झारखंडः प्रधानमंत्री मोदी करवा रहे मंदिरों की मरम्मत, पर लोग नाराज़

    • Author, रवि प्रकाश
    • पदनाम, मलूटी (दुमका) से, बीबीसी हिंदी के लिए.

2015 की गणतंत्र दिवस परेड में झारखंड ने 108 मंदिरों वाले गांव मलूटी की झांकी पेश की थी, जिसे दूसरा पुरस्कार मिला था और इस बहाने देशभर के लोग मलूटी से परिचित हुए थे.

उसी साल 2 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुमका आए तो उन्होंने मलूटी के मंदिरों के जीर्णोद्धार की शुरुआत की.

तब लगा कि इस सरकारी पहल से मलूटी का कायाकल्प होगा. लेकिन मलूटी के लोग आज नाराज़ हैं. उन्हें जीर्णोद्धार के तौर-तरीके से ऐतराज है.

मैं जब मलूटी पहुंचा तो शाम ढलने लगी थी. मौलीक्षा मंदिर के पास मेरी मुलाकात उत्पल चौधरी समेत कुछ ग्रामीणों से हुई. लोगों का कहना था कि उनके गांव के इतिहास और मंदिरों के वर्तमान स्वरूप से खिलवाड़ किया जा रहा है. लिहाजा, इन मंदिरों का जीर्णोद्धार तत्काल रोका जाना चाहिए.

स्वरुप बदल जाएगा, तो क्या बचेगा

उत्पल चौधरी ने बीबीसी से कहा, "देखिए, ये लोग जिस तरीके से मंदिरों का जीर्णोद्धार कर रहे हैं, उससे इनका ओरिजिनल स्वरूप ही बदल जाएगा. कई सौ साल पहले बने इन मंदिरों के निर्माण में सुरखी (पक्की ईंटों का बारीक बुरादा) और चूने का उपयोग किया गया था."

"अब जीर्णोद्धार के नाम पर इन मंदिरों को सीमेंट और ईंटों के टुकड़ों से जोड़ा जा रहा है. इऩका रंग भी बदल दिया गया है. अब जब मंदिरों का स्वरूप ही बदल जाएगा तो लोग यहां क्या देखने आएंगे."

कहां है मलूटी

पश्चिम बंगाल सीमा पर बसा मलूटी झारखंड के दुमका जिले की परिधि में आता है. शिकारीपाड़ा प्रखंड के इस गांव में 350 घर हैं.

यहां करीब 2500 लोग रहते हैं. इनकी भाषा बंगाली है. किसी जमाने में यह बीरभूम जिले का हिस्सा हुआ करता था, जो अब बंगाल में है.

लिहाजा यहां के अधिकतर लोग कोलकाता या रामपुरहाट जाकर बस गए हैं. गांव में वही लोग हैं जो या तो यहां खेती-मजदूरी करते हैं या फिर नौकरी. लिहाजा, काली पूजा जैसे आयोजनों पर ही गांव पूरी तरह से गुलजार होता है.

बंगाल पर निर्भरता

मलूटी की मुखिया मुंगीला टुडु ने कहा, "गांव में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है. बिजली की आपूर्ति गांव की सबसे बड़ी समस्या है. इस कारण सरकार द्वारा बनाया गया गेस्ट हाउस भी गर्मियों में खाली ही रहता है."

उन्होंने आगे कहा, "गांव का अपग्रेड हाई स्कूल सिर्फ चार शिक्षकों के भरोसे है. लिहाजा, पढ़ाई के लिए बच्चे बंगाल के रामपुर हाट जाते हैं. इसी तरह पास में कोई अच्छा अस्पताल नहीं है, तो इलाज के लिए भी लोगों को रामपुर हाट जाना पड़ता है."

108 मंदिरों का गांव

कभी मलहूटी के नाम से जाना जाने वाला गांव अब मलूटी कहा जाता है. यहां किसी ज़माने में 108 मंदिर और उतने ही तालाब थे. अब सिर्फ 72 मंदिर बचे हैं.

गांव मे प्रवेश करते ही हर तरफ मंदिरों की पंक्तियां दिखती है. इनमें 58 शिव मंदिर हैं बाकी के 15 मंदिर दूसरे देवी-देवताओं के हैं. ऐसे ही एक मंदिर के पास मैं कविता चटर्जी से मिला.

उन्होंने बताया कि भले ही मंदिरों की अवस्था खराब हो गई हो लेकिन गांव की महिलाएं सुबह-शाम इनमें पूजा करती हैं. इन मंदिरों में कई जगह टूटे लेकिन विशालकाय शिवलिंग हैं. इन शिवलिंगों की पूजा नहीं होती.

'पुरातत्व विभाग ले जिम्मा'

मलूटी के मंदिरों पर लंबे समय से शोध कर रहे 82 साल के गोपालदास मुखर्जी इन मंदिरों के जीर्णोद्धार के काम में भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) की भागीदारी चाहते हैं.

उनका मानना है कि अगर एएसआई इनका जीर्णोद्धार करे, तो मंदिरों का मूल स्वरूप कायम रह सकेगा. उन्होंने बताया कि साल 1979 में उन्होंने भागलपुर के तत्कालीन कमिश्नर अरुण पाठक से मंदिरों को एएसआई से संरक्षित कराने की मांग की थी.

तब उन्होंने इसका आश्वासन भी दिया. बाद में वे बिहार के मुख्य सचिव बने तो पुरातत्व विभाग ने यहां काम भी किया. लेकिन अब एएसआई यह काम नहीं कर रही है.

सैकड़ों साल पुराने हैं मंदिर

गोपालदास मुखर्जी ने बीबीसी से कहा, "मलूटी के मंदिरों की आयु कई सौ साल पुरानी है. कोई इन्हें 16 वीं शताब्दी का बताता है, तो कई 17 वीं शताब्दी का."

"इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है कि यहां सबसे पहले किस मंदिर का निर्माण कराया गया और वह निर्माण कब हुआ. लेकिन, कुछ मंदिरों पर निर्माण का वर्ष अंकित है. उस आधार पर यहां सबसे पुराना मंदिर साल 1719 (शक संवत 1641) में राजा राखर चंद्र ने बनवाया था."

वो बताते हैं, "मंदिर पर अंकित तिथि के मुताबिक इसका निर्माण जेठ (हिंदी महीना) में शुरू हुआ और अगहन (हिंदी महीना) में इसे पूरी तरह बना लिया गया."

108 मंदिरों-तालाबों वाली धरोहर

बकौल गोपाल दास मुखर्जी, यहां के ज़मींदार (राजा) कई भाई थे और उनके बीच मंदिरों के निर्माण की होड़-सी लग गई थी. इस कारण इनके वंशजों ने एक-दूसरे से अधिक मंदिर बनाने को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया और एक सदी तक यह काम चलता रहा.

देखते ही देखते मलूटी में 108 मंदिर और उतने ही तालाब बना दिए गए. इनमें से सबसे ऊंचा मंदिर 60 फीट और सबसे छोटा 15 फीट का है. इनमें 30 मंदिर टेराकेटा शैली के हैं. बाद के दिनों में ग्रामीणों ने आठ नए मंदिर भी बनवाए हैं.

हेरिटेज पर काम कर रही संस्था ग्लोबल हेरिटेज फंड ने साल 2010 में मलूटी के मंदिरों को दुनिया के 12 सर्वाधिक लुप्तप्राय धरोहरों की सूची में शामिल किया था.

इस सूची में भारत से शामिल होने वाली यह इकलौती धरोहर है. अब झारखंड सरकार ने भी मलूटी को यूनेस्को के विश्व धरोहरों की सूची में शामिल कराने का प्रयास शुरू किया है.

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