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नज़रियाः मुसलमानों और दूसरे मजहबों के पिछड़ों को साथ गिनने वाले मंडल
- Author, अरविंद मोहन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल. इस नाम को उचारिये तो ख़ास चीज़ ध्यान में नहीं आएगी. पुराने लोगों से बात करेंगे तो एक ऐसे नेता का ज़िक्र आएगा जो कुछ समय के लिए जोड़-तोड़ से बिहार का मुख्यमंत्री बना और जिसने दलबदल की बदनामी वाले दौर में भी कई बार पार्टियाँ बदलीं.
गूगल बाबा भी यही चीज़ें बताते हैं उनके बारे में.
लेकिन जैसे ही सिर्फ़ मंडल शब्द उचारेंगे यह समझ आ जाएगा कि मंत्रों की ताक़त क्या होती है.
यह शब्द सुनाई दे और आपके या हर सुनने वाले के मन पर कोई प्रतिक्रिया न हो यह असंभव है. मंडल शब्द से किसके अंदर क्या प्रतिक्रिया होगी यह भी पहले से कही जा सकती है- ख़ासकर तब जब सुनने वाले की सामाजिक पृष्ठभूमि का पता हो.
जी हाँ, बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल ही मंडल वाले असली आदमी हैं और आज उनकी 100वीं जयंती है.
मंडल के इतना प्रभावी और असरकारी बनने के बावजूद बिन्देश्वरी प्रसाद अर्थात बीपी मंडल अगर अनजान बने हुए हैं तो इसके कारणों में एक उनका पिछड़े वर्ग से आना और मीडिया में अगड़ों का बाहुल्य भी है.
पिछड़ों की राजनीति
शायद कुछ हिस्सा उनकी असंगत राजनीति का भी होगा पर आज से 50 साल पहले किसी पिछड़े/यादव नेता की मुख्यमंत्री बनने की महत्वकांक्षा भी अपने आप में किसी असंगति से कम नहीं होगी.
तब तो बिहार विधानसभा में बाजाप्ता उनको 'ग्वार' कहा गया और एक प्राकृतिक आपदा को उनके मुख्यमंत्री बनने का परिणाम बताया गया.
25 अगस्त 1918 को एक ज़मींदार परिवार में जन्मे बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल को राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता का गुण तो संस्कार में ही मिला था, लेकिन तब उन्होंने 'पिछड़ों' की राजनीति भर नहीं की थी.
उनके पिता रासबिहारी मंडल ज़रूर 1924 में ही बिहार-उड़ीसा विधान परिषद में जाने के साथ यादवों के शुद्धि (जनेऊ पहनने) आंदोलन और त्रिवेणी संघ आंदोलनों से जुड़े थे.
पिछड़े पावें सौ में साठ
बीपी मंडल को भी दरभंगा की स्कूली पढ़ाई के दौरान और अन्य अवसरों पर पिछड़ा होने का दंश झेलना पड़ा था. पर वे कांग्रेस और आज़ादी को ही सभी बीमारियों की दवा मानते रहे.
पर 1952 की सरकार में जगह न पाने और 1957 का चुनाव हारने के बाद उन्हेँ अहसास होता गया कि कांग्रेस में उनका और पिछड़ों का कोई भविष्य नहीं है.
तब तक बिहार में सोशलिस्टों ने 'पिछड़े पावें सौ में साठ' के नारे के साथ पिछड़ी जातियों में नई चेतना पैदा की थी. बीपी ने उधर का रुख़ किया. वे पीएसपी के संसदीय बोर्ड के प्रमुख हुए. 1967 में पहली बार सोशलिस्ट लोग सरकार बनवाने की स्थिति में आए.
बीपी तब सांसद थे, लेकिन पहले गठबंधन सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बने, फिर सतीश प्रसाद सिन्हा को तीन दिन के लिए मुख्यमंत्री बनवाकर ख़ुद को विधान परिषद में मनोनीत कराने और फिर मुख्यमंत्री बनने का जो चर्चित खेल हुआ उसके केंद्र में वही थे.
पिछड़ा वर्ग आयोग
ज़ाहिर तौर पर ऐसी सरकारें ज़्यादा लम्बा नहीं चलतीं पर बीपी मंडल मुख्यमंत्री बन कर भी यश से ज़्यादा अपयश बटोर गए.
लेकिन 1977 के चुनाव में फिर से सांसद बनकर जब वो केन्द्र में मंत्री न बन पाए तभी उन्होंने भारतीय राजनीति और समाज के लिए एक बड़ी पारी खेली.
प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उन्हें दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग का अध्यक्ष बनाया. एक दलित और चार ओबीसी सदस्यों वाले इस आयोग को पिछड़ों के सामाजिक उत्थान के लिए तरीक़ा सुझाना था और इसके सामने पहले पिछड़ा वर्ग आयोग की असफलता का रिकॉर्ड भी था.
काका कालेलकर की अध्यक्षता वाला पहला आयोग कुछ भी ठोस उपाय बताने में असफल रहा था और ख़ुद अध्यक्ष ने यह असहमति पत्र जोड़ा था कि आरक्षण जैसे फ़ैसले से समाज में जितना लाभ होगा उससे ज़्यादा नुक़सान जातिवाद फ़ैलने से होगा.
मंडल आयोग के आने से क्या हुआ?
पर मंडल आयोग ने आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक पिछड़ेपन के ऐसे वैज्ञानिक आधार तय किए और इतने साफ़ सर्वेक्षणों से उसकी पुष्टि की, समाज के जानकार लोगों की राय समेटी और एक साल के तय समय से ज़्यादा वक्त लेने के बावजूद 52 फ़ीसदी पिछड़ों के लिए सरकारी नौकरियों में 27 फ़ीसदी आरक्षण का वह मुख्य सुझाव दिया जिसके ख़िलाफ़ कोई तर्क-कुतर्क नहीं चला.
इस रिपोर्ट में मुसलमानों और अन्य मजहब के पिछड़ों को साथ गिनने का फ़ैसला शामिल था जो ऐतिहासिक है.
अब यह अलग बात है कि यह रिपोर्ट भी बाद की कांग्रेसी सरकारों के समय धूल ही फांकती रही. पर जब अगस्त 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बीपी मंडल की मौत के आठ साल बाद इस रिपोर्ट को लागू किया तो भारत के राजनीतिक-सामाजिक जीवन में सचमुच में भूचाल आ गया.
पहली लड़ाई तो सड़कों पर दिखी, लेकिन ज़ल्दी ही विधानसभाओं, संसद और सरकारों का स्वरूप बदल गया. जितना बदलाव नौकरियों और दाखिले में आरक्षण की व्यवस्था लागू होने से नहीं हुआ उतना राजनीतिक और सामाजिक जीवन में दिखने लगा.
आज़ाद भारत के बड़े निर्णयों में से एक
जो दल जाति न मानने का दावा करते थे उन्हें भी अपने नेतृत्व में पिछड़ों को शामिल करना पड़ा.
विशेष अवसर के जिस सिद्धांत की बात पहले समाजवादी करते थे, मंडल के चलते सबकी मजबूरी बन गया.
अब यह अलग बात है कि मंडल से उभरा नया नेतृत्व कई मायनों में कमज़ोर, मतलबी और परिवारवादी साबित हुआ और इस मंत्र से उभरी सामाजिक ऊर्जा को सही दिशा देने में कामयाब नहीं हुआ.
इसी के चलते दूसरी और प्रतिगामी शक्तियों का जोर बढ़ा. पर इसमें न आयोग के कर्ता-धर्ता बीपी मंडल का दोष है न उनकी रिपोर्ट से निकले मंडल मंत्र का.
राजनीति में पिछड़ों के लिये ऊंची कुर्सी की लड़ाई को किसी अंजाम तक ले जाने में बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल की अपनी राजनीति चाहे जितनी दूर तक गई हो मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद वह बहुत दूर तक गई है. इसे आज़ाद भारत के सबसे बड़े निर्णयों में एक माना जाए तो कोई हर्ज़ नहीं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं. लेखक गांधी के चम्पारण सत्याग्रह पर 'चम्पारण प्रयोग' नाम से किताब लिख चुके हैं.)
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