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अनाथों को आरक्षण दिलाने वाली अम्रुता करावंदे
- Author, सिन्धुवासिनी, बीबीसी संवाददाता
- पदनाम, मनस्विनी प्रभुणे नायक, बीबीसी मराठी के लिए
आज से तकरीबन 20 साल पहले एक पिता अपनी नन्ही सी बच्ची को गोवा के एक अनाथालय में छोड़ आया था. किन हालात में उसने ये फ़ैसला लिया, उसकी क्या मजबूरियां थीं, कोई नहीं जानता.
आज हज़ारों-लाखों लोग अनाथालय में पली-बढ़ी इस लड़की का शुक्रिया अदा कर रहे हैं. वो इसलिए क्योंकि 23 साल की अम्रुता करवंदे ने अनाथों के हक़ की एक बड़ी लड़ाई जीत ली है.
अमृता की सालों की मेहनत और संघर्ष का ही नतीज़ा है कि महाराष्ट्र में सरकारी नौकरियों में अनाथों के लिए एक फ़ीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया है.
एसओएस चिल्ड्रेन्स विलेजेज नाम की एक गैर सरकारी संस्था के आंकड़ों के मुताबिक भारत में तकरीबन दो करो़ड़ अनाथ बच्चे हैं.
अम्रुता की कहानी
वो बताती हैं, "जब पापा ने मुझे अनाथालय को सौंपा था, उस वक़्त मेरी उम्र तकरीबन दो-तीन साल रही होगी. उन्होंने रिजस्टर में मेरा नाम 'अम्रुता करवंदे' लिखा था. यहीं से मुझे अपना नाम पता चला. वैसे तो मुझे उनका चेहरा भी याद नहीं है."
अम्रुता की कहानी पहली बार सुनने में किसी फ़िल्म सी लगती है लेकिन सच्चाई तो ये है कि उन्होंने फ़िल्मी लगने वाली इस ज़िंदगी में असली दुख और तकलीफ़ें झेली हैं.
दोस्तों के बीच अमू नाम से जानी जाने वाली अम्रुता ने बीबीसी से बातचीत में बताया, कि वो 18 साल की उम्र तक गोवा के अनाथालय में ही रहीं.
जब अनाथालय छोड़ना पड़ा
वो याद करती हैं, "वहां मेरे जैसी बहुत सी लड़कियां थीं. अनाथालय में हम ही एक-दूसरे के दुख-सुख के साथी थे, हम ही एक दूसरे के परिवार. कभी-कभी माता-पिता की कमी ज़रूर महसूस होती थी, लेकिन हालात ने मुझे उम्र से ज्यादा समझदार बना दिया था."
अम्रुता पढ़ाई में अच्छी थीं और साइंस पढ़कर डॉक्टर बनना चाहती थीं, लेकिन अभी उनकी उम्र 18 साल हुई थी कि उन्हें अनाथालय छोड़ने को कह दिया गया.
उन्होंने बताया, "18 साल के होते ही आप बालिग़ हो जाते हैं और माना लिया जाता है कि आप अपना ख़याल ख़ुद रख सकते हैं. अनाथालय में ज्यादातर लड़कियों की शादी करा दी गई. मेरे लिए भी एक लड़का ढूंढा गया लेकिन मैं शादी नहीं करना चाहती थी."
चूंकि अम्रुता आगे पढ़ाई करना चाहती थीं इसलिए वो अकेले ही पुणे चली गईं. पुणे पहुंचकर उन्होंने पहली रात रेलवे स्टेशन पर बताई.
वो याद करती हैं, "मैं बहुत डरी हुई थी, समझ में नहीं आ रहा था कहां जाऊं, क्या करूं. हिम्मत टूट सी रही थी. एक बार तो मन में आया कि ट्रेन के सामने कूद जाऊं लेकिन फिर किसी तरह ख़ुद को संभाला."
कुछ दिनों तक वो घरों में, किराने की दुकान पर और अस्पतालों में काम करके कुछ पैसे जोड़ती रहीं और फिर किसी तरह एक दोस्त की मदद से पुणे के पास अहमदनगर के एक कॉलेज में एडमिशन लिया.
मुश्किलों भरी ज़िंदगी
ग्रैजुएशन में अम्रुता इवनिंग क्लास में जातीं और दिन में काम करतीं. इस दौरान उन्हें रहने के लिए एक सरकारी हॉस्टल मिल गया था लेकिन मुश्किलें कम नहीं हुई थीं. कभी एक बार का खाना खाकर तो कभी दोस्तों के टिफ़िन से खाना खाकर उन्होंने ग्रैजुएशन पूरी की.
ग्रैजुएशन के बाद अम्रुता ने महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (एमपीएससी) की परीक्षा दी, लेकिन नतीजे आने पर एक बार फिर कामयाबी में उनका अनाथ होना आड़े आया.
परीक्षा में सफल होने के लिए क्रीमीलेयर ग्रुप का 46 फ़ीसदी और नॉन क्रीमीलेयर का 35 फ़ीसदी कट ऑफ़ था. अम्रुता को 39 फ़ीसदी मार्क्स मिले थे लेकिन उनके पास नॉनक्रीमीलेयर परिवार से होने का कोई सर्टिफ़िकेट या प्रमाण नहीं था. इसलिए उन्हें यहां कामयाबी नहीं मिल पाई.
अम्रुता ने बताया, "मैंने और मेरे दोस्तों ने कई जगह से छानबीन के बाद जाना कि देश के किसी राज्य में अनाथों के लिए किसी भी तरह का आरक्षण नहीं है. ये मेरे लिए बेहद निराशाजनक था. मेरे जैसों की मदद के लिए कोई क़ानून नहीं है, ये जानकर मुझे धक्का लगा."
अनाथों के हक़ की लड़ाई
काफी सोचने के बाद अम्रुता अकेले ही मुंबई निकल पड़ीं और लगातार कई दिनों तक मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मिलने की जुगत लगाती रहीं. आखिरकार फडणवीस के सहयोगी श्रीकांत भारतीय से उनकी बात हुई और उन्होंने मुख्यमंत्री से उनकी मुलाकात करवाई.
अम्रुता ने बताया, "मुख्यमंत्री ने मेरी बात ध्यान से सुनी और इस बारे में कोई ठोस कदम उठाने का भरोसा दिलाया."
ये मुलाक़ात अक्टूबर, 2017 में हुई थी और ठीक तीन महीने बाद यानी जनवरी, 2018 में महाराष्ट्र सरकार ने अनाथों के लिए सरकारी नौकरी में एक फ़ीसदी आरक्षण का प्रावधान लाने का एलान कर दिया. इसी के साथ यह अनाथों को आरक्षण देने वाला देश का पहला राज्य बन गया.
अनाथों को दिया जाने वाला आरक्षण सामान्य वर्ग के तहत ही लागू किया जाएगा यानी सरकार को जाति आधारित आरक्षण का कोटा बढ़ाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी जो पहले ही 52 फ़ीसदी तक पहुंच गया है. अब सामान्य वर्ग के लिए उपलब्ध सीटों में से एक फ़ीसदी सीटें अनाथों के लिए आरक्षित रहेंगी.
अम्रुता कहती हैं, "मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में इतनी ख़ुशी कभी महसूस नहीं की थी जितनी उस दिन की. ऐसा लगा जैसे मैंने एक बहुत बड़ी जंग जीत ली है."
हालांकि अम्रुता और उनके दोस्तों की जंग यहीं ख़त्म नहीं होती. उनके दोस्त कमल नारायण ने कहा, "हम चाहते हैं कि ये नियम देश के सभी राज्यों में लागू हो क्योंकि अनाथ सिर्फ़ महाराष्ट्र में नहीं हैं."
फिलहाल अम्रुता पुणे के मॉडर्न कॉलेज में अर्थशास्त्र में एमए की पढ़ाई कर रही हैं और साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी.
वो कहती हैं, "हम अनाथों की न जाति का पता होता है न धर्म का. न जाने कितने अनाथ मदद के इंतज़ार में बच्चे सड़कों पर ज़िंदगी काट देते हैं. उम्मीद है कि हमारा ये छोटा सा कदम उनकी बेहतर ज़िंदगी के लिए मीलों का सफ़र तय करेगा."
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