कठुआ: आख़िर कौन है बकरवाल समुदाय?

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- Author, मोहित कंधारी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, जम्मू से
जब से कठुआ रेप और हत्या का मामला उबाल पर है, जम्मू-कश्मीर के मैदानी इलाकों में रहने वाले बकरवाल समुदाय के लोग ख़ुद को महफूज़ नहीं मान रहे.
तनावपूर्ण हालात और तापमान बढ़ने की वजह से इस साल उन्होंने समय से पहले ही जम्मू छोड़ ठंडे इलाकों में जाने का फ़ैसला कर लिया है.
ऐसा करना उनके लिए इसलिए भी ज़रूरी था क्योंकि बारिश के इंतज़ार में उन्हें मवेशियों के लिए पानी और चारे का इंतज़ाम करना मुश्किल हो रहा था.
8 साल की मासूम बच्ची के परिवार के सदस्य भी कठुआ के रसाना गांव में अपने घर पर ताला लगाकर माल मवेशी के साथ अगले पड़ाव की ओर निकल पड़े हैं.

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उनके साथ-साथ अन्य इलाकों में डेरा डाले ऐसे सैकड़ों गुर्जर बकरवाल परिवार इस समय जम्मू के मैदानी इलाकों से कश्मीर और दूसरे पहाड़ी इलाकों की तरफ रुख़ कर रहे हैं.
गर्मियों के दिन बिताकर ये लोग नवम्बर महीने में मैदानी इलाकों में लौट आते हैं. ऊपरी इलाकों में बर्फ़बारी शुरू होने के साथ ही यह अपना डेरा बदल लेते हैं.
जम्मू श्रीनगर राष्ट्र मार्ग पर जगह जगह ये लोग अपने माल मवेशी के साथ चलते दिखाई दे जाएंगे. कुछ लोग सड़क मार्ग छोड़कर सीधे पहाड़ी रास्तों के ज़रिये अपनी मंज़िल का सफ़र करते हैं.
जहां रुकने की जगह मिलती है कुछ देर के लिए ये लोग वहीं अपना डेरा जमा लेते हैं. कुछ देर आराम कर अपने मवेशियों को पानी पिलाकर फिर अगले पड़ाव की और निकल पड़ते हैं.
उनका जीवनचक्र यूं ही निरंतर चलता रहता है, कभी रुकता नहीं.

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भेड़-बकरी चराने का काम करते हैं बकरवाल
बुनियादी तौर पर गुर्जर समाज के एक बड़े और रसूखदार तबके को 'बकरवाल' कहा जाता है.
उनको यह नाम कश्मीरी बोलने वाले विद्वानों ने दिया है. दूसरी भाषा में बोले तो गुर्जर समुदाय के लोगों का दूसरा नाम बकरवाल भी है.
बकरवाल समुदाय से जुड़े लोगों की बड़ी संख्या भेड़-बकरी चराने का काम करती है. ऐसे बहुत से नेता हैं जो बकरवाल होते हुए भी अपने आप को गुर्जर नेता कहलाना पसंद करते हैं.
इनमें से कुछ लोग हैं जो थोड़ा पढ़-लिख गए हैं और लगातार इस कोशिश में हैं कि उनके समुदाय के लोग भी धीरे-धीरे पढ़-लिख जाएं और दुनिया की ख़बर रखें.
लेकिन आज़ादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी ये लोग अपना जीवनयापन आसमान की नीली छतरी के नीचे मैदानी और पहाड़ी इलाकों में करते हैं और अपने मवेशियों के साथ रहते हैं.
लंबे समय से गुर्जर और बकरवालों के जीवन से जुड़े पहलुओं पर रिसर्च कर रहे जावेद राही ने बीबीसी हिंदी को बताया कि गुर्जर और बकरवालों को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है.

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सचिव की हैसियत से ट्राइबल रिसर्च और कल्चरल फाउंडेशन से भी जुड़े जावेद राही के मुताबिक, कुछ गुर्जर और बकरवाल पूरी तरह से खानाबदोश (फुली नोमाद) होते हैं. ये लोग सिर्फ जंगलों में गुज़र बसर करते हैं और इनके पास कोई ठिकाना नहीं होता.
दूसरी श्रेणी में आंशिक खानाबदोश (सेमी नोमाद) आते हैं. जावेद राही के अनुसार ये वो लोग हैं जिनके पास कहीं एक जगह रहने का ठिकाना है और वो आस पास के जंगलों में कुछ समय के लिए चले जाते हैं और कुछ समय बिताकर वापस अपने डेरे पर आ जाते हैं.
तीसरी श्रेणी में शरणार्थी ख़ानाबदोश (माइग्रेटरी नोमाद) आते हैं जिनके पास पहाड़ी इलाकों में धोक (रहने का ठिकाना) मौजूद है और यहां मैदानी इलाकों में भी रहने का ठिकाना है.
गुर्जर और बकरवाल हिंदुस्तान में 12 राज्यों में रह रहे हैं. भारत के अलावा पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में भी इनकी ख़ासी संख्या है.
जावेद राही के मुताबिक इनकी ज़ुबान, लिबास, खान पान और रहन-सहन इनकी पहचान है और इतना लम्बा अरसा बीत जाने के बाद भी आज तक उसमें कुछ बदलाव नहीं आया है. इसकी बड़ी वजह तेजी से बदल रही दुनिया के साथ उनका सीधा संपर्क न होना है.
जावेद राही बताते हैं एक लम्बे संघर्ष के बाद 1991 में बकरवालों को आदिवासी का दर्ज़ा मिला.
2011 की जनगणना के मुताबिक, जम्मू कश्मीर में गुर्जर बकरवाल की कुल आबादी लगभग 12 लाख के करीब है यानी कुल जनसंख्या का 11 प्रतिशत.
जावेद राही ने बीबीसी हिंदी को बताया कि जनगणना के मुताबिक 9.80 लाख गुर्जर और 2.17 लाख बकरवाल जम्मू कश्मीर में रह रहे हैं.
जावेद राही कहते हैं यह आंकड़ा भी सटीक नहीं है. इसकी बड़ी वजह यह है कि जिस समय जनगणना अधिकारी ज़मीन पर यह गिनती कर रहे थे, उस समय बड़ी संख्या में बकरवाल लोग अपनी धोक में थे और कुछ ख़ानाबदोश थे जिसके चलते उनकी ठीक ढंग से गिनती नहीं हो पाई. उनके अनुमान के मुताबिक ऐसे बकरवाल/गुर्जर लोग लगभग पांच-छह लाख के बीच हैं.

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बकरवालों की माली हालत
अपने माल-मवेशी बेचकर बसर करने वाले बकरवाल लोग मोटे तौर पर भेड़ बकरी, घोड़े और कुत्तों को पालते हैं.
जम्मू और कश्मीर में जो गोश्त की मांग है वो राजस्थान के रास्ते मंगवाए गए जानवरों से पूरी होती है और रियासत में बसे गुर्जर/बकरवाल ख़ास तौर से ईद के मौके पर, त्योहार के समय और पारंपरिक रीति रिवाजों के समय स्थानीय लोगों की मांग पूरी करते हैं.
जावेद राही के मुताबिक बकरवाल समुदाय के लोग आज भी अपने इस्तेमाल के लिए काम आने वाला सामान 'बार्टर सिस्टम' यानी अदला-बदली करके ही खरीदते हैं.
इन लोगों के बैंक में खाते नहीं होते और न ही बैंकिंग सिस्टम में इस समुदाय के लोगों का विश्वास होता है.
उनके मुताबिक एक लम्बे समय से उनकी यह मांग रही है कि जरूरत के अनुसार उनको खाद्य सुरक्षा दी जाए लेकिन सरकार अभी तक एक ठोस नीति नहीं बना पाई.
जावेद राही कहते हैं, "उन्होंने सरकार से इसकी सिफारिश भी की थी लेकिन अभी तक उनकी ओर से इस पर ध्यान नहीं दिया गया है.''
उनका कहना था कि सरकार अभी तक इस बात को समझ नहीं पाई है कि ये लोग एक जगह नहीं बसे हैं. अगर सरकार को इनकी मदद करनी है तो कोई रचनात्मक योजना बनानी पड़ेगी जिसमें इनकी मदद करने वाला भी मोबाइल रहे. लेकिन आज तक ऐसा कुछ नहीं हो पाया है.

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सामाजिक सुरक्षा और सेहत
बकरवाल समुदाय के लोग आज भी बड़ी संख्या में पढ़ाई से महरूम हैं. सरकार ने बड़ी संख्या में मोबाइल स्कूल का इंतजाम किया.
इनके बीच से थोड़ा बहुत पढ़-लिख निकले नौजवानों को इन मोबाइल स्कूलों में नौकरी भी दी गई लेकिन आज तक इस योजना की कामयाबी पर सवालिया निशान लगे हुए हैं.
अपने डेरे के साथ चंदवारी जाते हुए बकरवाल बशारत हुसैन ने बीबीसी हिंदी को बताया कि सरकार ने स्कूल तो खोल दिए लेकिन वहां पढ़ाई करना संभव नहीं.
उनका कहना था जब हम तीन-चार महीने एक जगह पर रहते हैं और फिर दूसरे ठिकाने के लिए निकल पड़ते हैं ऐसे में बच्चे पढ़ाई कैसे करेंगे.
उन्होंने ताज़ा हालात के हवाले से सरकार से बस एक ही मांग रखी है कि उनको और उनके डेरों को उजाड़ा न जाए.
बशारत हुसैन ने बताया कि जब जब वो सड़क के रास्ते अपने ठिकाने पर जाते हैं रास्ते में यातायात की वजह से बड़ी परेशानी आती है.
उनका कहना था माल मवेशी के साथ उन्हें लम्बा सफ़र तय करना होता है इसलिए अगर सरकार चाहे तो उनकी मदद कर सकती है. जैसे हाईवे पर ट्रैफिक कंट्रोल किया जाता है वैसे ही उनके डेरों के लिए कुछ समय के लिए ट्रैफिक को बंद किया जा सकता है.
जावेद राही ने भी कहा बड़ी संख्या में खोले गए मोबाइल स्कूल बिना किसी बुनियादी सुविधा के चलते सिर्फ सरकारी कागजों में चल रहे हैं.
उनका कहना था कि स्कूल बिना किसी शेल्टर के हैं, बच्चों के लिए कोई मिड डे मील की व्यवस्था नहीं हैं, कॉपी किताब नहीं मिलती.
उनका कहना था खुद कम पढ़ा लिखा नौजवान दूसरी पीढ़ी को कैसे तालीम दे सकता है.
वहीं बकरवाल बच्चों और औरतों की सेहत की बात करते हुए जावेद राही ने बताया बहुत कम गिने चुने परिवार होंगे जिन्होंने अपने बच्चों का टीकाकरण करवाया है.
उनका कहना था यह लोग न तो अपने माल मवेशी को टीका करवाते हैं और न ही बच्चों को. जावेद राही ने बताया उनकी संस्था ने एक सर्वे किया था जिस में यह पता चला 90 फीसदी बच्चों को उनके परिवार वालों ने कोई भी टीका नहीं लगवाया है.
उन्होंने बताया कि जंगलों में घूमते हुए यह लोग जड़ी-बूटी जमा करते रहते हैं और अपनी हर बीमारी का इलाज अपनी समझ और अनुभव के हिसाब से कर लेते हैं.
उनका मानना था क्योंकि ये लोग पहाड़ों में घूमते हैं, ताज़ा हवा में रहते हैं इनको आम बीमारियाँ परेशान नहीं करती. यही वजह है यह तबका आज तक बिना किसी सरकारी सपोर्ट के चल रहा है.
जावेद राही ने बताया इन लोगों के हक के लिए जो क़ानून पूरे भारत में पास किए गए हैं, रियासत जम्मू और कश्मीर में अभी तक उनको अपनाया नहीं गया.
उन्होंने बताया भारत सरकार ने वन अधिकार नियम 2006 में पास क़ानून को लागू किया लेकिन रियासत जम्मू और कश्मीर में वो अभी तक लागू नहीं हो पाया.
इसी तरह अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम या एससी/एसटी एक्ट भी अभी तक रियासत में लागू नहीं हो सका है.
जावेद राही के मुताबिक अगर हमारे समुदाय को लोगों को रिजर्वेशन मिलती है तो हमें अपने हक़ की लड़ाई लड़ने में थोड़ी आसानी हो जाएगी.

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सेना की मदद
देश की सीमा से सटे इलाकों में रहने वाले गुर्जर बकरवाल समुदाय के लोग देश की रक्षा में लगातार अपना योगदान देते रहे हैं.
जावेद राही ने बताया कि इतिहास गवाह हैं जब जब सीमा पर सेना को किसी मदद की ज़रूरत पड़ी गुर्जर बकरवाल परिवारों ने आगे आकर सेना की मदद की और अग्रिम चौकियों तक रसद पहुंचाने में हमेशा अहम भूमिका निभाई.
जहाँ-जहाँ गुर्जर बकरवाल समुदाय के लोग मैदानी या पहाड़ी इलाकों में बसे हैं कभी भी कहीं से उनके ख़िलाफ़ कोई भी शिकायत दर्ज नहीं करवाई है.
हमेशा से इस समुदाय ने अमन और शांति बहाली की लिए कुर्बानी दी और सामाजिक ताना बाना मजबूत बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया.
जम्मू-कश्मीर में पुलिस विभाग में, यूनिवर्सिटी में, सरकारी महकमों में पढ़े लिखे गुर्जर समुदाय के लोग अपना योगदान दे रहे हैं.
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