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दिल्ली के रामलीला मैदान में क्यों जुटी मुस्लिम महिलाएं?
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
'तीन तलाक बिल वापस लो'
'मुसलमान औरतें मुस्लिम पर्सनल लॉ चाहतीं हैं'
'हम शरीया के साथ हैं'
इन्हीं आवाज़ों से बुधवार को दिल्ली का रामलीला मैदान दिन भर गूंजता रहा.
बुर्का पहने, हाथ में तख्ती लिए, अप्रैल महीने की तपती दोपहरी में हजारों की संख्या में दिल्ली की मुस्लिम महिलाएं एक साथ जमा हुईं.
हर कोई एक ही बात कह रहा था, मुस्लिम पर्सनल लॉ के साथ खिलवाड़ न करें.
तीन तलाक़ बिल से दिक्कत
पिछले साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने एक बार में तीन तलाक़ को असंवैधानिक करार दिया था.
इसके बाद केंद्र सरकार इस पर मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक लेकर आई.
ये बिल लोक सभा में पारित हो गया लेकिन राज्य सभा से अब तक पास नहीं हो पाया है.
मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक के विरोध में पूरे देश के 180 शहरों में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसी तरह से खामोश जूलुस निकाला है.
पिछले दो महीने से इस संगठन से जुड़ी मुस्लिम महिलाएं इस बिल का विरोध सड़कों पर उतर कर इसी अंदाज में कर रही हैं. दिल्ली उनका आखिरी पड़ाव था.
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की मांग
आखिर इस बिल से दिक्कत क्या है?
इस सवाल के जवाब में उस्मां पारेख कहती हैं, "दिक्कत न होती तो दोपहर में इस चिलचिलाती धूप में हमें पंखे की ठंडी हवा क्या काटती है."
तुंरत माइक अपनी तरफ़ करते हुए उस्मां कहती हैं, "पूरे बिल में ही दिक्कत है. इस बिल में मुस्लिम महिलाओं के हक़ की एक भी बात नहीं है."
"हम चाहते हैं कि इस बिल को सेलेक्ट कमिटी को भेजा जाए. अगर सरकार को बिल लाना ही है तो लड़कियों की पढ़ाई को लेकर बिल लाएं, हम उसका पूरी तरह सपोर्ट करेंगे."
प्रस्तावित क़ानून
उस्मां का गुस्सा इससे पहले की और ज्यादा बढ़ता, बगल में खड़ी दूसरी उम्र दराज़ महिला यास्मिन फारुखी ने तुरंत मोर्चा संभाला.
सधी हुई आवाज़ में कहा, "ये एक साजिश है. तलाक को आपराधिक बनाना. अगर ये बिल पारित हो गया तो हर मुसलमान मर्द को जेल में भर दिया जाएगा."
मुस्लिम महिला वैवाहिक अधिकार संरक्षण बिल तीन तलाक़ को अपराध करार देता है.
तलाक़-ए-बिद्दत के मामले में पति को तीन साल तक की सज़ा हो सकती है. इस बिल में तलाक़ के बाद पत्नी को गुजारा भत्ता देने की भी बात कही गई है.
आख़िर जरूरत ही क्या है?
कुछ महिला संगठनों का कहना है कि इससे मुस्लिम महिलाओं की कोई मदद नहीं होगी क्योंकि पति जेल जाने की स्थिति में गुजारा भत्ता कैसे देगा?
सुबह-सुबह 30 किलोमीटर का सफर तय कर रामलीला पहुंचीं रजिया के मुताबिक, "औरत-मर्दों के बीच बराबरी की दिशा में बढ़ना चाहिए, न कि तलाक़ को अपराध की श्रेणी में डालना चाहिए."
बचपन से साथ रजिया के साथ रहे शाहजहां के मुताबिक, "पूरे मामले में पहले से ही बहुत सारे क़ानून मौजूद हैं जो विवाहित महिलाओं को अन्याय से बचाते हैं. एक और कानून की आख़िर जरूरत ही क्या है?"
'इंस्टेट ट्रिपल तलाक़' क्या है?
तलाक़-ए-बिद्दत या इंस्टैंट तलाक़ दुनिया के बहुत कम देशों में चलन में है, भारत उन्हीं देशों में से एक है.
एक झटके में तीन बार तलाक़ कहकर शादी तोड़ने को तलाक़-ए-बिद्दत कहते हैं.
ट्रिपल तलाक़ लोग बोलकर, टेक्स्ट मैसेज के ज़रिए या व्हॉट्सऐप से भी देने लगे हैं.
एक झटके में तीन बार तलाक़ बोलकर शादी तोड़ने का चलन देश भर में सुन्नी मुसलमानों में है लेकिन सुन्नी मुसलमानों के तीन समुदायों ने तीन तलाक़ की मान्यता ख़त्म कर दी है.
हालांकि देवबंद के दारूल उलूम को मानने वाले मुसलमानों में तलाक़-ए-बिद्दत अब भी चलन में है और वे इसे सही मानते हैं.
इस तरीक़े से कितनी मुसलमान महिलाओं को तलाक़ दिया गया इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं है.
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