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'फ़ुल बेंच सुलझाए न्यायाधीशों के बीच मतभेद'
भारत की सर्वोच्च न्यायालय में जारी मौजूदा संकट पर बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने सात सदस्यों की एक टीम बनाई है जो सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों से मिलेगी और सुप्रीम कोर्ट से जुड़े मौजूदा संकट पर बात करेगी.
बार काउंसिल ने शनिवार को एक प्रस्ताव भी पारित किया जिसमें कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों द्वारा की गई प्रेस वार्ता का किसी राजनीतिक दल या नेता द्वारा फ़ायदा उठाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए.
वहीं सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने प्रस्ताव भी दिया कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के साथ चार वरिष्ठ जजों के मतभेदों पर कोर्ट की पूर्ण पीठ को विचार करना चाहिए.
इतिहास में पहली बार सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ जजों ने देश के सामने आकर सर्वोच्च न्यायालय में चल रही अनियमितताओं को लेकर संवाददाता सम्मेलन किया था.
इन जज़ों में जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ़ शामिल हैं.
सर्वोच्च न्यायालय के चार जजों की ओर से न्यायपालिका और लोकतंत्र को ख़तरे में बताने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के ही एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि 'न्यायाधीशों की आलोचना के बाद मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा व्यवस्था में कोई बदलाव करें, इसकी संभावना नहीं है.'
बार एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के नए प्रस्तावों और सर्वोच्च अदालत के मौजूदा संकट पर बीबीसी संवाददाता आदर्श राठौर ने सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. सूरत सिंह से बातचीत की. उनके विचार उन्हीं के शब्दों में पढ़ें -
विवेकपूर्ण सुझाव
बार एसोसिएशन का यह बहुत ही समझदारी वाला निर्णय है. चार वरिष्ठ जज एक तरफ़ हैं और वे इशारा कर रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय में बहुत गड़बड़ हो रही है.
लेकिन सर्वोच्च न्यायालय में चार ही जज नहीं हैं, 20 से ज्यादा जज हैं. यह एक न्यायपूर्ण लोकतंत्र भी है क्योंकि दूसरी तरफ़ आरोप यह भी है कि चीफ़ जस्टिस लोकतांत्रिक के बजाय तानाशाही तरीके से काम कर रहे हैं. अगर सारे जज एक साथ हैं तो आपस में बातचीत करें और कोई समाधान निकालें.
इस वक्त दुनिया की नज़रें भारत पर टिकी हैं कि इस मसले से शीर्ष अदालत आगे का क्या रास्ता निकालती है. यह एक विवेकपूर्ण सुझाव है जिसे करना चाहिए. जब भी कोई महत्वपूर्ण मुद्दा आता है तो उसपर फुल बेंच में विचार होता है. इस मसले पर भी फुल बेंच में विचार किया जाना चाहिए.
बार एसोसिएशन का मतलब है वकीलों का संगठन. इसे आप वकीलों की आवाज़ भी कह सकते हैं जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं. हमारा काम सलाह देना है जिसका महत्व होता है लेकिन कोई बाध्यता नहीं होती.
स्वस्थ परंपरा
एसोसिएशन की सलाह को मानना मुख्य न्यायाधीश के विवेकाधीन होता है, उनपर कोई बाध्यता नहीं होती. लेकिन अगर वे मानेंगे तो यह एक स्वस्थ प्रक्रिया होगी. बार और बेंच के बीच पारस्परिक आदर की भावना होनी चाहिए. बार एसोसिएशन हमेशा न्यायालयीय पीठ का आदर करता है और ऐसा होना भी चाहिए और हम भी ऐसी ही उम्मीद करते हैं.
प्रस्ताव में यह भी कहा गया है अगर कोई पीआईएल आती है तो इसकी सुनवाई चीफ जस्टिस या कॉलेजियम के वरिष्ठ जज ही करें.
इसमें भी कोई आपत्ति नहीं हैं क्योंकि पीआईएल शब्द का मतलब यह है कि वो जनहित से जुड़ी बात है. इसका व्यापक असर हो सकता है.
मुख्य न्यायाधीश के सामने या वरिष्ठतम जजों के सामने ऐसे मसले आएं तो यह भी एक अच्छा और उत्तम सुझाव है.
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