दाभोलकर, गौरी लंकेश हत्या और नालासोपारा मामलों में उठे नए सवाल

प्रतीकात्मक तस्वीर

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, प्रतीकात्मक तस्वीर
    • Author, मयूरेश कोण्णूर
    • पदनाम, संवाददाता, बीबीसी मराठी

पिछले एक पखवाड़े में सीबीआई और महाराष्ट्र एटीएस ने चरमपंथी गतिविधियों में कथित रूप से शामिल रहने के आरोप में आधा दर्जन से ज़्यादा युवकों को गिरफ़्तार किया है.

ये सभी अतीत में कभी न कभी धुर दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों से जुड़े रहे हैं. कार्रवाई अभी जारी है और जांच एजेंसियां ये माथापच्ची कर रही हैं कि ये किसी संगठन के इशारे पर काम कर रहे थे या फिर इन लोगों ने अपने विचारों वाले लोगों का नया समूह तैयार कर लिया था. और अगर ऐसा कोई समूह है तो उसका मुखिया कौन है? ये और ऐसे कई सवाल जांच एजेंसियों के सामने हैं.

सीबीआई और एटीएस के जासूस यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि कट्टर हिंदुत्ववादी विचारधारा के अलावा भी क्या और कोई बात है, जो अलग-अलग मामलों में महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों से गिरफ़्तार किए गए इन युवकों को आपस में जोड़ती है.

10 अगस्त को मुंबई के नालासोपारा में मारे गए छापे में देसी बम, पिस्तौलों और अन्य विस्फोटक सामग्री का ज़खीरा मिलने के सिलसिले में एटीएस ने अब तक चार लोगों को गिरफ्तार किया है. मामले में मुख्य अभियुक्त वैभव राउत मुंबई के पास नालासोपारा इलाक़े में हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता और गौरक्षक के तौर पर पहचाने जाते हैं.

2015 में उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर 'हिंदू गोवंश रक्षा समिति' नाम से संगठन बनाया था ताकि गायों को बूचड़खाने में ले जाने से रोका जा सके. वह कई बार 'सनातन' और 'हिंदू जनजागृति समिति' जैसे संगठनों के साथ मंच साझा कर चुके हैं.

इन संगठनों पर धुर दक्षिणपंथी प्रोपेगैंडा के कारण हमेशा से नज़र रही है और इनके सदस्यों पर पहले भी आतंकवादी गतिविधियों के आरोप लग चुके हैं. राउत पहले प्रमोद मुतालिक की "श्रीराम सेने" से भी जुड़े रहे हैं, जो 2009 में मंगलुरु में पब पर हमले के लिए सुर्ख़ियों में रहा है.

वैभव राऊत

इमेज स्रोत, SANATAN SANSTHA

इमेज कैप्शन, वैभव राउत, सुधना गोंडलेकर

यूट्यूब पर उपलब्ध वीडियो में वैभव राउत एक ऑनलाइन डिबेट शो में शामिल होते समय ख़ुद को श्रीराम सेने का प्रतिनिधि बता रहे हैं.

नालासोपारा इलाके में राउत की पहचान एक रियल एस्टेट एजेंट के तौर पर है जो अक्सर गौ रक्षा रैलियों का आयोजन करते हैं. हमने उनके बचपन के दोस्त हर्षद राउत से बात की.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "हम सभी मांसाहारी हैं, लेकिन वैभव पूरी तरह शाकाहारी हो गए हैं. वो हमसे अक्सर पूछते थे कि दूसरे जानवारों की जान लेकर आपको क्या मिलेगा. फिर उनके जैसा आदमी कैसे इंसानों को मारने के बारे में सोच सकता है? मैंने गोरक्षा के लिए आयोजित की गई रैलियों में हिस्सा लिया है. वह वैलेंटाइन डे को 'मातृ-पितृ दिवस' के रूप में मनाया करते थे."

'सनातन' के प्रवक्ता चेतन राजहंस बताते हैं, "वैभव राउत की पहचान मुंबई में गौ रक्षा के लिए काम करने वाले हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता की है." हिंदू जनजागृति समिति के सुनील घनवट ने भी राउत से कोई रिश्ता होने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि वह कभी उनके संगठन का हिस्सा नहीं रहे.

शिवसेना के पूर्व पार्षद भी अभियुक्त

नालासोपारा विस्फोटक मामले की जांच के दौरान एटीएस ने मराठवाड़ा के जालना से शिवसेना के पूर्व पार्षद श्रीकांत पांगारकर को भी गिरफ्तार किया. ऐसा आरोप है कि इस मामले में अभियुक्त जो भी योजना बना रहे थे, उसके लिए आर्थिक मदद मुहैया करवाने की जिम्मेदारी पांगारकर को दी गई थी.

पांगारकर 2001 से 2011 के बीच दो बार जालना म्युनिसिपल काउंसिल के सदस्य चुने गए थे. वह पिछले दो महीनों से औरंगाबाद में रह रहे हैं.

हमने पांगारकर के बचपन के दोस्त और स्थानीय पत्रकार महेश बुलगे से बात की. महेश ने बताया, "उनके पिता बीजेपी में सक्रिय थे, लेकिन श्रीकांत शुरू से ही कट्टर हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता थे. इसीलिए उन्होंने शिवसेना को चुना. वह दो बार पार्षद चुने गए, 2011 में उन्हें टिकट नहीं मिला तो उन्होंने अपनी पत्नी को निर्दलीय चुनाव लड़ाया लेकिन वह हार गईं."

प्रतीकात्मक तस्वीर

इमेज स्रोत, BBC/PUNEET BARNALA

श्रीकांत के भाई अशोक पांगारकर जालना से भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा पार्षद हैं. वह कहते हैं कि श्रीकांत अभी भी शिवसेना के लिए काम कर रहे थे.

उन्होंने बताया, "वह हिंदू संस्कृति को बचाने के लिए काम कर रहे थे. अगर कोई हिंदू लड़की किसी अन्य धर्म में शादी करती थी तो वह उसे वापस लाते थे. वह रक्तदान शिविर भी लगाते थे. हम कैसे कह सकते हैं कि वह राजनीति से दूर हो गए थे? 2014 में अर्जुन खोतकर को जिताने के लिए उन्होंने शिवसेना के लिए काम किया था."

मगर खोतकर, जो अभी महाराष्ट्र में बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री हैं, कहते हैं कि मांगारकर कई सालों से शिवसेना के लिए काम नहीं कर रहे.

उन्होंने कहा, "जब उन्हें 2011 में पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो पार्टी के साथ उनका रिश्ता ख़त्म हो गया. बहुत लोग चुनाव के दौरान काम करते हैं. आप नहीं बता सकते कि वे पार्टी के लिए काम कर रहे हैं या नहीं. मुझे नहीं पता कि शिवसेना के बाद वह किसी और संगठन के साथ काम कर रहे थे."

संभाजी भिडे के संगठन से जुड़े रहे गोंधलेकर

नालासोपारा केस में पुणे से सुधन्वा गोंधलेकर की भी गिरफ्तारी हुई है. गोंधलेकर पश्चिमी महाराष्ट्र के सतारा के हैं लेकिन पिछले कुछ सालों से पुणे में रह रहे थे.

वह एक समय 'शिव प्रतिष्ठान' के सदस्य थे. यह संभाजी भिडे का संगठन है, जिनका नाम भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में सामने आया था. लेकिन 'शिव प्रतिष्ठान' गोंधलेकर के साथ कोई रिश्ता होने से इनकार करता है.

शिव प्रतिष्ठान के प्रवक्ता नितीन चौगुले कहते हैं, "तीन चार साल पहले तक सतारा में हमारे कार्यक्रमों में वह हिस्सा लेते थे. उन्हें कोई ज़िम्मेदारी नहीं दी गई थी. फिर अचानक वह संगठन से चले गए. हमें लगा कि वह कारोबार के सिलसिले में पुणे चले गए हैं. उनके साथ वहां कोई संपर्क नहीं हुआ. हमें भरोसा नहीं होता कि ऐसी पारिवारिक पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों में शामिल है."

सनातन संस्था के फेसबुक पेज ली गई एक तस्वीर

इमेज स्रोत, FACEBOOK/SANATAN SANSTHA

क्या तीनों संपर्क में थे?

जांच एजेसियों का दावा है कि एक समय शिव प्रतिष्ठान से जुड़े रहे सुधन्वा गोंधलेकर, शिवसेना से जुड़े रहे श्रीकांत पांगारकर और 'सनातन' जैसी संस्थाओं के साथ मंच साझा कर रहे वैभव राउत एक-दूसरे के संपर्क में थे. जांच एजेंसियां जिस सवाल का जवाब ढूंढने में जुटी हैं, वो ये हैं कि ये लोग किसी संगठन की तरफ़ से काम कर रहे थे या फिर उन्होंने अपना ही एक अलग समूह बना लिया था.

इस मामले में हुई ताज़ा प्रगति में चौंकाने वाली बात सामने आई है. गौरी लंकेश हत्या मामले के एक अभियुक्त ने सचिन अंदुरे को पिस्तौल दी थी. अंदुरे नरेंद्र दाभोलकर की हत्या मामले में अभियुक्त हैं और कथित तौर पर उन्होंने ही दाभोलकर पर गोली चलाई थी.

अंदुरे का नाम नालासोपारा मामले की जांच के दौरान भी सामने आया था और इस समय वह सीबीआई की हिरासत में हैं. ऐसे में फिर से सवाल उठता है कि अगर दाभोलकर और लंकेश के कथित हत्यारे कहीं एक-दूसरे के संपर्क में तो नहीं थे और अगर ऐसा था वो संपर्क में आए कैसे?

जब बीबीसी ने अंदुरे के वकील से संपर्क किया तो उन्होंने अंदुरे के इस सब में शामिल होने की बात से इनकार किया. वकील प्रकाश सालशिंगीकर ने कहा, "उन्होंने सात दिन पूछताछ की मगर कुछ नहीं मिला. अपनी नाकामी से मीडिया और समाज का ध्यान हटाने के लिए उन्होंने ये थ्योरी पेश की है."

नरेंद्र दाभोलकर

इमेज स्रोत, FACEBOOK/NARENDRA DABHOLKAR

इमेज कैप्शन, नरेंद्र दाभोलकर

सीबीआई ने पुणे की अदालत को बताया है कि वह शरद कलासकर की हिरासत चाहती है. कलासकर इन समय नालासोपारा मामले में एटीएस की हिरासत में हैं. दावा किया जा रहा है कि वह दाभोलकर हत्याकांड में अंदुरे के साथ शामिल दूसरे शूटर थे.

क्या किसी ने इन्हें मिलवाया था?

दाभोलकर हत्याकांड, लंकेश हत्याकांड और नालासोपारा मामले के ये अभियुक्त राज्य के अलग-अलग हिस्सों से पकड़े गए हैं. अगर वे आपस में संपर्क में थे तो फिर सवाल उभरता है कि वे एक-दूसरे के सपंर्क में कैसे आए? कौन उन्हें साथ लेकर आया?

महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिदेशक जयंत उमरानिकर ने कहा, "कौन किस संगठन से संबंध रखता है, अभी इस सवाल का कोई मतलब नहीं है. अहम बात ये है कि इन अभियुक्तों की सोच क्या है, उनकी अपनी विचारधारा क्या है और उन्होंने एकसाथ साज़िश रची तो नहीं. जब तक जांच में इन सवालों के जवाब नहीं ढूंढे जाते तब तक हम यह पता नहीं लगा सकते कि इनके पीछे कौन है. अगर उन्होंने मिलकर साज़िश रची है तो संभव है कि उनकी विचारधारा एक जैसी हो. मगर जांच में यह साबित करना होगा कि उनका इरादा एक था और उन्होंने मिलकर षडयंत्र रचा. इसमें किसी संगठन की भूमिका का पता लगाना है तो हमें एजेंसियों को जांच करने के लिए और समय देना होगा."

उमरानिकर आगे कहते हैं, "मगर मुझे इसमें एक साफ़ पैटर्न नजर आता है. हिंदू युवकों के दिमाग़ में इस तरह का भाव भरा जा रहा है कि उनका धर्म ख़तरे में है, अन्य लोगों के साथ उदार वामपंथी भी इसपर हमला कर रहे हैं. जो एक जैसी भावनाएं रखते हैं वे एकसाथ आते हैं और फिर अपराधों को अंजाम दिया जा रहा है. कुछ पार्टियां और संगठन इस भाव को बढ़ावा दे रहे हैं."

प्रतीकात्मक तस्वीर

इमेज स्रोत, Getty Images

'एक ही विचारधारा से संबंध'

वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश बल कहते हैं कि ये सभी अभियुक्त जो पकड़े जा रहे हैं वे 'हिंदुत्ववादी परिवार' से संबंध रखते हैं, ऐसे में इन संगठनों का इन लोगों से कोई रिश्ता न होने का दावा करना कोई महत्व नहीं रखता.

बल कहते हैं, "महात्मा गांधी की हत्या के बाद से आरएसएस हमेशा कहता रहा है कि गोडसे का उनसे कोई रिश्ता नहीं. इस तरह का खंडन दरअसल रणनीति का हिस्सा होता है. इस मामले में भी संगठनों का अभियुक्तों से कोई रिश्ता न होने का दावा करना इसी तरह की रणनीति का हिस्सा है. ये लोग पूर्व में भले ही अलग-अलग संगठनों से जुड़े थे, मगर वे एक व्यापक हिंदुत्ववादी परिवार से संबंध रखते हैं."

वह आगे कहते हैं, "सरदार पटेल ने श्यामाप्रसाद मुखर्जी को एक पत्र में लिखा था कि 'यह तो अदालत तय करेगी कि गांधी की हत्या में सावरकर शामिल थे या नहीं. मगर मेरे मन में इस बात को लेकर कोई शंका नहीं है कि हिंदुत्ववादी संगठनों ने जिस तरह का वातावरण बनाया है, गांधी की हत्या उसी का परिणाम है.' अगर हम अपने देश में पिछले कुछ सालों का वातावरण देखें तो स्पष्ट है कि हिंदुत्ववादी संगठन नफ़रत भरा माहौल बना रहे हैं."

जब बीबीसी ने महाराष्ट्र एटीएस के प्रमुख अतुलचंद्र कुलकर्णी से संपर्क किया, उन्होंने यह कहते हुए कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि अभी मामले की जांच चल रही है.

bbchindi.com
Presentational grey line

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)