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नज़रियाः नेतृत्व के लिए कांग्रेस की ओर नहीं देख रहे क्षेत्रीय दल?
शनिवार को कांग्रेस महाधिवेशन में पार्टी की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने समूचे भाषण के केंद्र में कार्यकर्ताओं को रखा. उन्होंने इस दौरान मोदी सरकार पर कड़ा प्रहार किया और कांग्रेस कार्यकर्ताओं को बलिदान के लिए तैयार रहने को कहा.
उन्होंने प्रतिशोध मुक्त भारत के निर्माण की बात की और अपने इतिहास को दोहराते हुए कार्यकर्ताओं से डट कर मुकाबला करने को कहा. अपने पूरे भाषण के दौरान सोनिया गांधी बेहद आक्रामक रहीं.
इस सब के बीच कुछ सवाल अनुत्तरित रह गए. क्या आने वाले चुनावों में कांग्रेस एक बार फिर जनता का विश्वास जीत सकेगी? क्या वो राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन करेगी? क्या राहुल गांधी कांग्रेस की नैय्या पार लगाने में कामयाब होंगे?
इन सब प्रश्नों को लेकर बीबीसी संवाददाता अभिजीत श्रीवास्तव ने वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन से बात की.
पढ़े राधिका रामाशेषन का नज़रिया
सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने अपने अपने भाषणों के दौरान भाजपा और मोदी सरकार पर आक्रमण किया. सोनिया गांधी के निशाने पर वर्तमान सरकार रही. यह कार्यकर्ताओं का समागम था और मोदी सरकार पर इस आक्रमण का उद्देश्य उन्हें प्रोत्साहित करना था.
2014 के हार के बाद सभी प्रादेशिक चुनाव हार गई. उन्होंने चिकमंगूलर का जिक्र किया. जहां से इमरजेंसी की हार के बाद इंदिरा गांधी जीती थीं. चिकमंगलूर कर्नाटक में है और अगला चुनाव वहीं है. इसिलिए उन्होंने चिकमंगलूर का जिक्र किया. बावजूद इसके कि उन्होंने आक्रमण किया, यह उतना भी प्रेरित करने वाला भाषण नहीं था.
गठबंधन पर नज़रिया देना चाहिए था
उन्हें बात आगे की करनी चाहिए थी. इस साल कई राज्यों में चुनाव हैं. दो महीने के भीतर कर्नाटक में होने वाले विधानसभा चुनाव बेहद ख़ास हैं. उन्होंने गठबंधन के मुद्दे पर कुछ स्पष्ट नहीं किया.
उन्होंने बेशक यह कहा कि 1998 में पंचमढ़ी के चिंतन शिविर में आम राय बनी थी कि कांग्रेस को गठबंधन बना कर काम नहीं करना चाहिए लेकिन 2003 के शिमला शिविर में समान विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर काम करने का निर्णय लिया.
उन्होंने ज़िक्र किया कि 2004 और फिर 2009 की कामयाबी उन्हें गठबंधन की वजह से मिली लेकिन आगे की रणनीति को स्पष्ट नहीं किया.
त्रिपुरा, पूर्वोत्तर, फूलपुर और गोरखपुर के चुनाव के बाद क्षेत्रीय दल नेतृत्व के लिए कांग्रेस की ओर नहीं देख रहे हैं. ममता बनर्जी ने अखिलेश और मायावती को बधाई दी, लेकिन यह कोई स्पष्ट रूप से नहीं कह रहा है कि हम अगला चुनाव कांग्रेस के नेतृत्व में लड़ेंगे.
कांग्रेस को पहले कर्नाटक जीतना होगा
कांग्रेस को बाक़ी सभी दलों को यह भरोसा देना होगा कि वो हम एक विकल्प का नेतृत्व करने की स्थिति में हैं.
सबसे पहले राहुल गांधी को कर्नाटक का चुनाव जीतना होगा. इसके बाद चार राज्यों मिजोरम, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में चुनाव होने हैं. तीन राज्यों में भाजपा की सरकार है.
राजस्थान में भाजपा थोड़ी डगमगा रही है. लेकिन क्या कांग्रेस इस स्थिति में है कि चुनाव जीत जाए. पिछले चुनाव में भी कांग्रेस की कमज़ोरियों की वजह और कुछ हद तक मोदी फैक्टर की वजह से भाजपा सरकार मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में वापस आ गई.
अगर ये मान लें कि कांग्रेस इन तीनों राज्यों में चुनाव जीत जाती है और कर्नाटक बचा लेती है तो इसमें कोई दो राय नहीं होगा कि कांग्रेस ही विपक्ष का नेतृत्व करेगी और राहुल गांधी का दावा बहुत मजबूत हो जाएगा.
कार्यकर्ताओं पर टिकी कांग्रेस की उम्मीदें
कांग्रेस कार्यकर्ताओं में मायूसी है और इस सम्मेलन में उन्हें केंद्र में रखने की रणनीति अच्छी रही. स्टेज में आकर साधारण कार्यकर्ताओं को बोलने का मौक़ा दिया गया. ब्लॉक समिति में ज़मीनी कार्यकर्ता हैं.
अमित शाह का काम करने का तरीक़ा यही है वो कई ज़मीनी कार्यकर्ताओं को बहुत महत्व देते हैं. वो हर कार्यकर्ता को उनके चेहरे और नाम से पहचानते हैं. राहुल गांधी में कार्यकर्ताओं के साथ इतना जुड़ाव है या नहीं यह कहना मुश्किल है.
कांग्रेस को न्यू मीडिया की समझ नहीं
भाजपा अगर यह सम्मेलन कर रही होती तो यह पहले से ख़बरों में होता लेकिन कांग्रेस इस तरह के आयोजनों का प्रचार नहीं कर पाती जो उसे करना सीखना होगा. भाजपा की तुलना में कांग्रेस अभी भी बहुत पीछे हैं.
कांग्रेस पहले के अधिक आक्रामक
ऐसा नहीं है कि सोनिया गांधी इस सम्मेलन में ही आक्रामक दिखी हैं. सोनिया गांधी पहले भी आक्रामक रही हैं. 2004 के चुनाव से पहले के भाषणों में वो कुछ मुहावरें बोलती थीं और अटल सरकार पर हमले किया करती थी.
तब सोनिया गांधी को भाजपा बहुत कमतर आंकती थी. उस दौरान उन्होंने राजस्थान और दिल्ली के चुनाव में कई आक्रामक भाषण दिए. वो बहुत सही तरीके से हमले करती हैं.
कांग्रेस गांधी परिवार है और गांधी परिवार कांग्रेस
इतिहास ने भी साबित किया है कि गांधी परिवार के बिना कांग्रेस का कोई मतलब नहीं रह जाएगा. पार्टी बिखर जाएगी. नरसिम्हा राव सरकार के दौरान भी राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं रहते हुए भी उन्होंने राजनीतिक बयान दिए हैं, उन्होंने खुद को अलग कभी इससे अलग नहीं रखा.
अमेठी में उन्होंने सुरक्षा में कटौती किए जाने पर टिप्पणी की थी. जिस तरह संघ और भाजपा का नाता है उसी प्रकार कांग्रेस और गांधी परिवार का है.
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