कर्नाटक चुनाव: आख़िर एक टीवी चैनल कितने एग्ज़िट पोल दिखाएगा?

    • Author, प्रदीप कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कर्नाटक चुनाव के परिणाम को लेकर उतनी गहमागहमी कभी नहीं देखने को मिली, जितनी इस बार देखने को मिल रही है. इस चुनाव को लेकर एग्ज़िट पोल पर सबकी नज़रें टिकी हुई थीं,

मोटे तौर पर ये माना जाता है कि एग़्जिट पोल्स से रूझान का पता तो चलता है, लेकिन कर्नाटक के एग्ज़िट पोल्स से चुनाव के नतीजों के रूझान का पता तो नहीं ही चल रहा है उल्टे वे लोगों को उलझाने वाले साबित हो रहे हैं.

अलग अलग पांच एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियों में से तीन ने बीजेपी के आगे रहने की संभावना जताई है, तो दो ने कांग्रेस के आगे रहने का दावा किया है.

चुनावी सर्वे करने वाले और सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसायटीज के निदेशक संजय कुमार कहते हैं, "एग्ज़िट पोल जब होते हैं, उसके एक दो दिन बाद तो नतीजे आने ही होते हैं, ऐसे में नतीजों को लेकर जो उत्सुकता है, उसको स्पष्टता देने के लिए इसे कराए जाते हैं. रूझान जैसा संकेत तो मिलता है. लेकिन कर्नाटक में ऐसा नहीं दिखा है. संदेह के बादल छंटे नहीं हैं, वरन काले बादल छा गए हैं."

एक चैनल पर दो-दो सर्वे

वैसे इस बार के एग्ज़िट पोल को लेकर एक दिलचस्प चर्चा देखने को मिल रही है. टाइम्स नाउ ने अपने चैनल पर दो एजेंसियों के सर्वे दिखाए हैं, एक सर्वे में कांग्रेस को बढ़त दिखाई गई है, जबकि दूसरे सर्वे में बीजेपी को बढ़त मिली हुई है.

कई लोग ये कह रहे हैं कि ऐसा पहली बार हुआ है, लेकिन टाइम्स नाऊ चैनल के एडिटर इन चीफ़ राहुल शिवशंकर कहते हैं कि ये पहली बार नहीं हुआ है. वे कहते हैं, "2014 के आम चुनाव के वक्त मैं न्यूज़ एक्स टीवी चैनल का एडिटर था, हमने वहां भी ये प्रयोग किया था. ये कोई पहली बार नहीं हुआ है."

हालांकि इस चलन पर सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार कहते हैं, "एक चैनल के पास पूरा अधिकार है कि वो चाहे तो पांच एजेंसियों के सर्वे दिखा सकते हैं, छह एजेंसियों का दिखा सकते हैं. दिक्कत तब है जब एक ही चैनल अलग अलग एजेंसियों से सर्वे कमीशन कराते हैं, तो ये सवाल तो उठता है कि इसकी ज़रूरत क्या पड़ी है."

हालांकि टाइम्स नाऊ के राहुल शिवशंकर कहते हैं, "सवाल उठाने वाले लोग कौन हैं, वही हैं जो दूसरे चैनलों पर पोल्स कर रहे हैं. हमारे दर्शकों ने तो स्वागत किया है, भारत जैसे देश में जिस तरह का विविधता भरा समाज है, उसमें पोल्स करने में थोड़ा सा बारीक अंतर भी नतीजों पर असर डाल सकता है. ऐसे में दो एजेंसियों से सर्वे कराने में कोई मुश्किल तो नहीं है, दूसरे समाचार चैनल्स भी तो पोल्स ऑफ़ पोल्स के नाम पर सभी सर्वे दिखाते हैं."

विश्वसनीयता का सवाल

वहीं इस मामले में ब्राडकास्टर एडिटर्स एसोसिएशन के एक्जीक्यूटिव कमेटी के सदस्य एनके सिंह कहते हैं, "करने को तो कोई चैनल छह एजेंसियों को कमीशन कर सकती है, अभी एक चैनल ने दो एजेंसी को हायर किया है, कल को तीन भी हायर कर सकते हैं. लेकिन जब इन दोनों-तीनों सर्वे के साथ एक ही चैनल का नाम आता है तो फिर उस चैनल को देखने वालों में विश्वसनीयता का संकट तो उत्पन्न हो सकता है."

हालांकि राहुल शिवशंकर इस राय से इत्तेफाक़ नहीं रखते. वे कहते हैं, "एग्ज़िट पोल करने के लिए हर तरह के वेरिएबल को तौलना संभव नहीं होता है. इसके अलावा ग्राउंड पर भी ऐसी स्थिति है, न्वॉयज़ी डिमोक्रेसी है, चुनाव में कई तरह की चीज़ें काम करती हैं, ज़मीन पर भी विरोधाभासी स्थिति देखने को मिल रही है, ऐसे में अलग अलग एजेंसियों के परिणाम अलग अलग तो हो ही सकते हैं. हमारे दोनों सर्वे में यही तस्वीर उभरी है."

संजय कुमार कहते हैं, "शायद चैनल की कोशिश यही है कि वो क्रेडिट लेना चाहता है कि जो भी फैसला आए, हमारा सर्वे तो सही साबित हुआ है. इसके लिए ही ऐसी कोशिश हो सकती है."

दरअसल भारत में चुनाव सर्वेक्षण और एग्ज़िट पोल अभी भी प्रयोगों के दौर से गुजर रहा है, यही वजह है कि इसको लेकर जितने तरह के प्रयोग हो रहे हैं उतने ही तरह के सवाल उठ रहे हैं. कर्नाटक के मौजूदा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने तो इसे दो दिनों तक चलने वाला मनोरंजन बता दिया.

एनके सिंह कहते हैं, "भारत का समाज जाति, उपजाति, धर्म, सांप्रदाय तक, क्षेत्रीय भूभागों में बंटा है, यही वजह है कि भारत में ऐसे पोल्स सही साबित नहीं हो पाते हैं. बहुत हद तक साइंटिफिक नहीं माना जा सकता है, लेकिन कोई भी साइंस प्रयोग के दौर से गुजरता है, एक फ़ीसदी वोट का अंतर सीटों में काफ़ी अंतर ला सकता है."

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