तस्वीरों में: इतिहास के पन्नों में सिमटती ट्राम

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- Author, प्रभाकर एम.
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
कोलकाता भारत का अकेला महानगर है जहाँ आज भी ट्राम चलती है.
क़रीब 145 साल से पश्चिम बंगाल की राजधानी में इसे संचालित किया जा रहा है.
लेकिन आधुनिकीकरण और शहर की तेज़ रफ़्तार के आगे ट्राम धीमी साबित हुई और अब ये धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमट रही है.

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24 फ़रवरी 1873 के दिन कोलकाता के सियालदह स्टेशन से आर्मेनियन स्ट्रीट तक पहली बार ट्राम चली थी.
उस समय ट्राम को घोड़े खींचते थे. बीच में 4 साल बंद रहने के बाद साल 1880 में ट्राम की सेवा दोबारा शुरू की गई.

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इस दौरान स्टीम इंजन से ट्राम चलाने का भी असफल प्रयास किया गया. आख़िर में 27 मार्च, 1902 को बिजली से ट्राम चलाने में कामयाबी मिली.
ट्राम कोलकाता की धनी विरासत का अहम हिस्सा है. लगातार होने वाले निर्माण कार्यों - मसलन मेट्रो रूट और सड़कों के विस्तार, फ्लाईओवर आदि की वजह से इनका संचालन लगातार सिकुड़ रहा है.

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किसी दौर में पूरे महानगर में ट्राम लाइनों का जाल बिछा हुआ था. यह ऐतिहासिक हावड़ा ब्रिज को पार कर हुगली के दोनों किनारों को भी आपस में जोड़ता था.
साल 2011 में ट्राम के कुल 37 रूट थे और शहर में कुल 180 ट्राम थीं. लेकिन अब महज़ आठ ऐसे रूट बचे हैं जहाँ ट्राम चलती है और 40 ट्राम ही बची हैं.

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शहर में मेट्रो ट्रेन अब धीरे-धीरे ट्राम की जगह ले रही है. ख़ासकर, ईस्ट-वेस्ट मेट्रो का काम शुरू होने के बाद ट्राम के कई रूट बंद कर दिए गए हैं.
ट्राम के संचालन की ज़िम्मेदारी कोलकाता ट्राम कॉरपोरेशन (सीटीसी) के पास है. ये पश्चिम बंगाल परिवहन निगम का ही हिस्सा है.

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इसके कर्मचारियों की तादाद भी बीते सात साल में घटकर सात हज़ार से आधी रह गई है. इसका असर ज़ाहिर तौर पर ट्राम की सेवा पर पड़ा और यात्रियों ने भी ट्राम से किनारा करना शुरू कर दिया.
एक वक़्त था जब 75 हज़ार यात्री रोज़ाना ट्राम में सफ़र करते थे. अब उनकी संख्या महज़ 15 हज़ार बची है.
कभी प्रमुख सवारी हुआ करती थी
बॉलीवुड समेत कई दक्षिण भारतीय और बांग्ला फ़िल्मों में ट्राम को शूटिंग के लिए इस्तेमाल किया गया है.

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साल 2013 में सैफ़ अली खान और सोनाक्षी सिन्हा की फ़िल्म 'बुलेट राजा' के कुछ सीन की शूटिंग ट्राम में की गई थी. लगभग उसी समय विद्या बालन की फ़िल्म 'कहानी' और मणिरत्नम की फ़िल्म 'युवा' के कई सीन ट्राम में फ़िल्माए गए.
1930 के दशक में कोलकाता में तीन सौ से ज्यादा ट्रामें चलती थीं. तब ट्राम ही महानगर की प्रमुख सार्वजनिक सवारी थी.

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सत्तर के दशक में कोलकाता में इन ट्रामों की कितनी अहमियत थी, यह समझने के लिए एक उदाहरण ही काफ़ी है कि तब इसके किराए में एक पैसे की बढ़त के विरोध में कई दिनों तक हिंसा और आगज़नी हुई थी.

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ट्राम कर्मचारियों का आरोप है कि सरकार इस विरासत की ओर ध्यान नहीं दे रही है. और साल 2018 के दौरान इन ट्रामों में कोई निवेश नहीं होने से कर्मचारियों के आरोपों को बल भी मिलता है.
एक पूर्व कर्मचारी सोमेन दत्त कहते हैं, "परिवहन विभाग में काम करने वाले ज़्यादातर अधिकारी बाहरी राज्यों के हैं. उनको ट्रामों से कोई लगाव नहीं है. वो लोग इसे चलाना ही नहीं चाहते."

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सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी धीरेन नस्कर कहते हैं, "हम दफ़्तर आने-जाने के लिए ट्राम का ही इस्तेमाल करते थे. ये सस्ती सेवा थी और सुविधाजनक भी. लेकिन अब ये पिछड़ गई है. बावजूद इसके इस विरासत को बचाए रखना जरूरी है."

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कॉलेज छात्रा सोनाली सरकार कहती हैं, "अब इन ट्रामों से आना-जाना मतलब समय की बर्बादी. लेकिन फिर भी कोलकाता की इस पहचान को बचाए रखना अच्छा आइडिया है."
पश्चिम बंगाल के परिवहन मंत्री शुभेंदु अधिकारी का दावा है कि ट्राम कभी बंद नहीं होगी.

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वो कहते हैं, "सरकार ट्राम को पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनाए रखने के लिए तरह-तरह के कार्यक्रमों का आयोजन करती है. दुर्गा पूजा के दौरान इससे महानगर के पंडालों के दर्शन कराए जाते हैं."
"इसके अलावा विश्व पर्यावरण दिवस या विश्व कैंसर दिवस जैसे मौकों पर भी जागरूकता पैदा करने के लिए ट्राम का इस्तेमाल होता है."

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परिवहन मंत्री शुभेंदु अधिकारी बताते हैं कि महानगर में फैले ट्राम डिपो की अतिरिक्त ज़मीन का व्यावसायिक इस्तेमाल कर उस रकम का कुछ हिस्सा इस विरासत को बचाए रखने पर ख़र्च किया जाएगा, फ़िलहाल ऐसा प्लान बनाया गया है.
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