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नज़रिया: 'गुजरात चुनाव राहुल के लिए बड़ा सियासी मौका है'
- Author, रशीद किदवई
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
कांग्रेस उपाध्याक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि आनेवाले गुजरात विधानसभा चुनावों में बीजेपी और उसे वैचारिक प्रेरणा देने वाली आरएसएस के ख़िलाफ़ लड़ने वाले सच्चे कार्यकर्ताओं को ही टिकट दिए जाएंगे.
गुजरात में साबरमती के तट पर आयोजित कांग्रेस कार्यकर्ताओं के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि वो लोग जो अभी-अभी पार्टी में आए हैं उन्हें टिकट नहीं दिए जाएंगे.
राहुल गांधी ने नोटबंदी, बेरोज़गारी, जीएसटी, किसानों की दुर्गति के लिए मोदी सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि बीते दो दशक से प्रदेश की सत्ता से दूर कांग्रेस इस बार गुजरात में सरकार बनाएगी.
उनका कहना था कि गुजरात के विकास के मोदी सरकार के खोखले दावों की पोल खुल चुकी है और कुछ गिनेचुने लोगों को छोड़ दिया जाए तो इससे किसी को कोई फयदा नहीं हुआ.
उन्होंने कहा "बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात चुनावों के संभावित नतीजों से डरे हुए हैं. सच्चाई को देर तक छिपाया नहीं जा सकता."
आनेवाले गुजरात चुनाव में कांग्रेस और राहुल गांधी की रणनीति को लेकर बीबीसी संवाददाता मानसी दाश ने वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई से बात की. पढ़िए उनका विश्लेषण
गुजरात कांग्रेस के लिए हारी हुई बाज़ी
प्रथम दृष्टि में गुजरात विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए एक हारी हुई बाज़ी है. यहां कांग्रेस बहुत पिछड़ी हुई है और हाल में जो सर्वे भी किए गए हैं उनमें भाजपा को बहुत ज़्यादा आगे दिखाया गया है.
राहुल गांधी वहां कुछ तज़ुर्बा करना चाहते हैं. वहां कांग्रेस विभिन्न गुटों में बंटी हुई है.
शंकर सिंह वाघेला के अलग होने से कांग्रेस और सिकुड़ गई है, लेकिन उसमें एक नई ऊर्जा का संचार हो रहा है.
पहले जिनके जीतने की संभावना होती थी उन्हें ही टिकट दिया जाता था, लेकिन कांग्रेस अब वैसा नहीं करना चाहती.
राहुल गांधी चाहते हैं कि कांग्रेस अपने बलबूते चुनाव लड़े, ना कि इस आधार पर कि किसके पास अधिक ताकत है या जाति समीकरण के आधार पर समर्थन किसके पाले में अधिक है.
अमित शाह बनाम अहमद पटेल
हाल में राज्यसभा की एक सीट के लिए जो चुनाव हुआ जिसमें अहमद पटेल जीते थे, वहां पर जीतना कांग्रेस को ही था, लेकिन भाजपा और अमित शाह ने पूरा ज़ोर लगाया कि अहमद पटेल राज्यसभा में न आ सकें. लेकिन कंग्रेस ने अपना क़िला मज़बूत रखा उससे दो-तीन बातें तय हो गईं.
एक तो ये कि कांग्रेस के हर नेता को साधन के बल पर खरीदा नहीं जा सकता और दूसरा ये कि अहमद पटेल गई-गुज़री हालत में भी गुजरात कांग्रेस का बड़ा चेहरा हैं.
अहमद पटेल पुराना चावल हैं. वो संजय गांधी के समय कांग्रेस से जुड़े और उन्होंने राजीव गांधी के साथ भी काम किया. दशकों से कांग्रेस के सारे कामों के दौरान वो परदे के पीछे रहे और उन्होंने साबित किया कि उन्हें काम करना आता है.
गुजरात में जहां एक तरफ़ अमित शाह हैं, दूसरी तरफ़ हैं अहमद पटेल जिनकी एक राजनीतिक हैसियत है और उस पृष्ठभूमि में भी ये चुनाव दिलचस्प होंगे.
मोदी अमित शाह के नेतृत्व पर उठ सकता है सवाल
ये पहली बार है जब कांग्रेस वहां से लड़ने के लिए कमर कस रही है जहां से प्रधानमंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. कांग्रेस उन्हें उनके गढ़ में घेरने की कोशिश कर रही है.
गुजरात पाटीदार आंदोलन सुर्खियों में रहा है, वहां का पटेल समुदाय सरकार से नाराज़ है. और भी तबके हैं जो नाराज़ हैं.
अहमद पटेल खुद मुख्यमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं, ना ही वो अपने को उस भूमिका में देखते हैं. वो पर्दे के पीछे सभी भाजपा विरोधी गुटों को इकट्ठा करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं.
अगर कांग्रेस इसमें थोड़ा बहुत कामयाब होती है, भाजपा की सीटें कम हो जाती हैं और भाजपा को बहुमत नहीं मिल पाता है तो कांग्रेस के लिए ये काफ़ी बड़ा उपलब्धि होगी. देश की राजनीति में ये एक बड़ा भूचाल होगा.
ये मोदी और अमित शाह के नेतृत्व पर सवालिया निशान लगा देगा.
लेकिन फिलहाल ये कांग्रेस के लिए ख़्याली पुलाव ही है. समय ही बताएगा कि कांग्रेस इसमें कितनी कामयाब होगी.
दलित वोट का पेंच
भाजपा गुजरात में अपने काडर को कह रही है कि अगर उन्हें उत्तर प्रदेश में अधिक सीटें मिल सकती हैं तो प्रधानमंत्री को गृह राज्य में उन्हें और अधिक सीटें मिलनी चाहिए और भाजपा ने भी अपने लिए बड़ा टार्गेट रखा है.
और राहुल गांधी ने जो कहा उसे देखें तो ये कहना आसान है, लेकिन करना मुश्किल क्योंकि गुजरात कांग्रेस में वैचारिक रूप से सब दूध के धुले नहीं हैं.
आने वाले चुनावों में दलित मुद्दा भी संवेदनशील मुद्दा बनेगा और राष्ट्रपति चुनाव में रामनाथ कोविंद को चुन कर भाजपा ने कुछ-कुछ इसकी तैयारी कर ली है.
लेकिन दलित समाज में जो बेचैनी है वो ऐसी बातों से दूर होगी ऐसा नहीं लगता.
अगर कांग्रेस अच्छे तरीके से चुनाव लड़ती है तो जो भी ऐसे गुट हैं जो भाजपा से खुश नहीं हैं वो एक साथ आ सकते हैं.
अगर पाटीदार, पटेल, अल्पसंख्यक और दलित सभी कांग्रेस से पक्ष में आते हैं तो चुनाव काफ़ी दिलचस्प होंगे.
कांग्रेस गुजरात में यही दांव खेल रही है. वो नरेंद्र मोदी और अमित शाह को उन्हीं के गृह राज्य में घेरने की कोशिश कर रही है. ये काम मुश्किल है, लेकिन नामुमकिन नहीं.
इन चुनावों में नाक की लड़ाई में मोदी-शाह एक तरफ तो राहुल-अहमद पटेल दूसरी तरफ़ हैं.
अगले साल 22 जनवरी को गुजरात विधानसभा का कार्यकाल ख़त्म हो रहा है और वहां इस साल के अंत में चुनाव हो सकते हैं.
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