नज़रिया: क्या लोकसभा में राहुल को जवाब दे पाए मोदी?

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- Author, उर्मिलेश
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
यह तो पूरे देश को मालूम था कि लोकसभा में पेश अविश्वास प्रस्ताव मंज़ूर नहीं होगा. सदन में भाजपा को प्रचंड बहुमत हासिल है. ऐसे में विपक्ष के इस प्रस्ताव को तो गिरना ही था.
हालांकि संख्या बल में कमतर होने के बावजूद इस बार की संसदीय चर्चा में विपक्ष भारी बहुमत वाले सत्तापक्ष पर भारी पड़ा!
लोकसभा की चर्चा के दौरान इसका संकेत और सबूत बार-बार मिलता रहा. विपक्ष के प्रमुख नेता राहुल गांधी के कुछेक आरोपों और टिप्पणियों पर सत्तापक्ष के सांसदों और कुछ मंत्रियों ने जिस तरह की बौखलाहट दिखाई, उससे भी सरकार की कमज़ोरी उजागर हुई.

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राहुल का मज़ाक
यह तो बार-बार दिख रहा था कि भाजपा-आरएसएस की प्रचार-मंडलियों ने राहुल गांधी का बीते पांच-सात सालों से जिस तरह 'पप्पू-बबलू' आदि कहकर मज़ाक उड़ाया और उन्हें हल्के में लिया, उस सियासी रणनीति का सिलसिला अब टूट चुका है.
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राहुल के राजनीतिक प्रहारों से सत्तापक्ष और स्वयं प्रधानमंत्री भी संसदीय चर्चा के दौरान कई बार असहज नजर आए. अंत में जब प्रधानमंत्री अपनी बात कहने आए तो जनसभाओं और चुनाव-रैलियों के संबोधनों की शैली में उन्होंने लंबा भाषण दिया और राहुल के कुछ आरोपों और व्यवहार का मज़ाक भी उड़ाया. हालांकि पीएम के भाषण में नयापन नहीं था.
पीएम मोदी के भाषण में दोहराव?
वैचारिक ताजगी और ठोस मुद्दों के अभाव में उनके शब्द बेदम और बेजान लग रहे थे. उनके लंबे भाषण के दौरान स्वयं सत्तापक्ष में पहले जैसा जोश नहीं दिखा.
विपक्षी सदस्यों ने नोटबंदी-जीएसटी, किसानों की दुर्दशा, मॉब लिंचिंग और समाज में बढ़ती हिंसा आदि के सवाल को जिस शिद्दत से उठाया, उसका सत्तापक्ष की तरफ़ से ज़्यादा सुसंगत जवाब नहीं आया.
मीडिया, खासकर भारतीय न्यूज चैनलों के बड़े हिस्से ने दिन भर की महत्वपूर्ण संसदीय बहस को प्रधानमंत्री मोदी से राहुल गांधी के लगभग जबरन गले मिलने के दृश्य तक सीमित करने की कोशिश की, पर राहुल उस मामले में भी बाजी मार ले गए.
अपने अटपटेपन के बावजूद गले लगने का विजुअल कई दृष्टियों से सांकेतिक था. समाज में हिंसा, नफ़रत और मॉब-लिंचिंग के आज के दौर में शांति, सौहार्द्र और प्यार की ज़रूरत का सियायी संकेत!
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औसत स्तर का भाषण
अपने संसदीय इतिहास के कुछ महान संबोधनों या भाषणों की रौशनी में देखें तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का भाषण औसत स्तर का था, वह कोई महान् भाषण नहीं कहा जा सकता, जैसा उनके कई प्रशंसक दावा कर रहे हैं.
उनका भाषण शुक्रवार की संसदीय चर्चा का सर्वाधिक राजनीतिक भाषण था. इसलिए आरएसएस-भाजपा की प्रचार-मंडलियां अब राहुल को 'पप्पू या बबलू' कहने से बाज आएंगी.
उनके भाषण ने सिर्फ़ रक्षा मंत्री या प्रधानमंत्री को ही नहीं, संपूर्ण सत्ता-प्रतिष्ठान को बेचैन किया. ख़ासकर दो मुद्दों पर.
पहला मुद्दा रहाः मोदी सरकार पर यह गंभीर आरोप कि वह देश के 15-20 बड़े कॉर्पोरेट कप्तानों के साथ मिलकर नीतियां तैयार करती है, छोटे-मझोले कारोबारियों-किसानों या अवाम के अन्य हिस्सों से उसका कोई संवाद नहीं रह गया है.
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राहुल का कॉर्पोरेट पर हमला
इस सिलसिले में राहुल गांधी ने ठोस संकेतों के साथ खुलेआम अंबानी बंधुओं, अडानी आदि की तरफ इशारा किया. एक तरह से उन्होंने मोदी सरकार पर 'याराना पूंजीवाद' (क्रोनी-कैपिटलिज्म) को बढ़ावा देने का आरोप लगाया. राहुल गांधी ने यह बात किसी जनसभा या चुनाव रैली में नहीं, भारत की संसद में कही. इसलिए इसका ख़ास मतलब है.
कांग्रेस की यह परिपाटी नहीं रही है. मुझे याद नहीं, बीते तीन दशकों में किसी शीर्ष कांग्रेस नेता ने कभी देश के शीर्ष 'कार्पोरेट कप्तानों' पऱ इस तरह खुलेआम निशाना साधा हो!
इस मायने में राहुल कांग्रेस की राजनीति में नया अध्याय जोड़ते नज़र आ रहे हैं. एक जमाने में स्वयं कांग्रेस पर आरोप लगते थे कि वह बड़े कॉर्पोरेट और बड़े उद्योगपतियों से मिलकर आर्थिक नीतियां बनाती है. पर लगता है, राहुल-युग में कांग्रेस सचमुच अपने को इस मायने में बदलने की कोशिश कर रही है.
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उन्होंने अपने भाषण से साबित किया कि ज़रूरत के हिसाब से कांग्रेस 'कॉर्पोरेट कप्तानों' के ख़िलाफ़ भी खड़ी हो सकती है।
दूसरा बड़ा मुद्दा इससे भी ज्यादा संगीन और गंभीर है. प्रधानमंत्री मोदी ने सन् 2014 के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार को बनाया.
तत्कालीन यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार पर निशाना साधते हुए उन्होंने देशवासियों को भरोसा दिलाया कि वह चुनाव जीते तो एक ऐसी सरकार देंगे, जो 'न खाएगी और न किसी को खाने देगी!' कमोबेश, उनकी सरकार पर अब तक भ्रष्टाचार के कोई बड़े आरोप नहीं लगे थे.
बहुत सारे लोग कहते हैं कि इन चार सालों में सीएजी से मीडिया तक, सभी इस सरकार के प्रति ज्यादा संयत और उदार रहे हैं. इस कारण भी भ्रष्टाचार के मामले प्रकाश में नहीं आए.
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राहुल गांधी ने शुक्रवार को संसद के पटल पर रफ़ायल विमान सौदे में हुई कथित अनियमितता का सवाल उठा दिया. हल्के-दबे स्वर में रफ़ायल सौदे पर कुछेक सवाल पर पहले भी उठे थे. पर इतने पुरज़ोर ढंग से पहली बार यह मामला संसद में उठा.
इसकी गंभीरता अंदाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि सिर्फ़ मोदी सरकार ने ही नहीं, फ़्रांस की सरकार की तरफ़ से भी इस मामले में शाम होते-होते सफ़ाई का एक बयान जारी किया गया.

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गोपनीयता के तर्क में कितना दम?
दोनों बयानों में जो सफ़ाई दी गई, उसमें सबसे प्रमुख बात है-गोपनीयता के प्रावधान की. राहुल ने जब विमानों के बेतहाशा ढंग से बढ़े दाम(प्रति विमान 520 करोड़ से बढ़कर 1600 करोड़) और भारत सरकार की अपनी कंपनी एचएएल को नज़रंदाज कर एक कॉर्पोरेट घराने को इस सौदे के एक ठेके में शामिल करने के मोदी सरकार के फ़ैसले पर सवाल उठाया तो संसद में भारी हंगामा हुआ.
रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार को बार-बार खड़े होकर कुछ बोलते देखा गया. बाद में अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री ने स्वयं भी इस मामले में टिप्पणी की, लेकिन वह सिर्फ़ टिप्पणी भर थी, उसमें किसी तरह की सफाई नहीं थी, जिससे आरोपों का पूरी तरह खंडन होता!
गोपनीयता के प्रावधान पर सत्तापक्ष की तरफ़ से बार-बार ज़ोर दिया गया. अतीत में रक्षा सौदों के विवाद को लेकर जब कभी बात होती, इसी तरह की दलीलें कांग्रेस द्वारा संचालित तत्कालीन सरकारों की तरफ़ से आती थीं.

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अगर रफ़ायल सौदे में सबकुछ पाक-साफ है तो फिर ये कैसी पर्देदारी है? सरकार बार-बार सौदे में 'गोपनीयता के प्रावधान' की आड़ क्यों ले रही है!
अविश्वास मत पर चर्चा के दौरान ये दो ऐसे मुद्दे उभरे, जिन पर सरकार की दलीलें बेहद कमज़ोर नजर आईं. सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों के लिए यह वक़्त बहुत महत्वपूर्ण है. कुछ महीने बाद देश में आम चुनाव होना है.
उससे पहले कुछ राज्यों के चुनाव होने हैं. देखना है, पक्ष और विपक्ष इन मुद्दों को चुनाव में किस हद तक उठा पाते हैं और अपनी-अपनी दलीलों से मतदाताओं को कितना प्रभावित करते हैं!
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