पत्ते पर लिखी ये कौन सी रहस्यमयी लिपि है

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तमिलनाडु की लाइब्रेरी में एक ऐसी अज्ञात लिखावट मिली है जिसे कोई पढ़ नहीं पा रहा है.
चेन्नई में सरकारी ओरिएंटल पांडुलिपि पुस्तकालय में अलग-अलग जगहों से मिली 70,000 से अधिक पांडुलिपियां रखी हुई हैं लेकिन उनमें एक ऐसी पांडुलिपि मिली है जिस पर लिखी भाषा अब तक रहस्य बनी हुई है. इस पांडुलिपि की लिखावट की भाषा को अब तक कोई नहीं पढ़ पाया है.
अज्ञात भाषा में लिखा यह लेख चार पन्नों का है और इसे इसे लाइब्रेरी के 'डिस्प्ले सेक्शन' में रखा गया है.
लाइब्रेरियन चंद्रमोहन बताते हैं, "हमने 1965 में एक स्थानीय में अख़बार में विज्ञापन दिया और पूछा था क्या कोई ऐसा भाषाविद् या विद्वान है जो इस लेख को पढ़ने में हमारी मदद कर सके. लेकिन हमें कोई जवाब नहीं मिला था."

'इस लिपि का कोई रिकॉर्ड नहीं'
चंद्रमोहन कहते हैं, "हमारे पास इस लिपि का कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है. यह ताड़ के पत्ते पर लिखी गई है. 1869 में जब यह पुस्तकालय खुला था तभी ये दूसरी पांडुलिपियों के साथ यहां आई थी."
उन्होंने बताया कि इस लाइब्रेरी में ताड़ के पत्ते पर लिखी 50180 पांडुलिपियां, कागज़ पर लिखी 22134 और ताम्रपत्रों पर लिखी 26556 संदर्भ पुस्तकें (रेफ़रेन्स बुक) हैं."
इनमें से 49,000 से अधिक संस्कृत में लिखी हैं, जबकि तमिल पांडुलिपियां 16,000 के करीब हैं.
किसने इकट्ठी की ये प्राचीन पांडुलिपियां?
इनमें से कई ताड़ के पत्ते और ताम्रपत्र भारत के पहले सर्वेयर जनरल कर्नलर कोलिन मैकनेज़ी के निजी संग्रह से ली गई हैं. मैकनेज़ी को गणित और भाषाओं में बहुत दिलचस्पी थी. इसी सिलसिले में वो साल 1783 में भारत आए थे.
चंद्रमोहन ने अंग्रेजी अख़बार द हिंदू को दिए एक इंटरव्यू में बताया है कि मैकनेज़ी ने अपने कुछ सहयोगियों को ऐसे लेख इकट्ठे करने के लिए भारत के कई हिस्सों, ख़ासकर दक्षिण भारत के दौरे पर भेजा.
इस तरह उनके सहयोगियों ने कई लेख इकट्ठे किए जो तमाम विषयों पर आधारित हैं और अतीत के अलग-अलग दौर से ताल्लुक रखते हैं.

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साल 1821 में मैकनेज़ी का निधन हो गया और इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनका निजी संग्रह ख़रीद लिया. फिर इसे तीन हिस्सों में बांटकर चेन्नई भेज दिया गया.
मैकनेज़ी के अलावा ईस्ट इंडिया के कंपनी के दो अधिकारियों, सीपी ब्राउन और रेव. टी. फॉक्स ने भी पुराने लेखों को इकट्ठा करने में बड़ी भूमिका निभाई है.
प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रोफ़ेसर रहे पिकफ़ोर्ड ने इन सभी लेखों और पांडुलिपियों को इकट्ठा करके एक छत के नीचे लाने का काम किया. हालांकि ये छत बदलती रही और यह मद्रास यूनिवर्सिटी से शिफ़्ट होकर अन्ना लाइब्रेरी के सातवें माले पर आ गई.
इस लाइब्रेरी में तेलुगू, उर्दू और फ़ारसी समेत दूसरी कई भाषाओं में पांडुलिपियां रखी हैं. दुनिया भर के विद्वान हर साल यहां आकर इन पांडुलिपियों को समझने और पढ़ने की कोशिश करते हैं. ऐसे ही एक कोशिश साल 2008 में एक विद्वान ने की थी.

16वीं सदी से है संबंध?
चंद्र मोहन कहते हैं, "वो विद्वान आए और इसी अज्ञात पांडुलिपि पर अटक गए. उनका अनुमान है कि इसका संबंध कर्नाटक से है और शायद यह राजा कृष्णदेव राय के वक़्त की है. हालांकि उनके इस अनुमान की पुष्टि करने का कोई तरीका नहीं है."
कृष्णदेव राय ने 16वीं शताब्दी में भारत के विजयनगर पर दो दशकों तक शासन किया था. राममोहन बताते हैं कि पिछले सालों में लाइब्रेरी आने वालों की संख्या लगातार बढ़ी ही है. यहां रोज औसतन 90 लोग आते हैं.
लाइब्रेरी अब ऐसी तमाम पांडुलिपियों को संरक्षित करने की कोशिश कर रही है. इसके लिए कई रासायनिक पदार्थों की भी मदद ली जा रही है. उम्मीद की जा रही है कि कभी यहां आने वाला कोई शख़्स इसे पढ़ने में कामयाब होगा.
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