व्यंग्यः तूफ़ान में हुई मौतों की फ़ोटोजेनिक वैल्यू नहीं

तूफान

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    • Author, आलोक पुराणिक
    • पदनाम, व्यंग्यकार, बीबीसी हिंदी के लिए

राजस्थान, यूपी में तूफ़ान में सौ से ज्यादा मौतें हो गईं, भाई कुछ कवरेज कर लेते-अपने एक टीवी एंकर दोस्त से मैंने कहा.

उसने जवाब दिया-सास बहू और तूफ़ान नामक प्रोग्राम बना लेते हैं, उन्तीस मिनट सास बहू दिखा देंगे, एक मिनट तूफ़ान दिखा देंगे. सास बहू, नागिन सपेरा, हनीप्रीत की गुफ़ा, किम जोंग के एटम बम- इनमें कहीं तूफ़ान फिट होते हों, तो बताओ फिट कर देंगे. वरना कहां से दिखाएं यूपी का तूफ़ान.

हिंदी के टीवी चैनलों में करीब ढाई बजे दोपहर से साढ़े तीन बजे तक बड़ी से बड़ी ख़बर को सास बहू के फ्रेम में आना पड़ेगा. लगभग हर चैनल पर सास बहू ही चल रहा होता है. तूफ़ान ना सनसनी है ना वारदात है. ना चुनावी दंगल है, तूफ़ान सिर्फ तूफ़ान है, जिसने ऐसे लोगों को मारा है, जिनकी मौत की फ़ोटोजेनिक वैल्यू नहीं है.

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मौत की फ़ोटोजेनिक वैल्यू

मौत की वैल्यू होती है, फ़ोटोजेनिक या नान फ़ोटोजेनिक. फ़ोटोजेनिक से कमाई हो जाती है. नॉन फ़ोटोजेनिक मूड बिगाड़ देती है. मौत का फ़ोटोजेनिक होना. बड़े स्टार की मौत ऐसे ही होती है. स्टार के जाने के बाद उसके प्रेमगीत, बरसात गीत दिखाकर स्टार को श्रद्धांजलि दी जाती है. बस नहीं चलता, नहीं तो पूरे साल चलती यह श्रदांजलि. जिस श्रद्धांजलि से टीआरपी निकलने लगे, उसमें सहज श्रद्धा टीवी चैनलों की हो जाती है. तूफ़ान में मरनेवाले नान फ़ोटोजेनिक होते हैं-उड़े छप्पर, टूटी कच्ची दुकान. कतई टीआरपी ना आती.

बरसों बरस मैं सोचता रहा कि दुनिया जहान में दंगा हो जाये, पर कोई दंगा दिल्ली के पावर सेंटर लुटियन जोन के किसी नेता को नहीं मारता. इन्हें तूफ़ान भी नहीं मारता. दंगा हो या तूफ़ान, लुटियन जोन से दूर रहता है.

यूपी में तूफ़ान चल रहा है, देश के सारे बड़े नेता कर्नाटक में चल रहे हैं. जिन्ना, गब्बर सिंह, सांभा, कालिया सब आ लिए कर्नाटक चुनाव में, पर यूपी के सीएम योगीजी को यूपी का तूफ़ान उस तरह से याद नहीं आ रहा है, जिस तरह से याद आना चाहिए था.

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लोकतंत्र का गब्बरीकरण

राहुल गांधी को अब यूपी याद नहीं आ रहा है, जहां से उनका परिवार दशकों से लोकसभा सीटें जीतता रहा है. पंद्रह मिनट राहुलजी तूफ़ान पर बोल सकते हैं, नहीं बोलेंगे. वह टीपू सुल्तान पर बोलेंगे. वह टीपू सुल्तान से लेकर सांभा पर बोल रहे हैं. सांभा से वोट मिलने की उम्मीद है, तूफ़ान से नहीं.

मुल्क के लोकतंत्र की त्रासदी यह है कि उम्मीद सांभा से रहती है, तूफ़ान से उपजे मुद्दों से नहीं. लोकतंत्र का गब्बरीकरण इसे कहते हैं.

मैंने फिर निवेदन किया अपने टीवी एंकर दोस्त से-प्लीज कुछ तो दिखाओ -यूपी राजस्थान के तूफ़ान पर.

उसने पूछा-तूफ़ान प्रभावित इलाकों में नागिनों के बिल मिले हैं क्या. तब हम दिखा देंगे कि तूफ़ान से निकली नयी तरह की नागिन. भानगढ़ के भूत लेकर आए तूफ़ान राजस्थान में-कुछ ऐसी रिपोर्ट बनाने का स्कोप है क्या?

टीवी न्यूज़ बगैर भानगढ़ के भूत के चलाना बहुत मुश्किल है. भूत ना हों, तो नागिन हों. नागिन ना हों, तो कम से कम मौत तो फ़ोटोजेनिक हो.

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तो पोर्न स्टार को कैसे देंगे श्रद्धांजलि

मैं तो इस आशंका में डरा रहता हूं कि उस पोर्न स्टार को भारतीय टीवी चैनल किस तरह से श्रद्धांजलि देंगे. सुबह से रात तक यही दिखाते रहेंगे-यह उनकी पहली फ़िल्म थी, यह उनकी दूसरी फ़िल्म थी. यह साफ़ ना बताएंगे कि उनकी सारी फ़िल्मों में उनका रोल एक जैसा था.

टीवी एंकर दोस्त मुझे डपट भी देता है-धरे रहिए तूफ़ान से उपजे मुद्दे अपने पास. नागों और सासों से पब्लिक ज़्यादा प्रभावित है. पब्लिक का जिम्मा है.

पब्लिक का जिम्मा है कि कर्नाटक में रेड्डी ब्रदर्स का जलवा कायम है. पब्लिक का जिम्मा है कि कोर्ट में घोषित अपराधी और सजाय़ाफ्ता लालूजी का बिहार में असर कायम है. पब्लिक का जिम्मा है कि तूफ़ान की ख़बर को भी नागिन मोड में या फ़ोटोजेनिक मोड में आना होगा.

बहुत गहराई से अब मैं यह चिंतन कर रहा हूं कि तूफ़ान से हुई मौतों को भी कैसे फ़ोटोजेनिक बनाया जाये.

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