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जिस इलाक़े की विधायक महिला, वहां हुआ ज़्यादा विकास
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
महिला नेताओं के बारे में कहा जाता है कि वो ऊंचे टैक्स के पक्ष में रहती हैं. इसके साथ ही जन-कल्याण के साथ-साथ शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में ज़्यादा निवेश पर ज़ोर देती हैं.
ऐसे में कम समय में ही इन फ़ैसलों का सीधा असर विकास दर पर दिखाई देने लगता है. तो क्या ये मानना ठीक है कि महिला नेता देश की आर्थिक तरक्क़ी में ज़्यादा अहम भूमिका अदा करती हैं?
हाल ही में हुए एक अध्ययन में पाया गया है कि निर्वाचित महिलाएं विकास को लेकर ज़्यादा समर्पित होती हैं. इसके लिए साल 1990 से 2012 के बीच शोधकर्ताओं की एक टीम ने भारत की 4,265 विधानसभा सीटों के चुनावी आंकड़ों का उपयोग किया.
ये 1990 से 2012 का दौर था. इस दौरान भारत में तेज़ रफ़्तार से आर्थिक प्रगति की बात कही जाती है. इसी दौर में ज़्यादा महिलाओं को राज्यों की विधानसभाओं में चुनकर भेजा गया.
भूमिका पहले से काफ़ी बढ़ी
भारत में लोकसभा और विधानसभा की क़रीब पाँच हज़ार सीटों पर लगभग 400 से ज़्यादा महिलाएं हैं.
एक औसत निकालें तो भारत में लगभग 9 प्रतिशत ही सांसद या विधायक महिलाएं हैं. दुनिया की अगर बात करें तो निर्वाचित महिला नेताओं की संख्या 19 प्रतिशत है.
100 से ज़्यादा देशों ने संसद में या राजनीतिक पार्टी की उम्मीदवारी में महिलाओं को कोटा देने की व्यवस्था बनाई है.
भारत के नगर निकायों और पंचायतों में 1993 से महिलाओं के लिए कोटा तय किया गया है. इससे सामाजिक निर्णय लेने में उनकी भूमिका पहले से काफ़ी बढ़ी है.
हालांकि भारत की संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने की पेशकश करने वाला बिल साल 2010 से अटका हुआ है.
ऐसे में महिला राजनेताओं की इतनी मामूली-सी संख्या भारत के विकास को कैसे बढ़ावा दे सकती है? अगर ग़ौर करें तो इतनी मामूली संख्या होने के बावजूद भी उनकी भूमिका काफ़ी महत्वपूर्ण रही है.
पुरुषों के बराबर ही प्रभावी
भारत में विधायकों के पास नई नीतियाँ बनाने, संघीय निधि से आने वाले फंड को प्रभावित करने और ग्राम परिषदों पर ख़र्च करने की ज़िम्मेदारी और क्षमता होती है.
इन जनप्रतिनिधियों की ज़िम्मेदारी सड़क, बिजली, क़ानून-व्यवस्था, स्वास्थ्य और शिक्षा के प्रबंधन की भी है.
शोधकर्ताओं ने पाया है कि भारत की महिला नेताओं (विधायकों) ने अपनी सीटों (इलाक़ों) पर हर साल लगभग दो प्रतिशत की दर से आर्थिक सुधार किया है.
इसके बाद शोधकर्ताओं ने केंद्र से 40 अरब डॉलर की वित्तीय मदद से बनी चार लाख किलोमीटर की सड़क परियोजना के डेटा पर नज़र डाली.
इस परियोजना के तहत कथित तौर पर साल 2000 से 2015 के बीच लगभग दो लाख गाँवों तक सड़कों को पहुँचाया गया.
इस डेटा को देखने के बाद शोधकर्ताओं ने पाया कि सड़कों के अनुबंध हासिल करने में महिलाएं भी पुरुषों के बराबर ही प्रभावी थीं.
हालांकि जिन सीटों महिला विधायक थीं, उन सीटों पर सड़कों का काम या तो जल्दी पूरा हुआ या तेज़ी से किया गया.
पुरुषों की तुलना में कम भ्रष्ट
ऐसेक्स यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र की प्रोफ़ेसर सोनिया भलोत्रा ने बताया, "इसका मतलब ये है कि जिन क्षेत्रों में अधिक सड़कें बनीं, उन क्षेत्रों में लोग पुरुषों की जगह महिलाओं को चुनते हैं."
शोधकर्ता इस बात पर भी ज़ोर डालते हैं कि महिला नेताओं के इलाक़ों में ज़्यादा विकास इसलिए भी होता है, क्योंकि वो पुरुषों की तुलना में कम भ्रष्ट होती हैं और उनकी तुलना में अपराध के मामलों में भी कम शामिल रहती हैं.
इस अध्ययन में ये भी पाया गया है कि भारत में 13 प्रतिशत महिला विधायकों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज हैं. ऐसे मामले, जिनमें या तो अभियोग की कार्यवाही चल रही है या चार्जशीट दायर की जा चुकी है. लेकिन पुरुष राजनेताओं से इसकी तुलना की जाए तो ये संख्या एक तिहाई के क़रीब है.
भ्रष्ट आचरण और आपराधिक मामलों में लिप्त होना, दोनों ही विकास के लिए स्पष्ट रूप से बाध्यकारी हैं.
इस अध्ययन से एक दिलचस्प बात ये भी सामने आई है कि महिला राजनेता पुरुषों की तुलना में उसी सीट से दोबारा चुनाव लड़ने की अधिक चाहत रखती हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा होता है कि मतदाता उन्हें उनके प्रदर्शन के लिए पुरस्कृत करेंगे.
लेकिन भारत की महिला राजनेताओं के लिए ये यात्रा आसान नहीं रही. बहुत से लोगों का ये मानना है कि ज़्यादातर महिला विधायकों को उनके घर के पुरुषों के नेतृत्व में रहकर काम करना पड़ता है. इस वजह से उन्हें उनके पतियों के कहे पर चलने का आरोप लगता है.
लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि इसका कोई व्यवस्थित सबूत नहीं है. प्रोफ़ेसर सोनिया भलोत्रा कहती हैं, "यह एक मिथक के सिवा कुछ नहीं है."
बड़े सवालों के जवाब
महिला नेताओं को लेकर अफ़वाहें भी ख़ूब उड़ाई जाती हैं. कई बार उन्हें यौन उत्पीड़न झेलना पड़ता है. अपने पहनावे और चेहरे-मोहरे के लिए कुतर्क सुनने पड़ते हैं और अब तो सोशल मीडिया पर उन्हें ट्रोल भी किया जाने लगा है.
फिर घर की ज़िम्मेदारियों को छोड़कर राजनीति को बतौर करियर चुनने पर उन्हें कई तरह के सवालों के जवाब देने पड़ते हैं.
कुछ साल पहले की ही बात है, जब बिहार की एक महिला राजनेता ने अपने पति से कहा कि वो फ़ुलटाइम राजनीति में जा रही हैं, तो उनके पति का पहला सवाल था कि "तुम घर का ख़्याल रखोगी या राजनीति का?"
उस महिला राजनेता का जवाब था कि मैं घर का ख़्याल रखूंगी और राजनीति भी करूंगी.
एक पत्रकार ने इस दंपति पर एक रिपोर्ट भी लिखी थी. इसमें कहा गया था कि वो महिला इस बात को लेकर पाँच साल तक अपने पति से दूर रही. और तब ही वो वापस लौटी जब उसके पति ने उसे और उसके राजनीतिक जीवन को पूरी तरह से स्वीकार नहीं कर लिया.
इस शोध से ये तो ज़ाहिर है कि महिलाएं विकास लाने के मामले में पुरुषों से आगे हैं. तो क्यों भारत की राजनीतिक पार्टियाँ महिला उम्मीदवारों को पर्याप्त सीटें नहीं देती हैं?
इस बारे में प्रोफ़ेसर सोनिया भलोत्रा कहती हैं, "मुझे लगता है कि इसका एक बड़ा कारण ये भी हो सकता है कि लोगों को ये पता ही नहीं है कि विकास के मामले में और आर्थिक प्रदर्शन के मामले में महिलाओं का प्रदर्शन बेहतर है. और यही वजह हो सकती है कि सरकार में उन्हें पर्याप्त जगह नहीं मिलती."
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