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#BBCShe: ‘वो लड़कियों को ‘चीज़’ की तरह देखते हैं’
- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- "आजकल सिर्फ़ औरतों की ही बात होती है. हमारे अधिकारों के बारे में तो कोई नहीं बोलता."
- "इतने सारे प्रोग्राम होते हैं 'वुमेन्स डे' पर, लेकिन 'मेन्स डे' का तो ज़िक्र तक नहीं होता."
- "अब तो औरतों को सारे अधिकार मिल गए हैं, अब हमें एकसमान माना जाना चाहिए."
गुजरात के राजकोट शहर में BBCShe के लिए लड़कियों से बातचीत के बाद हमने लड़कों से बात करने की सोची, और जब उनसे मिली तो शिकायतों का अंबार लग गया.
हैरान थी कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा था.
मैंने कहा लड़कों की चर्चा में कोई कमी तो नहीं आई है, वो कुछ हासिल करते हैं तो उसकी भी उतनी ही सराहना होती है. आख़िर उनसे कुछ छीना तो नहीं जा रहा.
पलटकर जवाब आया कि सराहना तो ठीक है, पर आलोचना कुछ ज़्यादा ही होने लगी है. कुछ लड़कों की वजह से सब लड़कों की छवि ख़राब हो गई है.
वो बोले कि अब लड़कों की ज़िंदगी बहुत मुश्किल हो गई है. किसी लड़की से बात करने से पहले कई बार सोचना पड़ता है कि कहीं उसे बुरा ना लग जाए.
बात सही थी. इन्हीं लड़कों के कॉलेज की लड़कियों ने हमें बताया था कि लड़कों की कुछ बातें उन्हें कितनी बुरी लगती थीं.
"लड़के छेड़छाड़ करते हैं, मना करने पर भी पीछे पड़ जाते हैं और सोचते हैं वो हीरो हैं और लड़कियों को ये सब पसंद है. जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है."
राजकोट छोटा शहर है. यहां की आबादी क़रीब बीस लाख है. सड़क पर लड़के-लड़कियां साथ घूमते कम ही दिखते हैं. साथ पढ़ते ज़रूर हैं, पर कॉलेज में भी सिर्फ़ लड़कियों और सिर्फ़ लड़कों के झुंड ज़्यादा मिलते हैं.
यहां इंटरनेट की अच्छी पहुँच है. सोशल मीडिया की दुनिया में इंस्टाग्राम यहां बहुत लोकप्रिय है. लेकिन फ़ेसबुक पर लड़कियां अब भी अपना अकाउंट 'प्राइवेट' रखती हैं.
एक लड़की ने हमें बताया कि बहुत सोच-समझकर लड़कों की फ़्रेंड-रिक्वेस्ट मानती हैं फिर भी कई बार धोखा हो जाता है.
लड़कों को ये बताया तो उन्होंने कहा कि ये कुछ लड़कों की वजह से होता है. जिन्हें लड़की की 'ना' में भी 'हां' सुनाई देता है.
एक लड़के ने इसके लिए बॉलीवुड को दोषी करार दिया. वो बोले, "सालों से दिखा रहे हैं कि लड़की के पीछे पड़ जाओ, नहीं माने तो और पीछे पड़ो, आख़िर में मान ही जाएगी, फिर प्यार करने लगेगी, फिर शादी हो जाएगी और बच्चे हो जाएंगे और सुंदर-सा जीवन होगा."
सबने हामी में सर हिला दिया. मैंने पूछा लड़के इसे सच मानते हैं?
उस लड़के ने कहा, "हां, और एक व़क्त तक मैं भी मानता था, फिर इतनी लड़कियों ने मुझे रिजेक्ट कर दिया कि बात समझ में आ गई, उन्हें ज़बरदस्ती पसंद नहीं है."
पर ये समझना इतना मुश्किल क्यों है?
कुछ देर सब चुप हो गए
फिर एक लड़के ने दबी ज़बान में कहा, "दरअसल लड़के, लड़कियों को इंसान की तरह नहीं 'ऑब्जेक्ट' की तरह देखते हैं."
"आप नहीं जानतीं, जब दो लड़के साथ बैठे होते हैं और एक लड़की सामने से निकलती है तो उसके बारे में क्या कहते हैं... क्या सोचते हैं."
मैंने पूछा, क्या? शायद वो लड़का खुलकर कह भी देता पर साथ बैठे दोस्त ने इशारा दिया तो उसने कहा अब रहने दीजिए, मत पूछिए.
वो जानते थे कि मैं उनकी अनकही बात समझ गई थी. अपनी दुनिया में उन्होंने मुझे दाख़िल होने दिया था पर अब चुप रहकर शायद ये भी कहना चाहते थे कि वो ऐसी सोच वाले लड़कों की तरफ़ से शर्मिंदा हैं.
एक औरत के सामने ये इतना खुलकर अपने ऊपर उंगली उठाना और इतनी साफ़गोई से बात करना, ग़लती मानना क़ाबिले-तारीफ़ लगा.
कम से कम एक अहसास था, एक समझ बनती दिख रही थी. दूसरा पक्ष समझने की.
आख़िर में एक लड़का बोला, "हमें दोहरे मापदंड नहीं रखने चाहिए, एक लड़के का ब्रेक-अप हो और वो दूसरी गर्लफ़्रेंड बनाए तो ठीक है पर लड़की ब्रेक-अप के बाद दूसरा रिश्ता बनाए तो उसका कैरैक्टर ख़राब माना जाता है."
ठीक यही बात नागपुर में एक लड़की ने हमें कही थी कि ज़्यादा लड़कियों से दोस्ती करनेवाले लड़के को 'स्ट्ड' पर ज़्यादा लड़कों से दोस्ती करनेवाली लड़की को 'स्लट' कहा जाता है.
आख़िर में लगा कि लड़कियों के अधिकारों की बात क्यों ज़रूरी है. लड़कों के सामने इसके कोई ख़ास तर्क रखने की ज़रूरत नहीं थी.
एक सांझी सोच बन रही है. इन शहरों में ये एक-दूसरे के साथ दिखाई चाहे कम देते हों, सुनने-समझने की कोशिश पूरी है.
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