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क्या भारतीय वोटर पैसे लेने के बाद भी वोट नहीं देते?
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में एक वोटर को किसी उम्मीदवार के पक्ष में वोट करने के लिए कौन-कौन सी चीज़ें प्रभावित करती हैं? आमतौर पर उम्मीदवार की पहचान, उसकी विचारधारा, जाति-धर्म या उनके काम वोटरों को प्रभावित करते हैं.
यह भी समझा जाता है कि ग़रीब वोटरों को रिश्वत देकर उनके मत प्रभावित किए जाते हैं. कर्नाटक चुनावों से कुछ दिन पहले वहां के अधिकारियों ने 136 करोड़ रुपए से ज़्यादा मूल्य के कैश और 'अन्य प्रलोभन' के सामान ज़ब्त किए थे.
अभी तक की यह रिकॉर्ड ज़ब्ती थी. एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि कार्यकर्ता वोटरों के खातों में पैसे ट्रांसफर कर रहे थे. ये वैसे वोटर थे जिन्होंने उनके उम्मीदावर को वोट देने का वादा किया था.
रिपोर्ट में आगे यह दावा किया गया था कि अगर उनके उम्मीवार जीतते हैं तो उन्हें और पैसे दिए जाएंगे.
भारत में चुनावों के दौरान कैश और अन्य उपहारों से वोट ख़रीदने की कोशिश पुरानी है. इसका पहला कारण ये है कि राजनीति में प्रतिस्पर्धा ज़्यादा है.
साल 2014 के चुनावों में 464 पार्टियां मैदान में थीं. वहीं, स्वतंत्र भारत में 1952 में हुए पहले चुनावों में केवल 52 पार्टियां लोकतंत्र की लड़ाई में शामिल थीं.
2009 में जीत का औसत अंतर 9.7 फ़ीसदी था, जो पहले के चुनावों के मुक़ाबले सबसे कम था. 2014 के चुनावों में 15 फ़ीसदी के अंतर से भाजपा की जीत को बड़ी जीत कहा गया था.
अमरीका में 2012 में हुए चुनावों में हार-जीत का अंतर 32 फ़ीसदी था और ब्रिटेन में 2010 में हुए चुनावों में यह अंतर 18 फ़ीसदी का था.
शोध
भारत में चुनाव अस्थिर हो गए हैं. पार्टियों का अब वोटरों पर नियंत्रण नहीं है जैसा पहले कभी हुआ करता था. पार्टी और उम्मीदवार अब चुनाव परिणामों को लेकर अनिश्चित रहते हैं. पहले ऐसा नहीं था.
यही कारण है कि वो वोट को पैसों के बल पर ख़रीदना चाहते हैं. अमरीका के डर्टमाउथ कॉलेज के असिस्टेंड प्रोफ़ेसर साइमन चौचर्ड का नया शोध यह कहता है कि यह ज़रूरी नहीं है कि रिश्वत लेने वाले वोट दे हीं.
प्रतिस्पर्धा ज़्यादा होने की वजह से ही उम्मीदवार कैश, शराब जैसे उपहार देने के लिए प्रेरित होते हैं. इसके साथ पैसे के पैकेट भी दिए जाते हैं जो कई मामलों में प्रभावी नहीं होते हैं.
डॉ. चौचर्ड तर्क देते हैं कि उम्मीदवारों को द्वंद्व में रहना पड़ता है जहां कोई भी किसी पर भरोसा नहीं करता है और हर कोई अपने हित के लिए काम करता है.
वो कहते हैं, "उन्हें डर होता है कि उनके विरोधी पैकेट बाटेंगे. वो इसे ख़ुद बांटते हैं ताकि विरोधियों की रणनीति का मुक़ाबला किया जा सके."
समाज के प्रभावशाली लोग बांटते हैं पैसे-शराब
प्रोफ़ेसर चौचर्ड और उनकी टीम ने मुंबई में 2014 में हुए विधानसभा और 2017 में हुए नगर निगम चुनावों में डेटा और सूचनाओं को जुटाया था.
उन्होंने इसके लिए बड़ी पार्टियों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं से बात की. उन्होंने पाया कि उम्मीदवार इलाक़े और समाज के प्रभावशाली लोगों को पैसे और शराब बांटने के लिए देते हैं. उम्मीदवारों में से कुछ ऐसे उम्मीदवार भी थे जो हर वोटर पर एक हज़ार रुपए तक ख़र्च कर सकते थे.
पार्टी के कार्यकर्ताओं ने शोधकर्ताओं से कहा कि पैसे के पैकेट कमोबेश समान होते हैं. अधिकतर पैसे वोटरों के पास नहीं पहुंच पाते हैं क्योंकि बांटने वाले ख़ुद पैसे रख लेते हैं.
चुनाव में सबसे अधिक ख़र्च करने वाला उम्मीदवार चौथे नंबर पर रहा था. सभी पार्टियों के क़रीब 80 कार्यकर्ताओं ने शोध करने वाली टीम को बताया कि कैश और उपहार बहुत कम लोगों को प्रभावित कर पाया था.
कार्यकर्ता वोटरों को दोष देते हैं कि वो पैसे तो रख लिए पर उम्मीदवारों को धोखा दे दिया. हालांकि इसके प्रमाण नहीं मिले कि उम्मीदवारों ने उनके वोट ख़रीदने के लिए पैसे दिए.
प्रोफ़ेसर चौचर्ड कहते हैं, "वोटरों को पैसा देना पूरी तरह व्यर्थ नहीं जाता है. आपको वोट नहीं मिलेंगे अगर आप ऐसा नहीं करते हैं. इससे आपको मैदान में बने रहने में मदद मिलती है. आप हार सकते हैं अगर आप उपहार नहीं बांटते हैं तो. अगर मुक़ाबला ज़्यादा कड़ा है तो यह मामले को एकतरफ़ा कर सकता है."
वोटर की उम्मीद
राजनीति विश्लेषक संजय कुमार कहते हैं कि पार्टियों को यह लगता है कि वो ग़रीब लोगों के वोट पैसे के दम पर ख़रीद सकते हैं. "यही कारण है कि वो वोटरों को रिश्वत देते हैं. सभी पार्टियां वोटरों पर पैसा खर्च करती हैं ताकि जो उनके वोटर नहीं हैं, उन्हें अपने पक्ष में लाया जा सके."
सामजाकि वैज्ञानिकों को कहना है कि दक्षिण एशिया में ग़रीब मतदाता अमीर उम्मीदवारों की सराहना करते हैं. एक ग़ैरबराबरी समाज में रिश्वत और उपहार परस्पर का भाव पैदा करते हैं.
भारत में संरक्षण की राजनीति का एक लंबा इतिहास है. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के समाज विज्ञान के जानकार अनस्तासिया पिलियावस्की ने राजस्थान के ग्रामीण इलाक़ों में वोटरों का अध्ययन किया और पाया कि वो उम्मीदवारों से खाने और पैसे की उम्मीद रखते हैं.
वो मानती हैं कि ग्रामीण भारत में चुनावी राजनीति अक्सर परंपरागत सोचों पर आधारित होते हैं. उन्होंने पाया कि चुनावों का मूल मंत्र "दाता-नौकर के बीच का संबंध था, जिसमें सामानों का आदान-प्रदान किया जाता है और शक्ति का उपयोग होता है."
चुनाव अधिकारियों की आंखों से बचने के लिए उम्मीदवार नक़ली शादी और जन्मदिन की पार्टियां देते हैं, जिसमें अनजान लोग, मतदाता के खाने-पीने और उपहार की व्यवस्था की जाती है.
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में समाज विज्ञान की प्रोफ़ेसर मुकुलिका बनर्जी के मुताबिक़ ग़रीब मतदाता "उन सभी पार्टियों से पैसा लेते हैं जो इसकी पेशकश करते हैं पर वोट उन्हें नहीं देते हैं जो ज़्यादा पैसा देते हैं बल्कि 'अन्य बातों का ख़्याल' रखकर देते हैं."
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