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जाति-धर्म के खांचे तोड़ने को मचलता प्यार
- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नागपुर से
मेरी आंखों के सामने मराठी फ़िल्म 'सैराट' का वो आख़िरी सीन दौड़ गया जब 'ऊंची' जाति की लड़की का परिवार उसे और 'निचली' जाति के उसके पति को जान से मार देता है.
क़त्ल होते हुए दिखाया नहीं जाता पर जब उस दंपत्ति का छोटा बच्चा रोता है तो हिंसा की बर्बरता दिल में अजीब सा दर्द पैदा कर देती है.
दर्द और ख़ौफ़
जब नागपुर में BBCShe के कार्यक्रम में एक युवती बोली, तो उसका इशारा दर्द और ख़ौफ़ के इसी माहौल की तरफ़ था.
उसने कहा, "अलग जाति या धर्म के लोग जब शादी करते हैं तो मीडिया उनके ख़िलाफ़ उठी आवाज़ें और हिंसा की ही ख़बरें दिखाता है जिससे हम पर और दबाव बनता है कि ऐसी शादी के बारे में ना सोचें, ना जाने क्या हो जाएगा."
"ऐसा क्यों नहीं होता कि मीडिया उन रिश्तों की बात करे जो कारगर रहे हों, जहां परिवारों ने साथ दिया या जहां लड़का-लड़का उन्हें अपनी बात समझा पाए?"
उदाहरण के तौर पर उस युवती ने अपनी टीचर से मिलवाया. वो दक्षिण भारत से हैं और उनके पति महाराष्ट्र से. दोनों की जाति अलग है.
टीचर का परिवार शादी के बिल्कुल ख़िलाफ़ था पर उनके पति के परिवार को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी.
टीचर बताती हैं कि इसकी वजह थी कि उनके पति के एक भाई ने कुछ साल पहले अंतरजातीय विवाह किया था.
तब भी परिवार नहीं माना था, भाई और भाभी को कोर्ट-मैरिज कर शहर छोड़कर भागना पड़ा था.
फिर परिवार ने उनके ठिकाने का पता लगा लिया और लगातार उन पर एक-दूसरे को तलाक़ देने का दबाव बनाता रहा.
पर वो दंपत्ति अड़ा रहा. एक महीने तक छिपकर रहने के बाद वो लौटे और परिवार ने उन्हें स्वीकार कर लिया.
जाति की बहस
यही वजह थी कि जब टीचर के पति ने दूसरी जाति में शादी करने का प्रस्ताव रखा तो परिवार मान गया.
टीचर बताती हैं कि उनका अपना परिवार बहुत रूढ़िवादी है. पति के परिवार के सकारात्मक रवैये के बावजूद उनके मां-बाप एक साल तक दूसरा लड़का देखते रहे.
"आख़िर में वो मान गए क्योंकि एक पॉज़ीटिव अनुभव को जाना, भइया-भाभी की लड़ाई ने हमारे लिए रास्ता खोल दिया, मीडिया में ऐसे अनुभव आएं तो ना जाने कितने लड़के-लड़कियों की लड़ाई कुछ आसान हो जाए."
पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की ही तरह महाराष्ट्र में भी दूसरी जाति या धर्म में शादी करने पर लड़का या लड़की की हत्या करने के मामले सामने आते रहे हैं.
'सैराट' फ़िल्म एक ऐसे ही रिश्ते और उस पर परिवार की हिंसा की कहानी थी.
पूर्वी महाराष्ट्र का नागपुर शांत शहर लगता है. यहां से ऐसी हिंसा की ख़बर नहीं मिलती बल्कि ऐसे मामले पश्चिमी महाराष्ट्र में ज़्यादा सामने आए हैं.
पर ऐतिहासिक नज़रिए से जाति की बहस नागपुर के लिए बहुत अहम है.
यहीं पर 1956 में बाबा साहेब आंबेडकर ने जाति के आधार पर भेदभाव का विरोध करते हुए हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म अपनाया था.
उनके नेतृत्व में 'निचली' जाति के क़रीब पांच लाख लोगों ने भी धर्मांतरण किया था और उस जगह को अब 'दीक्षाभूमि' के नाम से जाना जाता है.
उस ऐतिहासिक पहल का असर आज भी महाराष्ट्र में देखने को मिलता है. 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में बौद्ध धर्म माननेवालों की कुल आबादी का 75% महाराष्ट्र में रहती है.
धर्म का त्याग
रूपा कुलकर्णी बोधि 1945 में नागपुर के ब्राह्मण परिवार में पैदा हुईं. 1956 में तो नहीं पर 1992 में जब वो 47 साल की थीं, उन्होंने हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म अपनाया.
ऐसा क्यों किया? वो तो 'ऊंची' जाति में पैदा हुई थीं, नागपुर विशवविद्यालय में संस्कृत की प्रोफ़ेसर थीं और किसी तरह का भेदभाव नहीं झेलना पड़ा होगा?
उन्होंने मुझे बताया, "मैंने घरेलू कामगारों के साथ काम करना शुरू किया था और वो सब उन जातियों से थे जिन्हें निचला माना जाता है, उनकी परिस्थितियां बहुत ख़राब थीं, इसलिए मुझे मेरी जाति एक बोझ, एक कलंक जैसी लगने लगी थी तो उसे छोड़ना ही सही लगा."
रूपा कुलकर्णी बोधी के मुताबिक ख़बरिया चैनल, अख़बार और फ़िल्म जगत ही नहीं टीवी पर आनेवाले सीरियल भी जाति के आधार पर अलग रहने की संस्कृति को ही बढ़ावा देते हैं.
ज़्यादातर मराठी सीरियल 'ऊंची' जाति के समृद्ध परिवारों की ज़िंदगी दिखाते हैं जिसमें 'निचली जाति' के लोगों की भूमिका घरेलू काम करनेवाली औरतों या मज़दूरों की होती है जो कहानी के हाशिए पर ही होते हैं.
बाबा साहेब आंबेडकर ने अलग-अलग जाति के लोगों के बीच की खाई पाटने के लिए तीन अहम् ज़रिए का ज़िक्र किया था - शादी, खान-पान और सांस्कृतिक मेलजोल.
नागपुर के कॉलेज में मिली युवती इसी मेलजोल की और खुली चर्चा चाहती है.
मुझे कहती है कि उसके लिए उसकी टीचर एक सकारात्मक उदाहरण है जो उसे बल देता है पर उसके मां-बाप की सोच का क्या? क्योंकि उन्हें मीडिया ऐसी कहानियों से रूबरू करवाता ही नहीं.