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#HerChoice: मेरा काम मेरी पहचान है, ना कि मेरे पति का नाम
'लड़की हो थोड़ा झुककर रहो.'
पहली बार ये सुना तो दिल को चोट लगी थी.
पति के साथ हुए झगड़े में उन्हीं के सामने मेरी सास ने मुझे ये सलाह दी थी.
इसके बाद ये बात मैंने कई बार सुनी.
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#HerChoice 12 भारतीय महिलाओं के वास्तविक जीवन की कहानियों पर आधारित बीबीसी की विशेष सिरीज़ है. ये कहानियां 'आधुनिक भारतीय महिला' के विचार और उनके सामने मौजूद विकल्प, उनकी आकांक्षाओं, उनकी प्राथमिकताओं और उनकी इच्छाओं को पेश करती हैं.
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मेरी अरेंज्ड शादी हुई थी.
शादी के एक महीने बाद ही मुझे लगने लगा कि कुछ गड़बड़ है.
पति को सेक्स के अलावा और किसी बात में दिलचस्पी नहीं थी.
इसी बीच मुझे स्किन इंफ़ेक्शन हुआ.
कहा गया कि ये मेरी ग़लती से हुआ है.
एक हफ़्ते तक मुझे घरेलू नुस्खे आज़माने की सलाह दी जाती रही.
हालत बिगड़ने लगी तो भी पति को चिंता नहीं हुई.
बल्कि उन्होंने कहा कि उनसे दूर रहूं ताकि उन्हें भी वो इंफ़ेक्शन न लग जाए.
ग़ुस्से में अगले दिन मैं खुद ही दवा लेने गई.
फिर भी मैंने किसी को कुछ नहीं.
आठ महीने बाद एक रात बात मारपीट तक जा पहुंची, जिसके बाद हमें अलग होना पड़ा.
मेरी शादी को एक साल भी नहीं हुआ.
उसमें भी एक महीना बाक़ी है.
और पिछले तीन महीने से मैं पति से अलग रह रही हूं.
मेरे सामने शर्त रखी गई है कि मैं अपनी नौकरी और घर वालों को छोड़कर ससुराल रहूं. मुझे वहां दो वक़्त का खाना मिलेगा.
क्या मैंने दो वक़्त के खाने के लिए शादी की थी?
मेरा काम मेरी पहचान है, ना कि मेरे पति का नाम.
मेरे हर फ़ैसले की तरह आज भी मेरे मां-पापा मेरे साथ खड़े हैं क्योंकि उन्हें मुझ पर पूरा विश्वास है कि मैं ग़लत नहीं हूं.
पापा हमेशा कहते थे कि बेटियों के सपने पूरे करने के लिए कलेजा चाहिए.
अब समझ आता है कि कितना सही कहते हैं वो.
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(हमारी सिरीज़ #HerChoice में बहुत सी पाठिकाओं ने कहा कि वे अपनी कहानियां शेयर करना चाहती हैं. उस कड़ी में यह तीसरी कहानी है जो हमें हमारी पाठक वंदना ने भेजी है.)
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