान के दौरान हथियारबंद स्थानीय युवकों को माओवादियों से निपटने की खुली छूट मिल गई. हालात और भी ज़्यादा बिगड़ने लगे और संघर्ष पहले से भी ज़्यादा सघन होता चला गया.
केंद्र में कांग्रेस ने सत्ता संभाल ली तो पी चिदंबरम देश के गृह मंत्री बने.
माओवादियों ने समय-समय पर पर्चे जारी कर आरोप लगाया कि मंत्री बनने से पहले चिदंबरम एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के 'बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स' में थे. ये बहुराष्ट्रीय कंपनी और इसके जैसी दूसरी कंपनियां, लौह अयस्क के खनन और विद्युत् परियोजनाओं का विस्तार मध्य और पूर्वी भारत के कई इलाक़ों में कर रहीं थीं. माओवादी इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हथियारबंद विरोध कर रहे थे.


फिर बतौर गृह मंत्री पी चिदंबरम ने देश के माओवाद प्रभावित इलाकों में 'ऑपरेशन ग्रीन हंट' नाम का अभियान शुरू किया, जिसके तहत केंद्रीय अर्ध सैनिक बलों की बड़ी टुकड़ियों ने माओवादियों के ठिकानों पर हमले शुरू किए और माओवादी छापामारों को मुठभेड़ में मारा.
पहली बार कांग्रेस की केंद्र सरकार ने माओवादियों के ख़िलाफ़ वायु सेना का इस्तेमाल करने की पेशकश की. इस पेशकश पर काफी बहस हुई. वायु सेना का इस्तेमाल भी हुआ. लेकिन सरकार ने दावा किया कि वायु सेना का इस्तेमाल सिर्फ सुरक्षा बल के जवानों को पहुंचाने और घायल जवानों को इलाज के लिए ले जाने के लिए किया गया.
माओवादियों की प्रेस विज्ञप्तियों और पर्चों में चिदंबरम और कांग्रेस को बड़ा दुश्मन बताया गया.
'ऑपरेशन ग्रीन हंट' की आलोचनाओं के बीच तत्कालीन कांग्रेस के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माओवादियों को "देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा" कह डाला.

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पूर्व गृह मंत्री की हत्या
जवाबी कार्रवाई में माओवादियों ने भी कांग्रेस के नेताओं को अपने निशाने पर लेना शुरू किया और उनपर हमले भी तेज़ कर दिए. छत्तीसगढ़ में तत्कालीन कांग्रेस के नेता अजित जोगी और महेंद्र कर्मा पर कई हमले हुए.
वर्ष 2008 में छत्तीसगढ़ में हुए विधानसभा के चुनावों में बस्तर के इलाक़े की 12 सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों को करारी हार का सामना करना पड़ा. ये सभी सीटें भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों ने जीतीं. उसी तरह झारखंड के माओवाद प्रभावित इलाकों में भी भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों ने विधानसभा के चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया.
जानकार मानते हैं कि कांग्रेस के ख़िलाफ़ आक्रोश की वजह से ही माओवादियों ने लोगों को कांग्रेसी उम्मीदवारों को वोट डालने को लेकर धमकियां देनी शुरू कर दीं.
कांग्रेस के ख़िलाफ़ माओवादियों का सबसे बड़ा हमला छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग की जीरम घाटी में वर्ष 2013 की 25 मई को हुआ, जिसमें कांग्रेस के बड़े नेता और भारत के गृह मंत्री रह चुके विद्याचरण शुक्ल सहित 30 नेताओं की मौत हुई. मरने वालों में कांग्रेस के नेता महेंद्र कर्मा और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष नंद कुमार पटेल भी शामिल थे.
क्योंकि केंद्र में ज़्यादातर कांग्रेस की सरकारें रही हैं इसलिए माओवादियों के लिए कांग्रेस बड़ी दुश्मन बनी रही.
माओवादियों का आरोप रहा है कि उनकी सेंट्रल कमेटी के कई नेताओं को कांग्रेसी सरकारों ने या तो मुठभेड़ों में मारा है या फिर फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में.
माओवादियों का यह भी आरोप है कि शांति-वार्ता की पहल के लिए बस्तर जा रहे उनकी सेंट्रल कमेटी के वरिष्ठ सदस्य और संगठन के प्रवक्ता चेरुकुरी राजकुमार उर्फ़ 'आज़ाद' को भी 'फ़र्ज़ी मुठभेड़' में मारा गया.
ये बात 2010 की है जब केंद्र में कांग्रेस की ही सरकार थी.
जहाँ तक बात सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की बात है, तो गिरफ्तार किए गए कार्यकर्ताओं में से एक वरवर राव कांग्रेस के शासनकाल में भी लंबे अरसे तक जेल में रहे हैं.


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