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ब्लॉग: अमित शाह की ज़ुबान को इन दिनों क्या हो गया है?
- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारतीय जनता पार्टी के 38वें स्थापना दिवस पर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह अपने संबोधन की शुरुआत 'भारत माता की जय' से करते हैं.
10 सदस्यों के साथ शुरू हुई पार्टी के 11 करोड़ सदस्यों के साथ सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनने का वो दावा करते हैं और ये भी कहते हैं कि कभी महज़ दो सांसदों की पार्टी रही बीजेपी आज 330 सदस्यों के साथ पूर्ण बहुमत से सरकार चला रही है.
अटल बिहारी वाजपेयी ने जो सपना पार्टी की स्थापना दिवस पर देखा था कि 'अंधेरा छंटेगा और कमल खिलेगा', उस कमल को देश के अधिकांश हिस्सों तक पहुंचाने का काम अमित शाह- नरेंद्र मोदी की जोड़ी ने कर दिखाया है.
लेकिन जल्दी ही वे मुद्दे पर आ जाते हैं और वो मुद्दा है, 2019 का आम चुनाव. इस चुनाव को ध्यान में रखते हुए ही उन्होंने नरेंद्र मोदी सरकार की उन योजनाओं को गिनाया जिसके बारे में दावा किया जाता रहा है कि ये सब गरीबों के लिए शुरू की गई योजनाएं हैं.
हिसाब मांगने पर सवाल
इन योजनाओं में शामिल हैं- जनधन योजना, उज्ज्वला गैस योजना, सौभाग्य योजना, स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालय का निर्माण और बीमा योजना.
अमित शाह ने ये भी दावा किया कि मोदी सरकार ने हर ग़रीब को सुख पहुंचाने का काम किया है.
अमित शाह की छवि भारतीय जनता पार्टी के चाणक्य की बन गई है.
राजनीतिक गलियारों में ये बात कही जाती है कि जो बात नरेंद्र मोदी सोचते हैं, उसे अमित शाह धरातल पर उतार देते हैं.
यही वजह है कि नरेंद्र मोदी सरकार से कोई सवाल पूछे तो ये उन्हें पसंद भी नहीं आता.
राहुल गांधी के सवालों को मजाक़िया लहजे में लेने के साथ वे कहते हैं, "राहुल बाबा आप साढ़े चार साल का हिसाब मांग रहे हो, जनता आपसे चार पीढ़ी का हिसाब मांग रही है."
38 साल पुरानी राजनीतिक पार्टी
ये किस तरह की तुलना है और इससे नरेंद्र मोदी सरकार का काम कैसे प्रभावित होता रहा है या फिर नरेंद्र मोदी कुछ करना चाह रहे हों, वो कांग्रेस की पिछली सरकारों की वजह से संभव नहीं हो पाया हो, इसके बारे में अमित शाह कुछ नहीं बताते.
अपने कार्यकर्ताओं को दिए जा रहे संबोधन में भी नहीं बताते.
38 साल पुरानी राजनीतिक पार्टी को महान बताते हुए पार्टी अध्यक्ष होने के नाते वे खुद को 'महान' लोगों की कतार में खड़ा कर लेते हैं, लेकिन 133 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का वे 'राहुल बाबा', 'राहुल बाबा' कहकर मजाक़ उड़ाते हैं.
ये बात दूसरी है कि उनकी अपनी पार्टी में 'असली बाबाओं' की बड़ी कद्र होती रही है और हाल ही में उनके एक मुख्यमंत्री ने पांच-पांच बाबाओं को मंत्री पद का दर्जा भी दिया है.
कुत्ते से लेकर बिल्ली तक
लेकिन अमित शाह यहीं नहीं रुकते हैं.
वे आगे कहते हैं, "बाढ़ आने पर सांप, नेवला, बिल्ली, कुत्ता, चीता, शेर भी वट वृक्ष पर चढ़ जाते हैं क्योंकि नीचे पानी का डर है. ये मोदी जी की जो बाढ़ आई है ना बाढ़, इसके डर से सांप, नेवला, कुत्ता, बिल्ली सब इक्ट्ठा होकर चुनाव लड़ने का काम करते हैं."
सार्वजनिक मंच पर देश पर शासन करने वाली पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का ऐसा बयान सुनकर यक़ीन नहीं होता, दोबारा तिबारा सुनकर भी यक़ीन नहीं होता.
लेकिन अमित शाह का कॉन्फ़िडेंस ऐसा है कि इसके बाद प्रेस कॉन्फ़्रेंस में जब उनसे ये पूछा जाता है कि उन्होंने ऐसा किन लोगों के लिए कहा तब वे कहते हैं, "मैंने साँप और नेवले का उदाहरण इसलिए दिया क्योंकि वो आम तौर पर इकट्ठा नहीं आते. विचारधाराओं से परे दल मोदी जी के वेव (लहर) के कारण इकट्ठा हो रहे हैं. उन्हें बुरा लगा हो तो मैं नाम बता देता हूं, सपा-बसपा, कांग्रेस और तृणमूल, नायडू और कांग्रेस."
विपक्ष की प्रतिक्रिया
ज़ाहिर है अमित शाह के इस बयान पर विपक्षी नेताओं की ओर से प्रतिक्रिया आनी ही थी. आप अमित शाह का पूरा संबोधन यहां सुन सकते हैं.
कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ट्वीट करके बताया कि बाढ़ कुछ समय के लिए ही आती है और हम इस बाढ़ को रोक देंगे.
बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने अमित शाह के इस बयान को अपराधी मानसिकता और संघी चाल की मजबूरी बताई.
अमित शाह ने अपने संबोधन में मोदी जी की तुलना बाढ़ से कर दी, हालांकि ये बात और है कि बाढ़ किसी के लिए फ़ायदेमंद कहां होती है.
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ट्वीट किया कि सत्तापक्ष खुद को बाढ़ मान रहा है, ऐसे में जनता को विकास की जगह विनाश ही मिलेगा.
सियासी हकीकत
वैसे ये बात ठीक है कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी एक-दूसरे के विरोध के लिए जानी जाती रही हैं, लेकिन राजनीति में एक दूसरे का विरोध करने वाले दलों का कोई गठबंधन पहली बार तो भारत में नहीं बन रहा है.
नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार और 20 राज्यों में बीजेपी की सरकारों का एक सच ये भी है कि भारतीय जनता पार्टी का क़रीब 44 दलों से गठबंधन चल रहा है.
इनमें से जम्मू और कश्मीर की पीडीपी पार्टी से बीजेपी का मतभेद जगज़ाहिर रहा है. नीतीश कुमार कुछ महीने पहले तक बीजेपी के विरोधी कैंप में ही थे.
जिन चंद्रबाबू नायडू की बात अमित शाह कर रहे थे, एक महीने पहले तो उनके दो सांसद मोदी सरकार में मंत्री थे.
जनता सरकार का प्रयोग
अमित शाह को शायद ये याद नहीं रहा कि देश में इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ 1977 में पूरा विपक्ष एकजुट हुआ था.
उस एकजुटता में जनसंघ के अटल बिहारी वाजपेयी भी थे और वामपंथी दल भी शामिल थे.
राजनीति में इसकी गुंजाइश हमेशा से रही है कि लोग चुनाव जीतने लायक गठबंधन बनाते रहे हैं.
लेकिन भारतीय राजनीति में सबसे बड़ी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की ओर से ऐसी तुलना का उदाहरण पहली बार दिखा है.
हालांकि उनकी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता और उत्तर प्रदेश बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा के उपचुनाव के दौरान सपा-बसपा गठबंधन की तुलना सांप-नेवले से कर चुके हैं.
अमित शाह का राजनीतिक अनुभव दो दशक से भी ज्यादा का हो चुका है, लिहाजा ये तो नहीं ही माना जा सकता है कि यहां उनकी ज़ुबान फिसल गई हो, वैसे भी वो जो भाषण पढ़ रहे थे, वो लिखित था.
नई रणनीति बनाते अमित शाह
हालांकि पिछले एक महीने में एक बार उनकी ज़ुबान भी फिसली है, जब कर्नाटक में उन्होंने अपने ही पूर्व मुख्यमंत्री को राज्य का 'सबसे भ्रष्ट मुख्यमंत्री' बता दिया था.
इसके बाद कर्नाटक की ही एक चुनावी सभा में उनके भाषण का अनुवाद ऐसा हो गया कि 'मोदी जी देश को बर्बाद कर देंगे.'
तो ऐसा लग रहा है कि 2019 के आम चुनाव की आंच अमित शाह पर पड़ने लगी है.
इस आंच की ताप को अकेले समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की साथ आने की कोशिशों ने बढ़ा दिया है.
उत्तर प्रदेश की 80 सीटें अचानक से अहम हो गई हैं, लेकिन महज दो लोकसभा सीटों पर मिली हार को उनकी हताशा भी नहीं माना जाना चाहिए.
इसके बरक्स वे विपक्षी एकजुटता की चुनौती से निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार दिखते हैं.
महत्वपूर्ण लक्ष्य
कूटनीतिक स्तर पर उन्होंने मुंबई में अपने संबोधन में दो बातों की तरफ इशारा किया है.
पहली बात तो उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि भारतीय जनता पार्टी किसी भी क़ीमत पर आरक्षण को ख़त्म नहीं होने देगी.
वहीं, दूसरी ओर उन्होंने ये भी बताया कि आगामी 14 अप्रैल को भीमराव आंबेडकर के जन्मदिन पर पार्टी के 20 हज़ार कार्यकर्ता, दलितों के साथ वक्त बिताएंगे.
हालांकि जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आएंगे ऐसा लगता है कि अमित शाह के तरकश से ऐसे कई मास्टर स्ट्रोक और देखने को मिलेंगे.
बीते तीन साल में वे कई बार इसे साबित कर चुके हैं कि उनके लिए पार्टी को जीत दिलाने से ज़्यादा महत्वपूर्ण लक्ष्य कोई नहीं है.
लेकिन सार्वजनिक मंचों पर वे थोड़ा संयम दिखाएं और विपक्ष को भी थोड़ा सम्मान दें तो इससे उनका अपना क़द राजनीति में कम तो नहीं ही हो जाएगा.
लक्ष्य के सामने अपने क़द की चिंता उन्हें ना हो तो थोड़ा ये लिहाज ही रख लें कि वे एक 'महान' और 'राष्ट्रवादी' पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.
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