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सरकार न्यायपालिका में हस्तक्षेप कर रही है : जस्टिस चेलमेश्वर
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस जे चेलमेश्वर ने चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा को एक ख़त लिख कर सरकार के न्यायपालिका में हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ कदम उठाने की मांग की है.
बीते सप्ताह लिखे गए इस ख़त में जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा है, "हम पर, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर, अपनी स्वतंत्रता के साथ समझौता करने और हमारी संस्थागत अखंडता के अतिक्रमण का आरोप लगाए जा रहे हैं. कार्यपालिका हमेशा अधीर होती है और कर सकने में सक्षम होने पर भी न्यायपालिका की अवज्ञा नहीं करती है. लेकिन इस तरह की कोशिशें की जा रही हैं कि चीफ़ जस्टिस के साथ वैसा ही व्यवहार हो जैसा सचिवालय के विभाग प्रमुख के साथ किया जाता है."
जस्टिस चेलमेश्वर का कहना है कि सरकार ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के चीफ़ जस्टिस दिनेश माहेश्वरी से संपर्क किया था. ये मामला सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की सिफारिशों के ख़िलाफ़ जिला और सेशन जज पी कृष्ण भट की तरक्की और उनके ख़िलाफ़ जांच के आदेश देने से संबंधित था.
क्या लिखा जस्टिस चेलमेश्वर ने?
साल 2014 में कर्नाटक के बेलगावी में जिला और सेशन जज पी कृष्ण भट ने हाई कोर्ट को फर्स्ट क्लास जुडिशियल मजिस्ट्रेट एमएस शशिकला के दुर्व्यवहार के संबंध में रिपोर्ट भेजी थी. इस पर विजिलेंस रिपोर्ट तो दाखिल की गई लेकिन फरवरी 2016 तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई.
जब जज भट का नाम तरक्की के लिए आगे बढ़ाया गया तो शशिकला ने उनके ख़िलाफ़ शिकायत की. आरोपों की जांच चीफ जस्टिस एसके मुखर्जी ने की थी और उन्होंने अपनी रिपोर्ट में इन आरोपों को बेबुनियाद पाया. बाद में सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम ने जज भट समेत छह अन्य जजों के नाम हाई कोर्ट जज बनाए जाने के लिए सुझाए.
केंद्र सरकार ने सिवाय जज भट से सभी की तरक्की का समर्थन किया. चेलमेशवर ने चीफ़ जस्टिस को लिखे ख़त में इसे सरकार का अपने हितों के कारण "फाइल को रोके रखने" का आदर्श उदाहरण कहा है.
जस्टिस चेलमेश्वर लिखते हैं "अब वो हो गया है जिसके बारे में कभी सोचा नहीं गया था. सरकार को यदि जज कृष्ण भट के बारे में कोई आपत्ति थी तो उन्हें इस सिफारिश को हमारे पास वापस भेजना चाहिए था- जैसा कि समान्य प्रक्रिया है. इसके बजाए उन्होंने फाइल को रोक कर रख लिया."
"लेकिन अब कर्नाटक हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस ने हमें बताया है कि उन्हें इस मामले में ग़ौर करने के लिए कानून मंत्रालय ने ख़त लिखा है और मुख्य न्यायाधीश ने, ख़ुद को सरकार का वफादार दिखाते हुए, इस पर कदम उठाया, प्रशासनिक कमेटी की बैठक की और इस मुद्दे की दोबारा जांच का फ़ैसला किया. और इस तरह उन्होंने पहले चीफ़ जस्टिस की जांच में सामने आए नतीजों को दबा दिया....."
'ये स्वायत्ता पर आंच है'
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े कहते हैं, "ये न्यायपालिका की स्वायत्ता और जुडिशियल अप्वांइंटमेंट से जुड़ा मामला है. किसी को अगर जजों ने चुनकर जज बनाने का फ़ैसला किया और अगर सरकार ये सोचती है कि जो जज के पद के लिए नियुक्त हुआ है वो सरकार के पक्ष में नहीं होगा और इसलिए सरकार उसकी नियुक्ति पर बैठी रहती है या किसी तरीके से कोलेजियम की सिफारिशों को नकारने की कोशिश होती है तो न्यायपालिका की स्वायत्ता पर आंच आ जाती है."
वो कहते हैं "जस्टिस चेलमेश्वर ने यही कहा है कि हम सभी जजों को मिल कर ये सोचना चाहिए कि जब सरकार ऐसा रवैया अपनाती है, सरकार सुप्रीम कोर्ट को लांघते हुए सीधे हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस से सवाल करती है तो हाई कोर्ट के जस्टिस इसमें कुछ नहीं कर सकते हैं."
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण कहते हैं, "न्यायपालिका का काम है कि वो सरकार के ऊपर निगरानी रखे और सरकार के ख़िलाफ़ जनता के मौलिक अधिकार की रक्षा करे. इसीलिए ये बेहद गंभीर मामला है."
वो कहते हैं कि "पहले ही कोलेजियम की तरफ से जज पी कृष्ण भट पर लगे आरोपों की जांच हुई है और उन्हें बेबुनियाद पाया गया है."
सरकार का न्यायपालिका में सीधे हस्तक्षेप
संजय हेगड़े कहते हैं कि ये न्यायपालिका की अवमानना है.
वो कहते हैं, "अगर कोई सरकार ये सोचती है कि बग़ैर न्यायपालिका इस देश में कोई सरकार चल सकती है तो वो सरकार ग़लत है. मेरा मानना है कि सरकार को ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे न्यायपालिका की स्वायत्ता पर आंच आए."
"अगर जजों की नियुक्ति पर हमारा-तुम्हारा बन जाता है तो ये न्यायपालिका पर आंच है और न्यायपालिका इसे बर्दाश्त नहीं करेगी".
प्रशांत भूषण कहते हैं, "हाल में सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस पर भी जिस तरह के आरोप लगाए गए थे आम आदमी का भरोसा पहले ही हिला हुआ है. उसे सुधारने की ज़रूरत है".
"और ये तब सुधरेगा जब रवैया ठीक होगा और सरकार के साथ अच्छे संबंध रखने की बजाय कोर्ट सरकार पर कड़ी निगरानी रखने लगेगा."
कैसे होती है जजों की नियुक्ति?
संजय हेगड़े के मुताबिक हाई कोर्ट जजों की नियुक्ति के लिए सिफारिश देने का अधिकार केवल जजों के कोलेजियम को ही है. ये सिफारिशें सरकार से पास भेजी जाती हैं जिन्हें सरकार को स्वीकार करना होता है.
"अगर किसी नाम पर सरकार को आपत्ति है तो वो सुप्रीम कोर्ट को कह सकती है कि इस व्यक्ति के ख़िलाफ कुछ आरोप हैं जिन पर ग़ौर करने के बाद हमें जानकारी दीजिए कि आप फिर से इसको नियुक्त करते हैं या नहीं. अगर जज उन्हीं का नाम फिर आगे बढ़ाते हैं तो सरकार को उसे मानना होता है."
संजय हेगड़े कहते हैं, "लेकिन इस मामले में दिख रहा है कि सरकार को कोई नाम नापंसद हो तो वो उस फाइल को आगे नहीं बढ़ाती है. या फिर सुप्रीम कोर्ट को बाइपास करते हुए सीधे हाई कोर्ट से संपर्क करती है."
वो कहते हैं, "ये जो न्यायपालिका के साथ झगड़ा चल रहा है ये देश के लिए ठीक नहीं है."
(वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण से बातचीत पर आधारित. उनसे बात की बीबीसी संवाददाता मानसी दाश ने.)
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