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#BBCShe: क्या रेप की रिपोर्टिंग में ‘रस’ होता है?
- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"रेप की ख़बर लगातार चलाई जाती है, पीड़िता से बार-बार सवाल पूछे जाते हैं, उस पर बहुत मानसिक दबाव पड़ता है."
"परिवार वाले एफ़आईआर करने से ही घबराते हैं, कि पुलिस में शिकायत की तो कहीं बेटी का नाम मीडिया के ज़रिए सामने ना आ जाए, बदनामी होगी."
"मीडियावाले अड़ोसी-पड़ोसी से सवाल-जवाब करते हैं, बात खुल जाती है, लड़की के जाननेवालों में उसकी पहचान ज़ाहिर हो जाती है,"
पटना के मगध महिला कॉलेज की लड़कियों ने जब अपने मन की कहनी शुरू की तो लगा, मानो तय कर के आई थीं कि आज सारी नाराज़गी, सारी उलझन उकेर कर रख देंगी.
साफ़ और स्पष्ट तरीके से एक के बाद एक वो आलोचना करती चलीं गईं.
बलात्कार पर मीडिया की रिपोर्टिंग से वो इतनी नाराज़ होंगी, इसका अंदेशा नहीं था.
#BBCShe प्रोजेक्ट के तहत हम देश के छह शहरों में कॉलेज की लड़कियों से उनके सरोकार जानने निकले हैं ताकि उनपर ख़बरें और विश्लेषण ला सकें. पटना हमारा पहला पड़ाव था.
मैंने माइक उनके सामने रखा तो तपाक से हाथ खड़े होने लगे.
उनकी बातें सुनकर मुझे पिछले साल वैशाली में अपने स्कूल के हॉस्टल के पास मृत पाई गई लड़की का मामला याद आ रहा था.
उसका शरीर संदिग्ध हालात में पाया गया था, कपड़े फटे हुए थे.
रेप-पीड़िता की पहचान छिपाने के क़ानून के बावजूद तमाम मीडिया ने उसका नाम छापा था.
मगध महिला कॉलेज में बोलनेवाली लड़कियों में सबसे आगे तीन-चार सहेलियां थीं जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर कॉलेज के विशेष कार्यक्रम में हिस्सा लिया था.
उस कार्यक्रम से ठीक पहले क़रीब उन्हीं की उम्र की एक लड़की पर पटना में एसिड से हमला हुआ था.
उस दिन लड़की के साथ उनसे कुछ ही साल बड़े उनके मामा भी थे. उस दिन भी ख़बरों में एसिड फेंकने वाले लड़के से ज़्यादा लड़की और मामा के कथित संबंधों की चर्चा थी.
कॉलेज की लड़कियों में नाराज़गी ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग से थी.
'लड़की पर ही उठती है उंगली'
"ख़बरों में अक्सर लड़की पर ही उंगली उठाई जाती है, क्या पहना था, किस वक़्त बाहर निकली थी, किसके साथ थी..."
"ऐसे में कोई लड़की क्यों बाहर आएगी, चुप रहना बेहतर नहीं समझेगी? सलवार-सूट पहनने वाली लड़कियों के साथ भी तो हर तरह की हिंसा होती है, कपड़ों से कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता."
इन लड़कियों में कई ने सलवार-सूट पहने थे, कई ने जींस-टॉप. ज़्यादातर लड़कियां पटना में ही पली-बढ़ी थीं.
बिहार सरकार की योजनाओं और स्कॉलरशिप की मदद से पिछले सालों में कॉलेज और यूनिवर्सिटीज़ में लड़कियों की तादाद बढ़ी है.
मगध महिला कॉलेज सिर्फ़ लड़कियों के लिए है.
वहां मनोविज्ञान विभाग की प्रमुख कहती हैं कि ये माहौल इन लड़कियों के विचारों को दिशा, अधिकारों की समझ और खुल कर बोलने का बल देने के लिए बहुत अहम है.
ज़्यादातर क्राइम रिपोर्टर मर्द
लेकिन ऐसा साझा बदलाव लड़कों की दुनिया में नहीं आ रहा.
बिहार की वरिष्ठ महिला पत्रकारों में एक, रजनी शंकर के मुताबिक क्राइम रिपोर्टिंग ज़्यादातर मर्द ही करते हैं, इसलिए कुछ का नज़रिया और संवेदनशीलता उम्मीद से कम है.
उनकी इस बात में 'कुछ' शब्द पर ध्यान देना ज़रूरी है.
रजनी आगे कहती हैं कि कुछ मर्द रेप की रिपोर्ट बनाते वक़्त हिंसा की ज़रूरत से ज़्यादा जानकारी ढूंढते और लिखते हैं, मानो उन्हें उसमें 'रस' मिल रहा हो, 'रोमांच' आ रहा हो.
दक्षिण एशिया में महिला मीडियाकर्मियों के संगठन, 'साउथ एशियन वुमेन इन मीडिया' की बिहार अध्यक्ष रजनी शंकर 'हिन्दुस्थान' समाचार एजेंसी की बिहार प्रमुख हैं.
अपनी एजेंसी में उन्होंने पुरुष पत्रकारों के साथ वर्कशॉप कर इस मसले को सुलझाने की कोशिश भी की है.
ऐसा नहीं है की बदलाव नहीं आ रहा. बिहार में दैनिक भास्कर अख़बार के संपादक प्रमोद मुकेश के मुताबिक उन्होंने बहुत सोचे-समझे फ़ैसले के तहत अपनी टीम में महिलाओं की नियुक्ति की है.
उनकी 30 पत्रकारों की टीम में तीन महिलाएं हैं.
हालांकि ये महिलाएं क्राइम या कोई और 'बीट' नहीं, महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर ही रिपोर्टिंग करती हैं.
मैं उन्हें कॉलेज में हुई बातचीत का अंश सुनाती हूं.
पूछती हूं कि क्या ख़बरें कहने, दिखाने का मीडिया का अंदाज़ इतना असंवेदनशील है कि इस वजह से लड़कियां अपनी शिकायत सामने लाने से पहले सोचें और झिझकें?
वो ध्यान दिलाते हैं कि मीडिया के बारे में ये समझ कई सालों में बनी है और उसे बदलने में भी व़क्त लगेगा.
पत्रकारों में महिलाओं की संख्या बढ़ाना इसकी ओर एक क़दम है और मर्दों की समझ बेहतर करना दूसरा.
कॉलेज की लड़कियों के पास भी कुछ सुझाव थे.
"रेप पर रिपोर्टिंग हो लेकिन लड़कियों के बारे में नहीं, लड़कों के बारे में ख़बर दिखानी चाहिए, सवाल उनके कपड़ों, चाल-चलन पर उठाए जाने चाहिए."
"रेप का केस इतना लंबा चलता है, समय-समय पर लड़की के मां-बाप पर ख़बर दिखाइए. किसी लड़के को कड़ी सज़ा हो तो उसे उदाहरण की तरह दिखाइए."
पटना की उन लड़कियों का एकमत था जो मेरे ज़हन में बस गया.
"ख़बरें कीजिए पर ऐसे जो बल दें, वैसे नहीं जो ख़ौफ़ पैदा करें."