एससीओ में भारत के आने से क्या हासिल होगा?

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- Author, टीम बीबीसी
- पदनाम, दिल्ली
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समय चीन के दो दिवसीय दौरे पर हैं. मोदी चीन के नेतृत्व वाले क्षेत्रीय समूह शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के सम्मेलन में शामिल होने के लिए चीन पहुंचे हैं. इस बार भारत और पाकिस्तान दोनों ही सदस्य देश के रूप में शंघाई सहयोग संगठन में शामिल हो रहे हैं.
शनिवार को चिंगदाओ शहर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की औपचारिक मुलाक़ात हुई. इस मुलाक़ात के दौरान मोदी ने जिनपिंग को भारत आने का न्यौता दिया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया.
बीते डेढ़ महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ये दूसरी चीन यात्रा है. इससे पहले वो राष्ट्रपति जिनपिंग से अनौपचारिक मुलाक़ात के लिए वुहान पहुंचे थे.
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शंघाई सहयोग संगठन में सदस्य के तौर पर भारत का शामिल होना क्यों महत्वपूर्ण है?

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भारत का एससीओ में आना कितना असरदार?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं, "शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) में चीन, रूस के बाद भारत तीसरा सबसे बड़ा देश है. भारत का कद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ रहा है. एससीओ को इस समय दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन माना जाता है. एससीओ से जुड़ने से भारत को फ़ायदा होगा."
स्वर्ण सिंह कहते हैं, "भारतीय हितों की जो चुनौतियां हैं, चाहे वो आतंकवाद हों, ऊर्जा की आपूर्ति या प्रवासियों का मुद्दा हो. ये मुद्दे भारत और एससीओ दोनों के लिए अहम हैं और इन चुनौतियों के समाधान की कोशिश हो रही है. ऐसे में भारत के जुड़ने से एससीओ और भारत दोनों को परस्पर फ़ायदा होगा."
प्रधानमंत्री मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए भी चीन की यात्रा पर गए थे. इस यात्रा से पहले भी वो कई बार प्रधानमंत्री के तौर पर चीन जा चुके हैं. इस बार भारत पहली बार शंघाई सहयोग संगठन में पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल हो रहा है.

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भारत की चिंताएं
प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं, "शंघाई सहयोग संगठन में जितने दस्तावेज़ तैयार होंगे उनमें भारत की चिंताएं भी दिखेंगी. इससे पहले वुहान में जब प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की मुलाक़ात हुई थी उसमें कोई एजेंडा नहीं था. वो दोनों देशों की आपसी समझ को बढ़ाने की मुलाक़ात थी. लेकिन शनिवार को हुई मुलाक़ात में दोनों देशों के द्वीपक्षीय मुद्दों को सुलझाने की कोशिश की गई. ब्रह्मपुत्र के पानी के डेटा को लेकर एमओयू हुआ. चावल और अन्य कृषि उत्पादों के निर्यात को लेकर भी नई सोच बनी है. दवाइयों और सूचना प्राद्योगिकी के क्षेत्र में दोनों देशों के सहयोग को बढ़ाने पर बात हुई है."
भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा भी एक बड़ा मुद्दा है. बीते साल भारत और चीन के बीच व्यापारिक घाटा 51 अरब डॉलर था. प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह का मानना है कि व्यापारिक घाटे के इस मुद्दे को सुलझाने की भी बात भारत और चीन के बीच हुई है.
शनिवार को शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी की मुलाक़ात के बाद ब्रह्मपुत्र से जुड़े हाइड्रोलॉजिकल डेटा को साझा करने को लेकर भी समझौता हुआ है. ये समझौता कितना महत्वपूर्ण है, प्रोफ़ेसर सिंह बताते हैं, "ब्रह्मपुत्र दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी नदी है जो चीन के बाद भारत और बांग्लादेश से होकर गुज़रती है. भारत और चीन के बीच साल 2005 में ब्रह्मपुत्र के पानी से जुड़े डेटा को साझा करने को लेकर सहमति बनी थी. लेकिन बीते साल डोकलाम में हुए तनाव के बाद चीन ने भारत को डेटा देना बंद कर दिया था.''

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भारत-चीन के बीच अब भी कई विवाद
प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं, ''चीन ने कहा था कि तिब्बत में डेटा इकट्ठा करने के जो हाइड्रोलॉजिकल स्टेशन है उनकी मरम्मत चल रही है जिस वजह से डेटा नहीं मिल सकता है. शनिवार को हुए समझौते में इस डेटा से जुड़ी दिक्क़तों को सुलझा लिया गया है. ये भारत के लिए अहम है, क्योंकि पूर्वोत्तर में ब्रह्मपुत्र भारत की लाइफ़लाइन है और वहां रहने वाले लोगों के लिए इस नदी के जल बहाव के बारे में सटीक जानकारी रखना ज़रूरी है."
भारत और चीन के बीच आपसी तालमेल पर कितना भरोसा किया जा सकता है?
प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह का मानना है, "भारत और चीन का आपसी तालमेल अच्छा होना दोनों ही देशों के लिए बहुत ज़रूरी हो जाता है. अमरीका की विदेश नीति में बदलाव आने के बाद ये और भी महत्वपूर्ण हो गया है. अमरीका अब अमरीका फ़र्स्ट की नीति पर चल रहा है जिसकी वजह से एशिया-प्रशांत क्षेत्र के बड़े राष्ट्रों को दबंग नेता नई तरह की नीतियां अपना रहे हैं. अनौपचारिक मुलाक़ातें इसी नीति का हिस्सा है."

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"नरेंद्र मोदी 2018 में शी जिनपिंग से चार और मुलाक़ातें अलग-अलग सम्मेलनों में करने वाले हैं. ये नई तरह की कूटनीति हो रही है. चीन और भारत के बीच कई मुद्दों को लेकर गंभीर विवाद भी हैं. ऐसे में इन मुलाक़ातों से आपसी तालमेल और समझ बढ़ेगी और इन विवादों को सुलझाने की दिशा में बढ़ा जा सकेगा. बीते साल डोकलाम के मुद्दे को लेकर तनाव बढ़ा था, लेकिन बाद में नेताओं के बीच हुई द्वपक्षीय वार्ताओं से इसे सुलझाने में काफ़ी फ़ायदा मिला. नेताओं के बीच बढ़ती मुलाक़ातें दोनों ही देशों के लिए अच्छी बात है."
भारत और चीन पड़ोसी हैं, प्रतिद्वंदी हैं, समय-समय पर दोस्त और दुश्मन भी रहे हैं. दोनों ही देशों के रिश्ते हमेशा ही जटिल रहे हैं. क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी कूटनीति से भारत की स्थिति मज़बूत कर पाए हैं?
प्रोफ़ेसर सिंह कहते हैं, "भारत और चीन पुरानी सभ्यताएं हैं, तेज़ी से आगे बढ़ते बड़े देश हैं. उनके रिश्तों में सभी तरह के रंग हैं. दोस्ती है, कुछ साझेदारी है, साथ मिलकर आगे बढ़ने की कोशिशें हैं. दोनों नेताओं का दोस्ती का दर्शाना ये संकेत देता है कि दोनों ही देश उलझनों को सुलझाकर साथ मिलकर आगे बढ़ना चाहते हैं. ये कोशिश दोनों ही ओर से नज़र आती है. चीन मानता है कि उसके बेल्ट वन रोड इनिशिएटिव में भारत का जुड़ना ज़रूरी है. दोनों देश क़रीब आ रहे हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि जो विवाद हैं वो तुरंत सुलझ जाएंगे. दोनों देशों की कोशिश ये है कि तनाव के मुद्दों की वजह से रिश्ते ख़राब न हो पाएं."

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पाकिस्तान से सुधरेंगे संबंध?
शंघाई सहयोग संगठन में पाकिस्तान भी पहली बार सदस्य देश के रूप में शामिल हुआ है और ईरान पर्यवेक्षक की भूमिका में इस साल शामिल है. ऐसे में एससीओ का महत्व भी काफ़ी बढ़ गया है.
पाकिस्तान के एससीओ में शामिल होने से क्या भारत और पाकिस्तान के बीच जो तनाव है क्या उसका असर एससीओ पर होगा?
बीजिंग स्थित वरिष्ठ पत्रकार सैबल दास गुप्ता कहते हैं, "चीन की पूरी कोशिश है कि भारत और पाकिस्तान का तनाव एससीओ में न उभरे. चीन का बार-बार ये कहना है कि अगर देशों के अंदरूनी झगड़े सामने आए तो एससीओ टूट जाएगा."
सैबल दास गुप्ता कहते हैं, "चीन हाल के दशकों में बड़ी शक्ति बना है और एससीओ का मज़बूत होना चीन के लिए बहुत महत्व रखता है. ऐसे में चीन पूरी कोशिश करेगा कि भारत और पाकिस्तान का तनाव इस फोरम में सामने न आए."
इस बार ईरान भी सम्मेलन में शामिल हो रहा है. ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर हुए समझौते से अमरीका के बाहर हो जाने के बाद क्या एससीओ के देश ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर कई बात करेंगे?

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ईरान चीन का नया मोहरा?
सैबल दास गुप्ता कहते हैं, "इसे हमें व्यापक परिदृश्य में देखना होगा. तीन दिन बाद सिंगापुर में डोनल्ड ट्रंप और किम जोंग उन की मुलाक़ात हो रही है. इस मुलाक़ात को लेकर चीन में चिंता है. चीन को लग रहा है कि कहीं किम और ट्रंप की दोस्ती कुछ ज़्यादा ही गहरी न हो जाए और उत्तर कोरिया में चीन की भूमिका कम हो जाए. ऐसे में अमरीका पर दबाव बनाने का ईरान भी एक मोहरा है. ईरान के राष्ट्रपति के चीन पहुंचने से दो दिन पहले ही चीन ने एक बयान जारी कर कह दिया था कि ईरान के परमाणु समझौते को लेकर अमरीका के क़दम के बाद चीन ईरान का समर्थन करेगा. ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी का एससीओ में पहुंचना बहुत महत्व रखता है."
सैबल कहते हैं, "ईरान का चीन के न्यौते के स्वीकार कर रूहानी का चीन पहुंचना एक बड़ा संकेत है. ईरान रूस, चीन और कुछ हद तक भारत के साथ हाथ मिलाकर अमरीका को जबाव देना चाहता है और चीन भी ये मौक़ा बना रहा है. क्योंकि अमरीका पर दबाव डालने के बहुत अच्छा तरीका ये है कि रूस को शामिल किया जाए. चीन ने ये कर भी दिया है. परमाणु समझौते को लेकर ईरान और अमरीका के बीच जारी तनाव में चीन ने ईरान को समर्थन कर दिया है. ऐसे में एससीओ सम्मेलन में ये एक नया खेल बन रहा है जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बहुत मायने रखता है."
(बीबीसी संवाददाताओं से बातचीत पर आधारित)
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