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चार जजों ने चीफ़ जस्टिस को लिखी ये चिट्ठी
सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्र को पत्र लिखकर शीर्ष अदालत की ओर से दिए गए कुछ आदेशों को लेकर चिंता जताई है.
उनका कहना है कि इन आदेशों की वजह से न्यायपालिका के संचालन पर बुरा असर हुआ है.
जस्टिस जे चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन लोकुर और कुरियन जोसफ़ की ओर से लिखे गए आठ पन्नों के पत्र का हिन्दी अनुवाद ये रहा.
डियर चीफ़ जस्टिस,
बड़ी नाराज़गी और चिंता के साथ हमने ये सोचा कि ये पत्र आपके नाम लिखा जाए, ताकि इस अदालत से जारी किए गए कुछ आदेशों को रेखांकित किया जा सके, जिन्होंने न्याय देने की पूरी कार्यप्रणाली और हाईकोर्ट्स की स्वतंत्रता के साथ-साथ भारत के सुप्रीम कोर्ट के काम करने के तौर-तरीक़ों को बुरी तरह प्रभावित किया है.
कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास में तीन हाईकोर्ट स्थापित होने के बाद न्यायिक प्रशासन में कुछ परंपराएं और मान्यताएं भलीभांति स्थापित हुई हैं. इन हाईकोर्ट्स के स्थापित होने के लगभग एक दशक बाद सुप्रीम कोर्ट अस्तित्व में आया. ये वो परम्पराएं हैं जिनकी जड़ें इससे पहले भी न्यायतंत्र में थीं.
भलीभांति स्थापित सिद्धांतों में एक सिद्धांत ये भी है कि रोस्टर का फ़ैसला करने का विशेषाधिकार चीफ़ जस्टिस के पास है, ताकि ये व्यवस्था बनी रहे कि इस अदालत का कौन सदस्य और कौन सी पीठ किस मामले को देखेगी. यह परंपरा इसलिए बनाई गई है ताकि अदालत का कामकाज अनुशासित और प्रभावी तरीके से हो. यह परंपरा चीफ़ जस्टिस को अपने साथियों के ऊपर अपनी बात थोपने के लिए नहीं कहती है.
इस देश के न्यायतंत्र में यह बात भी बहुत अच्छी तरह से स्थापित है कि चीफ़ जस्टिस अपनी बराबरी वालों में पहले है, वो उनसे न कम हैं न ज्यादा. रोस्टर तय करने के मामले में भलीभांति स्थापित और मान्य परंपराएं हैं कि चीफ़ जस्टिस किसी मामले की ज़रूरत के हिसाब से बेंच का निर्धारण करेंगे.
उपरोक्त सिद्धांत के बाद अगला तर्कसंगत कदम ये होगा कि इस अदालत समेत अलग-अलग न्यायिक इकाइयां ऐसे किसी मामले से ख़ुद नहीं निपट सकती, जिनकी सुनवाई किसी उपयुक्त बेंच से होनी चाहिए.
उपरोक्त दोनों नियमों का उल्लंघन करने से गलत और अवांछित नतीजे सामने आएंगे जिससे न्यायपालिका की ईमानदारी को लेकर देश की राजनीति के मन में संदेह पैदा होगा. साथ ही नियमों से हटने के जो बवाल होगा, उसकी कल्पना की जा सकती है.
हमें ये बताते हुए बेहद निराशा हो रही है कि बीते कुछ वक़्त से जिन दो नियमों की बात हो रही है, उनका पूरी तरह पालन नहीं किया गया है. ऐसे कई मामले हैं जिनमें देश और संस्थान पर असर डालने वाले मुकदमे इस अदालत के चीफ़ जस्टिस ने 'अपनी पसंद की' बेंच को सौंपे, जिनके पीछे कोई तर्क नज़र नहीं आता. हर हाल में इनकी रक्षा की जानी चाहिए.
हम लोग इसका ब्योरा नहीं दे रहे हैं क्योंकि ऐसा करने से सुप्रीम कोर्ट को और शर्मिंदगी उठानी होगी लेकिन ये ख़्याल रखा जाए कि नियमों के हटने के कारण पहले ही कुछ हद तक उसकी छवि को नुकसान पहुंच चुका है.
उपरोक्त मामले को लेकर हम ये उचित समझते हैं कि आपका ध्यान 27 अक्टूबर, 2017 के आर पी लूथरा बनाम भारतीय गणराज्य मामले की ओर लाया जाए. इसमें कहा गया था कि जनहित को देखते हुए मेमोरैंडम ऑफ़ प्रॉसिजर को अंतिम रूप देने में और देर नहीं करनी चाहिए. जब मेमोरैंडम ऑफ़ प्रॉसिजर सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन एंड एएनआर बनाम भारतीय गणराज्य मामले में संवैधानिक पीठ का हिस्सा था, तो ये समझना मुश्किल है कि कोई और बेंच ये मामला क्यों देखेगी?
इसके अलावा संवैधानिक पीठ के फ़ैसले के बाद मुझ समेत पांच न्यायाधीशों के कॉलेजियम ने विस्तृत चर्चा की थी और मेमोरैंडम ऑफ़ प्रॉसिजर को अंतिम रूप देकर मार्च 2017 में चीफ़ जस्टिस ने उसे भारत सरकार के पास भेज दिया था. भारत सरकार ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और इस चुप्पी को देखते हुए ये माना जाना चाहिए कि भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन मामले में इस अदालत के फ़ैसले के आधार पर मेमोरैंडम ऑफ़ प्रॉसिजर को स्वीकार कर लिया है.
इसलिए किसी भी मुकाम पर पीठ को मेमोरैंडम ऑफ़ प्रॉसिजर को अंतिम रूप देने को लेकर कोई व्यवस्था नहीं देनी थी या फिर इस मामले को अनिश्चितकालीन अवधि के लिए नहीं टाला जा सकता.
चार जुलाई, 2017 को इस अदालत के सात जजों की पीठ ने माननीय जस्टिस सी एस कर्णन को लेकर फ़ैसला किया था. उस फ़ैसले में (आर पी लूथरा के मामले में) हम दोनों ने व्यवस्था दी थी कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर दोबारा विचार करने की ज़रूरत है और साथ ही महाभियोग से अलहदा उपायों का तंत्र भी बनाया जाना चाहिए. मेमोरैंडम ऑफ़ प्रॉसिजर को लेकर सातों जजों की ओर से कोई व्यवस्था नहीं दी गई थी.
मेमोरैंडम ऑफ़ प्रॉसिजर को लेकर किसी भी मुद्दे पर चीफ़ जस्टिस की कॉन्फ्रेंस और पूर्ण अदालत में विचार किया जाना चाहिए. ये मामला काफ़ी महत्वपूर्ण है और अगर न्यायपालिका को इस पर विचार करना है, तो सिर्फ़ संवैधानिक पीठ को ये ज़िम्मेदारी मिलनी चाहिए.
उपरोक्त घटनाक्रम को गंभीरता से लिया जाना चाहिए. भारत के माननीय चीफ़ जस्टिस का कर्तव्य है कि इस स्थिति को सुलझाएं और कॉलेजियम के दूसरे सदस्यों के साथ और बाद में इस अदालत के माननीय जजों के साथ विचार-विमर्श करने के बाद सुधारवादी कदम उठाएं.
एक बार आपकी तरफ़ से आर पी लूथरा बनाम भारतीय गणराज्य से जुड़े 27 अक्टूबर, 2017 के आदेश के मामले को निपटा लिया जाए. फिर उसके बाद अगर ज़रूरत पड़ी तो हम आपको इस अदालत की ओर से पास दूसरे ऐसे न्यायिक आदेशों के बारे में बताएंगे, जिनसे इसी तरह निपटा जाना चाहिए.
धन्यवाद,
जे चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन बी लोकुर, कुरियन जोसफ़
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