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नज़रिया: नरेंद्र मोदी की राह पर ही चल रहे राहुल गांधी
- Author, रशीद किदवई
- पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
स्मृति ईरानी को चर्चा में रहने की आदत है. शायद एक अभिनेत्री रहने के कारण यह उनमें स्वाभाविक रूप से है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संघ परिवार द्वारा प्रोत्साहन के कारण ईरानी कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को निशाने पर लेती रही हैं.
2014 के लोकसभा चुनाव में अमेठी (उत्तर प्रदेश) में हार के बाद उनको केंद्र में मंत्री बनाया गया. वह शायद ही कभी कांग्रेस उपाध्यक्ष का उपहास उड़ाने या उनका विरोध करने का मौका छोड़ती हैं.
तो जब राहुल गांधी अमेरिका गए तो वहां उन्होंने एक अमरीकी विश्वविद्यालय में कश्मीर से लेकर नोटबंदी और वंशवाद की राजनीति से लेकर अपनी पार्टी कांग्रेस से जुड़े हर सवाल का जवाब दिया. इसके बाद स्मृति ने तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उन्हें एक 'नाक़ाम राजनीतिज्ञ' करार दे दिया. उन्होंने जो आलोचना की उसमें गहराई और ठोस मुद्दों की कमी थी.
कांग्रेस भी भूल करती है
राहुल गांधी को एक असफल राजनेता कहना क्या इस वजह से है कि कांग्रेस 2014 का लोकसभा का चुनाव हारी थी? कांग्रेस ने तुरंत स्मृति की टिप्पणियों का जवाब देते हुए उन्हें याद दिलाया कि वह अमेठी में लोकसभा चुनाव हारी थीं. यहां तक कि कांग्रेस से जुड़े कई ट्विटर हैंडल ने ट्वीट कर स्मृति से पूछा कि वह कैसे सीधा कोई चुनाव जीते बिना मंत्री पद पर बनी हुई हैं.
वैसे कांग्रेस भी भूलने की बीमारी से ग्रसित दिखती है. यूपीए सरकार के 10 साल में डॉ. मनमोहन सिंह बिना सीधे चुनाव जीते प्रधानमंत्री थे. वास्तव में स्मृति की तरह ही मनमोहन सिंह भी कोई सीधा चुनाव नहीं जीते थे.
ईरानी और राहुल गांधी के बीच मात्र छह साल की उम्र का फ़ासला है. ईरानी का जन्म जहां 1976 में हुआ था, वहीं राहुल का जन्म 1970 में हुआ था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके संकटमोचक राहुल को तवज्जो देने में काफ़ी होशियार दिखते हैं. बीजेपी इस बात को जानती है कि इंदिरा और सोनिया गांधी को तब बहुत लाभ हुआ था जब विपक्ष ने उन्हें विशेष रूप से निशाना बनाया था. लेकिन ईरानी बनाम राहुल की लड़ाई में कांग्रेस उपाध्यक्ष मज़बूती से उभर रहे हैं.
अमरीका दौरे से लाभ
इसके लिए कई कारण हैं, जैसे राहुल का ठोस और संतोषजनक प्रदर्शन. फ़्लोरिडा, बॉस्टन और दूसरे अमरीकी शहरों में काफ़ी दिनों तक रुकने पर उनको काफ़ी आत्मविश्वास मिला है. सैम पित्रोदा, मिलिंद देवड़ा और शशि थरूर जैस पेशेवर लोगों की टीम के काम ने राहुल को अधिक धार दी है. लेकिन यह बड़े अफ़सोस की बात है कि क्यों राहुल घरेलू राजनीति में पेशेवर लेखकों के भाषण को इस्तेमाल नहीं करते हैं.
राहुल का भाषण बुरा नहीं था, लेकिन अभी भी आमने-सामने की बातचीत उनके लिए बड़ी समस्या बनी हुई है. जब परिवार की राजनीति पर राहुल बोल रहे थे तो उन्हें अमरीका में परिवार की राजनीति पर भी बात करनी चाहिए थी. धन इकट्ठा करने के साथ-साथ उन्हें बुश और क्लिंटन परिवार की राजनीतिक प्रवृत्ति पर भी बात करनी चाहिए थी और क्या पता जिस तरह डोनल्ड ट्रंप अपनी बेटी इवांका को राजनीति में शामिल करते हैं, उस तरह कल ओबामा या ट्रंप परिवार का कोई सदस्य भी पूरी तरह राजनीति में आ जाए.
कांग्रेस को इस बात से ख़ुद को तसल्ली देनी चाहिए कि जब तक बीजेपी राहुल गांधी और वह जो कह रहे हैं उस पर हमलावर रहेगी तब तक राहुल और कांग्रेस राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहेंगे. अमरीकी दौरे से उन्हें यह असली लाभ होगा.
एफ़पीटीपी से कांग्रेस को लाभ
संसदीय लोकतंत्र में 'फ़र्स्ट पास्ट द पोस्ट' (एफपीटीपी) प्रणाली की समीक्षा पर राहुल के विचार बताते हैं कि उनको गहरी जानकारी है. 'फ़र्स्ट पास्ट द पोस्ट' चुनाव की वो प्रणाली है जिसमें सबसे अधिक वोट मिलने वाले उम्मीदवार की जीत होती है. मई 2014 के आम चुनाव के मद्देनज़र कांग्रेस ने एफ़पीटीपी पर बात उठाना शुरू की थी. एफ़पीटीपी की सबसे बड़ी आलोचना इसलिए होती है कि इसमें उम्मीदवारों के जीतने के बाद कोई पार्टी सरकार तो बना लेती है, लेकिन उसे जनता का अधिक वोट प्राप्त नहीं हुआ होता.
हालांकि, 1952, 1957 और 1984 के आम चुनावों को छोड़कर कांग्रेस एफ़पीटीपी की प्रमुख लाभकारी रहेगी.
अमरीका में राहुल के भाषण और उनकी सीधी बातचीत ने 2019 के आम चुनाव की उनकी रणनीति की झलक दिखाई है. राहुल ख़ुद के नेतृत्व के ज़रिए कांग्रेस से बीजेपी को हराने की कोशिश करेंगे. इसीलिए ऐसा लगता है कि राहुल ने मोदी सरकार की राजनीति को दबाने के लिए यूसी बर्कले जैसे विदेशी प्लेटफ़ॉर्म का चुनाव किया.
यह बीजेपी के लिए चौंकाने वाला हो सकता है और 2019 तक इसके बढ़ने की आवश्यकता है. वैसे भी विदशी धरती से अपने विरोधियों की आलोचना करने की शुरुआत नरेंद्र मोदी ने ही की थी.
बर्कले विश्वविद्यालय की तरह कांग्रेस और राहुल गांधी को भारतीय विश्वविद्यालयों में जाना चाहिए और उन्हें अपनी रणनीति को बताना चाहिए. कई बार राहुल गांधी ने भट्टा पारसौल, मंदसौर और नोटबंदी मामले में विरोध की शुरुआत अच्छी की, लेकिन मौके मिलने के बाद वह गायब हो गए.
2012 में कांग्रेस में घमंड आने की बात जो राहुल गांधी ने कही है, वह स्वागतयोग्य है क्योंकि वह इसे स्वीकार कर रहे हैं. वैसे उनके स्वीकार करने से ही सब ठीक नहीं हो जाता. पांच साल हो गए हैं, लेकिन कांग्रेस ने इसको ठीक करने की कोशिश नहीं की.
कांग्रेस में आज भी कई मामलों पर टकराव की स्थिति है. वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सोनिया गांधी को अपना नेता मानते हैं तो युवा राहुल गांधी को अपना नेता मानते हैं. राहुल ने 2019 में प्रधानमंत्री बनने की इच्छा तो जता दी है, लेकिन उसके लिए कांग्रेस क्या प्रयास कर रही है, वह दिखाई नहीं देता.
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