नज़रिया: 'पोप का वेटिकन भूत दिखाएं 20 लाख रुपए ले जाएं'

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- Author, डॉ. हमीद दाभोलकर
- पदनाम, समाजसेवी
दुनिया भर में ईसाई धर्म मानने वाले लोगों के लिए वेटिकन सिटी सबसे अधिक पूज्यनीय स्थान है. ये वो शहर है जहां पर ईसाई धर्म के सबसे बड़े धर्मगुरु पोप रहते हैं.
वेटिकन सिटी में दुनिया भर के पादरियों के लिए धार्मिक मामलों से जुड़े कई तरह के पाठ्यक्रमों का आयोजन कराया जाता है.
अब वेटिकन ने अपने पादरियों के लिए भूत-प्रेत भगाने के एक कोर्स के आयोजन की योजना बनाई है. वेटिकन ने अपने इस क़दम से एक विवाद को जन्म दिया है.
वेटिकन में सिखाया जाएगा भूत कैसे भगाते हैं?

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इस कोर्स में पादरियों को ये सिखाया जाएगा कि वे भूत या शैतानी शक्तियों का सामना कर रहे लोगों की मदद कैसे करें.
ईसाई धर्म में भूत-प्रेत और शैतानी शक्तियों में विश्वास करने की परंपरा रही है.
ईसाई धर्म में संत की उपाधि पाने के लिए चमत्कार करना एक अहम ज़रूरत मानी जाती है. मदर टेरेसा को संत की उपाधि मिलने का आधार भी चमत्कार करने का दावा ही था.
लेकिन दुनिया भर में तर्कशास्त्रियों ने चर्च के इस कदम की आलोचना की थी.
हालांकि चर्च ने उनकी आलोचनाओं के बावजूद संत की उपाधि देने की ये परंपरा जारी रखी है.
ईसाई धर्म को पुरातन काल में ले जाने की कोशिश

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वेटिकन द्वारा इस कोर्स के आयोजन का फ़ैसला चर्च को पुनर्जागरण काल से पहले के दौर में ले जाने की कोशिश दिखाई पड़ती है. ऐसे में गंभीरता से चर्च के इस कदम की समीक्षा किए जाने की ज़रूरत है.
वेटिकन सिटी के सूत्रों ने ये कोर्स शुरू करने के पीछे जो तर्क दिया है वो ये है कि समाज से ऐसा कोर्स शुरू करने मांग आ रही थी.
ख़बरों के मुताबिक़, इटली में 50 हज़ार लोग शैतानी शक्तियों और भूत-प्रेत से छुटकारा पाने के लिए चर्च की मदद लेते हैं.
अगर हम पूरे यूरोप की बात करें तो ये आंकड़ा 10 लाख लोगों तक पहुंच सकता है.
दिमाग़ी बीमारी या भूत-प्रेत का चक्कर

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हाल ही में मस्तिष्क विज्ञान और मनोविज्ञान के क्षेत्र में जो प्रगति हुई है उसके बाद हम आसानी से समझ सकते हैं कि लोग ऐसी समस्याओं से राहत क्यों पाना चाहते हैं.
लेकिन इसमें जो बात समझ में नहीं आती है वो ये है कि चर्च ने उन्हें आदिम युग के दौर वाली मदद देने का फ़ैसला क्यों किया.
मस्तिष्क विज्ञान और मनोविज्ञान के क्षेत्र की हालिया प्रगति बताती है कि कुछ लोग ऐसी बीमारियों से पीड़ित हो सकते हैं जिनकी वजह से उन्हें अवास्तविक आवाज़ें और तस्वीरें नज़र आ सकती हैं.
ये लक्षण स्कित्ज़ोफ़्रीनिया जैसी बीमारियों में सामने आ सकते हैं. इससे प्रभावित लोग बिना किसी हरकत के अपने दिमाग़ में रासायनिक दिक्कतों की वजह से आवाजें और तस्वीरें देख-सुन सकते हैं.
ऐसे में जो परिवार और व्यक्ति इन बीमारियों से अनभिज्ञ होते हैं, वे ऐसे अनुभवों को भूत-प्रेत से जोड़कर देख सकते हैं.

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ऐसे अनुभवों से जुड़ी धारणाओं के चलते ऐसे परिवार और लोग एक्सॉर्सिज़्म (जादू-टोना) का सहारा ले सकते हैं.
आर्थिक, पेशेगत और अपने संबंधों में तनाव झेल रहे लोग भी अपने दुखों के लिए अलौकिक शक्तियों को ज़िम्मेदार मान सकते हैं.
अपने दुखों के लिए दूसरों को ज़िम्मेदार ठहराना
अपने दुखों के लिए दूसरों को ज़िम्मेदार ठहराना एक मानवीय लक्षण है.
एक बेहतर धर्म को लोगों को उनके दुखों के असली कारण जानने के लिए प्रेरित करने और उनका सामना करने के लिए सक्षम बनाना चाहिए.
लेकिन चर्च ने ऊपर लिखी स्थितियों के लिए जो समाधान दिया है उसे लोगों को दिग्भ्रमित करना समझा जा सकता है.

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अगर चर्च ऐसे लोगों की असल में मदद करना चाहता है तो पादरियों को मानव मन और दिमाग़ को समझने से जुड़ी पढ़ाई करने में मदद करनी चाहिए.
ये बताया जाना चाहिए कि कुछ लोगों को ऐसे अनुभव क्यों होते हैं और उन्हें मनोरोग विशेषज्ञों की मदद लेने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए.
अवैज्ञानिक चीज़ों का समर्थन करता रहा है चर्च
चर्च द्वारा अवैज्ञानिक चीजों का समर्थन करने का एक लंबा इतिहास रहा है.

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लगभग तीन सौ साल पहले गैलीलियो ने अपने आकलनों के बाद ये सिद्ध किया था कि "धरती ब्रह्मांड का केंद्र नहीं है और सिद्ध किया कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है न कि सूर्य पृथ्वी का." इस पर चर्च ने उन्हें बधाई देने की जगह मृत्युदंड दे दिया.
हालांकि, गैलीलियो ने चर्च से माफ़ी मांगकर अपने मृत्युदंड को उम्रकैद में बदलवा लिया.
पोप के सामने विज्ञान की ओर जाने का मौक़ा
तीन सौ साल बाद चर्च ने अपनी ग़लती के लिए गैलीलियो से माफ़ी मांगी. चर्च की ओर से उठाया गया ये क़दम बेहद स्वागत योग्य था. चर्च की ओर से विनम्रता का भाव दिखाए जाने के बाद इससे धर्म की गरिमा बढ़ी है.
विज्ञान हमेशा ही अपनी ग़लतियों से सीखने के लिए उदार रहा है.

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अगर वेटिकन अपनी तीन सौ साल पुरानी ग़लती को नहीं दोहराना चाहता है तो इसे एक्सॉर्सिज़्म पर अपना कोर्स वापस लेना चाहिए.
कई वैज्ञानिकों और लेखक जैसे रिचर्ड डॉकिन और सैम हैरिस ईसाई धर्म में व्याप्त अवैज्ञानिक प्रथाओं की आलोचना कर चुके हैं.
सैम हैरिस की किताब 'अ लेटर टू क्रिस्चियन नेशन' और 'एंड ऑफ़ फ़ेथ' उन लोगों को जरूर पढ़नी चाहिए जो इस विषय के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं.

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पोप फ़्रांसिस के विचार काफ़ी प्रगतिशील हैं. उन्होंने समलैंगिकता के मुद्दे को लेकर खुले दिल का परिचय दिया है.
पोप फ़्रांसिस और चर्च के पास ये एक बेहतर मौका है जब वह वैज्ञानिक ढंग से सोच बनाने को समर्थन दे सकते हैं.
यूरोपीय देशों से एक कदम आगे भारत
भारत में भी ऐसे कई तथाकथित बाबा और धर्मगुरु हैं जो दावा करते हैं कि वे अपनी शक्तियों के बल पर भूत और शैतान भगा सकते हैं.
साल 2013 में महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के 20 साल लंबे चले संघर्ष और इसके नेता नरेंद्र दाभोलकर की कुर्बानी के बाद महाराष्ट्र एंटी ब्लैक मैजिक एक्ट पास करने वाला पहला प्रदेश बन गया.
ये अपनी तरह का पहला क़ानून था जिसमें धर्म के नाम पर अलौकिक शक्तियों का दावा करके किसी व्यक्ति के शोषण को सज़ा योग्य अपराध माना गया.
ये क़ानून बनने के बाद ऐसे 400 से ज़्यादा बाबाओं को जेल में पहुंचाया जा चुका है जिन्होंने आम लोगों को धर्म के नाम पर ठगा था.

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कर्नाटक सरकार ने भी इस क़ानून को पारित कर दिया है. इसके अलावा पंजाब, हरियाणा, बिहार और असम ने भी इस दिशा में काम शुरू कर दिया है.
इस तरह का क़ानून पास करना उन चंद उदाहरणों में से एक है जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि चीज़ों को वैज्ञानिक आधार पर देखने की संस्कृति के मामले में भारत यूरोपीय देशों से एक क़दम आगे है.
महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने ऐसे किसी भी शख़्स को बीस लाख रुपये की चुनौती दी है जो भूतों और शैतानी ताकतों को सामने ला सके.
अगर चर्च अपना ये कोर्स वापस नहीं लेता है तो उसे ये चुनौती स्वीकार करके शैतानी शक्तियों को लोगों के सामने लाना चाहिए.












