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बीजेपी को क्यों पड़ी नरेश अग्रवाल की जरूरत?
- Author, शरद गुप्ता
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
जिस पार्टी के उत्तर प्रदेश में 80 में से 73 सांसद और 403 में से 325 विधायक हों तो उसे नरेश अग्रवाल जैसे विवादित व्यक्ति को शामिल करने की जरूरत क्यों पड़ी?
यह सवाल राजनीतिक शुचिता की दुहाई देने वाली भारतीय जनता पार्टी के किसी भी प्रतिबद्ध समर्थक को परेशान कर सकता है. लेकिन, उन्हें नहीं जिन्होंने पिछले पांच सालों में भाजपा की राजनीति को, उसकी नई कार्यशैली को नजदीक से देखा है.
आज की भाजपा 1992 से लेकर 2012 की भाजपा से बहुत अलग है.
बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद के वर्षों में भाजपा उत्तर प्रदेश में 175 से 177 सीटें जीतने के बाद भी सरकार नहीं बना पाती थी. तब सरकार बनाने के लिए भाजपा को बहुजन समाज पार्टी नेता मायावती की तरह-तरह की शर्त माननी पड़ती थी. कभी ढाई-ढाई साल का बंटवारा तो कभी छह-छह महीने की सरकार.
लेकिन, 2012 के बाद भाजपा देश में एक चुनाव जीतने की मशीन के रुप में उभरी है. मौजूदा नेतृत्व का मानना है कि राजनीति का अर्थ जनता की सेवा करना तो है ही लेकिन जनता की सेवा तभी की जा सकती है जब सत्ता की बागडोर आपके हाथ में हो और नीतियां आप अपने अनुसार बनाएं.
अल्पमत को बहुमत में बदलने का कौशल
अपने इसी कौशल के कारण भाजपा एक के बाद एक ऐसे राज्यों में भी सत्ता पाने में सफल रही है जहां चुनाव में बहुमत उसे नहीं मिल पाया था - चाहे वह मणिपुर हो, मेघालय, गोवा या फिर बिहार.
जिन नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने पर भाजपा का साथ छोड़ दिया था, जिनके खिलाफ बीजेपी ने बहुत कड़वाहट भरा चुनाव लड़ा, हर तरह की ऊंच-नीच की बातें कीं, उनके साथ दोबारा हाथ मिलाने में उसे चंद मिनट ही लगे.
राजनीतिक मौसम विज्ञानी नरेश अग्रवाल को भाजपा में शामिल करने के पीछे एक सोच छोटे दलों पर नज़र भी होना है. येन-केन प्रकारेण सत्ता हथियाना. नरेश अग्रवाल का प्रभाव हरदोई और उस से सटी हुई मिश्रिख लोकसभा सीट पर है. भले ही 2014 का चुनाव भाजपा ने इन दोनों सीटों पर बिना नरेश अग्रवाल की मदद के जीता लेकिन तब देश में नरेंद्र मोदी की लहर थी.
उसके बाद से नोटबंदी और जीएसटी जैसे बड़े आर्थिक कदम उठाए गए हैं जिनका प्रभाव आम जनता पर पड़ा है. इसलिए एंटी-इनकॉबेंसी पर पार पाने के लिए अग्रवाल जैसी कई पतवारों का इस्तेमाल होना है. खासतौर पर ऐसी जो ख़ुद ब ख़ुद बीजेपी के पाले में गिरने को तैयार हो.
पिछले साल हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी की अभूतपूर्व विजय के पीछे सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, अपना दल जैसे छोटे दलों का योगदान था.
तो बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने उपेन्द्र कुशवाहा की लोकसमता पार्टी, जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा और राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी का साथ लिया.
यही नहीं, फूलपुर लोकसभा उप चुनाव में जेल में बंद माफ़िया सरगना अतीक अहमद के चुनाव लड़ने से मदद तो बीजेपी को ही मिली.
राज्यसभा चुनाव पर असर
इसी क्रम में उसे नरेश अग्रवाल में एक क्षत्रप नजर आया जिसका फौरी इस्तेमाल राज्यसभा चुनाव में होना है. उत्तर प्रदेश में 10 राज्य सभा सीटें हैं. एक सीट जीतने के लिए प्रथम वरीयता के 37 मतों की जरूरत होगी.
अपने संख्याबल के हिसाब से भाजपा 8 सीटें आराम से जीत सकती है. इसके बाद भी उसके पास 28 वोट बचे रहेंगे. उसने एक निर्दलीय उम्मीदवार अनिल अग्रवाल को खड़ा कर विपक्षी खेमे में फूट डालने की योजना बनाई है.
समाजवादी पार्टी के पास 47 विधायक हैं. अपनी उम्मीदवार जया बच्चन को जिताने के बाद उसके पास 10 अतिरिक्त वोट होंगे जिन्हें वह बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार भीमराव अंबेडकर को देगी. कांग्रेस के साथ बसपा के 19 विधायक हैं और राष्ट्रीय लोक दल का एक. यदि सपा के सभी 10 विधायक अंबेडकर को वोट दें तो उनकी जीत सुनिश्चित हो जाएगी. यहीं पर नरेश अग्रवाल की भूमिका है.
नरेश अग्रवाल का बेटा नितिन हरदोई समाजवादी पार्टी का विधायक है. नरेश ने राजनीतिक आस्था बदलते समय ही घोषणा कर दी कि उनका बेटा अब भाजपा के उम्मीदवार को वोट देगा. यानी अंबेडकर पहली वरीयता के वोटों से नहीं जीत पाएंगे.
विपक्षी एकता में पलीता
पिछले 20 सालों में नरेश अग्रवाल कांग्रेस, लोकतांत्रिक कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी सभी में रह चुके हैं. भाजपा नेतृत्व उनके इन्हीं संपर्कों का लाभ उठाकर अनिल अग्रवाल को जिताना चाहता है.
यदि बसपा उम्मीदवार भीमराव अंबेडकर हार जाते हैं तो जाहिर है मायावती और अखिलेश यादव के बीच शुरू हुआ भाईचारा 2019 के आम चुनाव तक नहीं चल पाएगा. यानी केंद्र की सत्ता तक भाजपा की राह सुगम हो जाएगी. बीजेपी नेता तब दावा कर पाएंगे कि विपक्षी एकता मुहिम शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई.
बक़ौल रोमेश भंडारी
उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे रोमेश भंडारी ने अपनी किताब 'एज आई सॉ इट' (जैसा मैंने देखा) में उन घटनाओं का जिक्र किया जो उनके कार्यकाल में हुईं.
इनमें चौबीस घंटे के लिए जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बनाने का क़िस्सा भी शामिल है. भंडारी ने लिखा कि नरेश अग्रवाल और उनकी लोकतांत्रिक कांग्रेस के विधायक कभी कल्याण सिंह के साथ आकर उन्हें समर्थन देते तो कभी पाल के साथ मेरे पास आते और उनके नेतृत्व में आस्था व्यक्त करते. मैं क्या करता?
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