नज़रिया: नीतीश और मोदी का कितना बिगाड़ पाएंगे कुशवाहा

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- Author, सुरूर अहमद
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
2019 में उपेंद्र कुशवाहा ने पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले गठबंधन एनडीए के बैनर तले चुनाव में जाने को लेकर अपनी सहमति जता दी है, लेकिन नीतीश कुमार को लेकर उन्होंने अब तक स्थिति साफ़ नहीं की है.
बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा के बीच कई स्तरों पर समानता है.
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कुर्मी समाज से ताल्लुक रखते हैं जबकि राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेता और मानव संसाधन राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा कोइरी जाति से हैं.
दोनों नेता सात जून को उस वक़्त चर्चा में आए जब नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) ने अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए 25 सीटों की मांग कर की.
मुख्यमंत्री पद का दावा
रालोसपा के कार्यकारी अध्यक्ष नागमणि ने दावा किया कि उनके नेता उपेंद्र कुशवाहा बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री से ज़्यादा क़ाबिल मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं. नागमणि ने ये भी कहा कि नीतीश कुमार राज्य में जनसमर्थन खो चुके हैं.
ये दोनों ही मांगें उस डिनर के कुछ घंटों पहले की गईं जो भाजपा ने एनडीए के अपने सहयोगियों के लिए आयोजित किया था.

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इस रात्रिभोज के दौरान नीतीश कुमार, एलजेपी नेता राम विलास पासवान समेत कई नेता तो शामिल हुए, लेकिन कुशवाहा ग़ैरमौजूद रहे.
नीतीश और उपेंद्र कुशवाहा दोनों ही अति महत्वकांक्षी हैं. दोनों पार्टी और गठबंधन में भी साथ रहे हैं.
कुशवाहा बिहार की राजनीति में उस वक़्त चमके जब 2005 के विधानसभा चुनाव के बाद वो सदन में विपक्ष के नेता की कुर्सी पर जा बैठे. इससे पहले ये कुर्सी भाजपा के नेता सुशील कुमार मोदी के पास थी. हालांकि उस वक़्त दोनों ही एनडीए के साथ थे.
बिहार की राजनीति में कुशवाहा की उड़ान
ये वो वक़्त था जब 2004 के उपचुनाव के बाद जेडी (यू) की सीटों में एक सीट और जुड़ गई थी.
विपक्ष का नेता बनने के बाद उपेंद्र कुशवाहा बिहार की राजनीति का अहम किरदार बन गए थे, लेकिन ये सब ज़्यादा दिन तक नहीं चला.

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नवंबर 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में कुशवाहा अपने ही चुनाव क्षेत्र से हार गए और वो भी तब, जब जेडी (यू) और भाजपा की भारी जीत हुई.
नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बन गए और सुशील कुमार मोदी को उपमुख्यमंत्री बनाया गया. वहीं कुशवाहा को सरकार में कोई पद नहीं दिया गया. वो एक तरह से राजनीतिक रूप से बेघर कर दिए गए.
इसके बाद कुशवाहा ने जनता दल (यूनाइटेड) का साथ छोड़कर नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी का हाथ थाम लिया. देखते ही देखते उपेंद्र कुशवाहा नीतीश कुमार के धुर आलोचक बन गए.
जब जेडीयू में हुई कुशवाहा की वापसी
कुशवाहा ने कोइरी जाति का समर्थन जुटाना शुरू किया. उस वक़्त कोइरी और कुर्मी समाज जेडी (यू) का मुख्य वोटबैंक था.
आधिकारिक तौर पर किसी भी जाति की ठीक-ठीक जनसंख्या बताना तो मुश्किल है, लेकिन बिहार की राजनीति पर नज़र रखने वालों का मानना है कि बिहार में कुर्मी 2-3 फ़ीसदी हैं, जबकि कोइरी 5-6 फ़ीसदी है.
हालांकि, 31 अक्टूबर 2009 को सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती के मौके पर नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा को जेडी (यू) में लौट आने का न्यौता दिया. कुशवाहा उस कार्यक्रम में मौजूद थे.

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इसके बाद जल्द ही कुशवाहा की जेडी (यू) में वापसी हुई. नीतीश कुमार के साथ उनका लव-कुश का रिश्ता एक बार फिर दिखने लगा.
दो फ़रवरी 2010 को शोषित समाज दल के दिवंगत और समाजवादी नेता जगदेव प्रसाद की जयंती के मौक़े पर नीतीश और कुशवाहा ने सार्वजनिक तौर पर पिछड़ी जातियों के समर्थन की घोषणा की.
उस वक़्त ''अगले सावन भादो में, गोरे हाथ कादो (कीचड़) में' जैसे ऊंची जाति विरोधी नारे लगाए गए थे.
इस नारे का मतलब ये था कि अगली बरसात में ओबीसी और दलित महिलाएं नहीं बल्कि तथाकथित ऊंची जाति की महिलाएं अपने खेतों में काम करेंगी.
जब नीतीश से अलग हुए कुशवाहा
उसी साल नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेज दिया. इसके बाद राजनीतिक रूप से सशक्त कुशवाहा ने जेडी (यू) के भीतर अपनी ताक़त दिखाना शुरू किया.
अक्टूबर-नवंबर 2010 में हुए विधानसभा चुनावों में कुशवाहा को लो प्रोफाइल रखा गया. ये भी आरोप लगे कि कुशवाहा ने कई जगह अपनी ही पार्टी के ख़िलाफ़ कुप्रचार किया.
वो एक बार फिर 2013 में तीन मार्च को नीतीश से अलग हो गए और रालोसपा नाम की अलग पार्टी बना ली.

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कुशवाहा के समर्थकों का कहना था कि कोइरी समाज ने नीतीश का पूरा समर्थन किया, लेकिन उनके साथ किए गए वादे पूरे नहीं किए गए.
ये कयास लगाए जाने लगे कि रालोसपा लालू प्रसाद की राष्ट्रीय जनता दल से हाथ मिला सकते हैं.
लेकिन 16 जून 2013 को जेडी (यू) के एनडीए से बाहर हो जाने के बाद भाजपा के नेतृत्व वाले इस गठबंधन में रालोसपा के जाने का रास्ता साफ़ हो गया.
नीतीश की पार्टी के चले जाने के बाद बीजेपी ने उसकी जगह भरते हुए 2014 के लोकसभा चुनाव में रालोसपा को तीन और एलजेपी को सात सीटें दे दीं.
कुशवाहा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल
चुनाव में पार्टी ने सभी तीन सीटें जीत लीं जबकि रामविलास पासवान की पार्टी को छह पर जीत मिली.
इसी के साथ बिहार की 40 लोक सभा सीटों में 31 पर एनडीए ने कब्ज़ा कर लिया और जेडी (यू) को सिर्फ़ दो सीटें मिल सकीं.
हालांकि नवंबर 2015 में हुए विधान सभा चुनाव में रालोसपा सिर्फ़ तीन सीटें जीत सकी. उसके सहयोगी भाजपा को 53 सीटें मिलीं जबकि एलजेपी और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा को एक-एक सीट हासिल हुई. इस चुनाव में महागठबंधन ने 178 सीटें जीती थीं.

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बिहार की सत्ता में नीतीश की वापसी निश्चित तौर पर एनडीए के तीनों घटकों के लिए चुनौती भरी थी. लेकिन कुशवाहा ने हमेशा इसे प्रतिष्ठा की लड़ाई के तौर पर लिया.
केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय में राज्य मंत्री के पद पर रहते हुए कुशवाहा ने कई बार बिहार का दौरा किया और राज्य में शिक्षा के गिरते स्तर की वजह से नीतीश को घेरते रहे.
बहुचर्चित टॉपर घोटाला जिसमें नीतीश कुमार के क़रीबियों के शामिल होने के आरोप लगे थे, इस मामले ने कुशवाहा को नीतीश के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करने के लिए एक बड़ा हथियार दे दिया.
भाजपा के सामने कुशवाहा की अहमियत
पिछले साल जब नीतीश की सरकार ने प्रतिबंध के ख़िलाफ़ मानव श्रृंखला बनाई तो रालोसपा के कार्यकर्ताओं ने भी बिहार में गिरते शिक्षा स्तर को मुद्दा बनाते हुए प्रदर्शन किए.
लेकिन 27 जून 2017 को नीतीश कुमार की एनडीए में वापसी ने कुशवाहा को परेशान कर दिया.
जल्द ही कुशवाहा को लगने लगा कि अब भाजपा को उनकी ज़रूरत है. उपेंद्र कुशवाहा राष्ट्रीय जनता दल से नज़दीकियां बढ़ाते दिखे.

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कुशवाहा की पार्टी ने इस साल फिर से बिहार सरकार के ख़िलाफ़ मानव श्रृंखला बनाई.
हाल ही में रालोसपा ने न्यायपालिका में आरक्षण देने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया था.
हालांकि आलोचकों का मानना है कि उपेंद्र कुशवाहा ने केंद्रीय मंत्री के पद पर रहते हुए कुछ ख़ास काम नहीं किया है.
उनका कहना है कि विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों के लिए आरक्षण नीति में हुए बदलावों पर कुशवाहा ने कुछ नहीं किया.
नीतीश बने राजनीतिक रोड़ा
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि कुशवाहा बिहार में अपनी जाति के सबसे बड़े नेता हो सकते थे, लेकिन नीतीश की वजह से ऐसा नहीं हो सका.
31 मई को बिहार में हुए उपचुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा. सात जून को जब भाजपा की ओर से रात्रिभोज का आयोजन किया गया तो कुशवाहा ने उसमें भाग नहीं लिया.
वो रामविलास पासवान और सुशील कुमार मोदी की 6 और 8 जून को दी गई इफ़्तार पार्टी में भी शामिल नहीं हुए. कहा जा रहा है कि वो लालू प्रसाद की 13 जून को होने वाली इफ़्तार पार्टी में शामिल हो सकते हैं.
लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री मांझी जो अब आरजेडी के साथ हैं, उन्होंने हाल ही में कहा है कि अगर उपेंद्र कुशवाहा मुख्यमंत्री बनने की इच्छा को त्याग देते हैं तो उनका महागठबंधन में स्वागत है.

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कुशवाहा भाजपा के बड़े नेताओं को भी नज़रअंदाज़ कर रहे हैं. वो महात्मा गांधी के चंपारण आंदोलन के 100 साल पूरे होने पर मोतिहारी में 10 अप्रैल को प्रधानमंत्री के दौरे के वक़्त मौजूद नहीं रहे थे.
उन्होंने आरोप लगाया था कि जब वो मोतिहारी जा रहे थे तो उसी सुबह वैशाली ज़िले में उनकी कार पर हमला किया गया.
उन्होंने नीतीश सरकार को इस हमले का ज़िम्मेदार ठहराया.
10 अप्रैल को ही ऊंची जाति से जुड़े कुछ छोटे संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को लेकर दलितों के प्रदर्शनों के विरोध में बंद बुलाया था.
राज्य सरकार कुशवाहा पर हमले के लिए ज़िम्मेदार हो या ना हो, उन्हें प्रधानमंत्री मोदी के कार्यक्रम से किनारा करने का मौक़ा तो मिल ही गया था.

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