गोरखपुर उपचुनाव में मासूम बच्चों की मौत का मुद्दा

इमेज स्रोत, Kumar harsh
- Author, कुमार हर्ष
- पदनाम, गोरखपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए
अचानक बेहद दिलचस्प हो चुके गोरखपुर संसदीय उपचुनाव में बुधवार को अपनी पार्टी का प्रचार करने पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मौजूदा सरकार और प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर कई मसलों को लेकर तंज कसे.
मगर तकरीबन 20 मिनट के अपने भाषण में उन्होंने 4 मिनट तक गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में पिछले साल अगस्त में हुई 34 बच्चों की मौत और इस इलाके में तीन दशक से लगातार मौत का तांडव रच रहे इंसेफेलाइटिस का खास तौर पर ज़िक्र किया.
इंसेफेलाइटिस बना चुनावी मुद्दा
इस चुनाव में कांग्रेस के तकरीबन इकलौते स्टार प्रचारक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर ने भी 5 और 6 मार्च को अपने चुनावी सभाओं और प्रेस कॉन्फ्रेंस में मासूमों की मौत पर बार-बार सवाल खड़े किए हैं.
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के प्रत्याशियों की चुनावी सभाओं में भी अगस्त में कथित रूप से ऑक्सीजन आपूर्ति में हुई लापरवाही के चलते हुई बच्चों की मौत का मसला जरूर उठता है.
एक ऐसा चुनाव जो एक कद्दावर शख्सियत की प्रतिष्ठा और बहुत मुश्किल से हासिल हुए अवसर को जीत में बदल देने के लिए हरसंभव समीकरण गढ़ते विपक्ष के बीच हो रहा है, जहां ज़रूरी मुद्दों के ऊपर दांवपेंच की कालीन बिछा दी गई हो वहां ऐसे सवाल का बार-बार और लगातार उठना बेहद दिलचस्प है जो इससे पहले के किसी भी चुनाव में इस तरह चर्चा में नहीं आया था.
तो क्या मान लिया जाए कि पहली बार मासूम बच्चों की मौत या एक जानलेवा बीमारी अब एक चुनावी मुद्दा बन गई है?
गोरखपुर के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ और इंसेफेलाइटिस उन्मूलन को राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल करने के लिए वर्षों से आवाज़ उठा रहे डॉ आरएन सिंह ऐसा नहीं मानते.

इमेज स्रोत, kumar harsh
बकौल डॉक्टर सिंह सरकार की नाकामी या लापरवाही साबित करने के लिए ही बच्चों की मौतों का सवाल उठाया जा रहा है. वो कहते हैं, "इससे विरोधियों को सरकार पर हमला करने का मौक़ा तो मिल सकता है लेकिन इससे बीमारी के उन्मूलन में कोई फायदा नहीं होगा."
डॉ सिंह 2012 से इस बात के लिए पैरवी कर रहे हैं कि पोलियो और चेचक जैसे रोगों के उन्मूलन के लिए जिस तरह राष्ट्रीय कार्यक्रम चलाए गए उसी तरह इंसेफेलाइटिस के लिए भी कार्यक्रम चलाया जाना चाहिए.
इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने के लिए उन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में बाकायदा इंसेफेलाइटिस मेनिफेस्टो भी जारी किया था.
हालांकि अब उनका मानना है कि इस साल 3 फरवरी को योगी सरकार ने इंसेफेलाइटिस उन्मूलन के लिए जिस तरह 'दस्तक' अभियान शुरू किया है वह स्वागतयोग्य है.
सिंह कहते हैं, "पहली बार साल की शुरुआत से ही उन्मूलन के लिए समन्वित प्रयास करने वाला यह अभियान काबिले तारीफ है लेकिन नौकरशाही की अलग-अलग व्यस्तताओं के चलते यह शायद अप्रैल तक ही ज़मीन पर उतर पाए और तब तक रोग फिर अपने पांव फैला चुका होगा."

इमेज स्रोत, kumar harsh
इस मुद्दे पर भाजपा रही है नाकाम?
सभी जानते हैं कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के इस इलाके में 1978 से हर साल सैकड़ों मासूमों की मौत की वजह बनने वाली इस बीमारी पर आज तक प्रभावी अंकुश नहीं लग सका है.
पिछले साल भी इसके चलते 500 से ज्यादा मौतें अकेले गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज में हुई थी.
पिछले साल इस सालाना शोक में दुखद त्रासदी की एक और कथा जुड़ गई थी जब 10 और 11 अगस्त की दरम्यानी रात 34 मासूमों ने एक के बाद एक दम तोड़ दिया था. तब इन मौतों का जिम्मेदार माना गया मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन सप्लाई में की गई लापरवाही को.
हालांकि तब मेडिकल कॉलेज प्रशासन और खुद सरकार ने लगातार इन आरोपों का खंडन किया था लेकिन ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी के मालिक और मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल समेत 9 लोग लापरवाही के आरोप में अब भी जेल में ही है.

इमेज स्रोत, kumar harsh
देश और दुनिया के अख़बारों की सुर्खियों में यह दुर्घटना तब 4 महीने पुरानी योगी सरकार के लिए संकट और चौतरफा हमलों का सबब बन गई थी. अब एक बार फिर विपक्षी दल इन्हीं इल्जामों को दोहरा रहे हैं.
कांग्रेस उम्मीदवार डॉक्टर सुरहिता करीम कहती हैं, "अभी तक इंसेफेलाइटिस उन्मूलन के लिए जो भी बड़े काम हुए हैं- चाहे वह टीकाकरण हो या मेडिकल कॉलेज में बाल रोग विभाग को साधन संपन्न करने का काम हो- सब कांग्रेस सरकारों ने ही किया. भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए जो सवाल उठाए हैं सत्ता में आने पर उन्हें ज़मीनी हकीकत तक क्यों नहीं पहुंचाया?"
सपा प्रत्याशी प्रवीण निषाद भी आरोप लगाते हैं कि अखिलेश सरकार ने मेडिकल कॉलेज को इस रोग से लड़ने के लिए जिन सुविधाओं की शुरुआत की थी, उसमें कोई बढ़ोतरी तो दूर, मौजूदा सरकार के राज में ऑक्सीजन सप्लाई तक सुनिश्चित नहीं की जा सकी.
ये प्रत्याशी खास तौर पर ग्रामीण इलाकों में इस बात का ज़िक्र जरूर कर रहे हैं जहाँ इंसेफेलाइटिस का हमला अक्सर होता रहा है.

इमेज स्रोत, kumar harsh
भाजपा के बचावी बयान
भारतीय जनता पार्टी की तरफ से इस चुनावी जंग के अगुआ योगी आदित्यनाथ भी शायद इसीलिए अपनी सभाओं में यह दोहराना नहीं भूलते कि संसद में इस जानलेवा बीमारी के लिए सबसे ज्यादा आवाज़ उन्होंने ही उठाई थी और किस तरह उनकी सरकार व्यापक टीकाकरण से लेकर रोग उन्मूलन के समन्वित प्रयास पर आधारित 'दस्तक' अभियान चला रही है.
मंगलवार को गोरखपुर में मौजूद सरकार के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने भी अपनी सभाओं में विस्तार से अपनी सरकार के इंसेफेलाइटिस उन्मूलन कार्यक्रमों का जिक्र किया.
पार्टी के क्षेत्रीय प्रवक्ता डॉ सत्येन्द्र सिन्हा कहते हैं, "सड़कों से लेकर संसद तक सिर्फ योगी जी ने ही इस मुद्दे पर जंग लड़ी है. तब सत्ता में बैठे ये दल क्या कर रहे थे?"
इंसेफेलाइटिस को लेकर विभिन्न स्तरों पर सक्रिय ग़ैर सरकारी संगठन एपीपीएल के स्थानीय संयोजक डॉ संजय श्रीवास्तव इसे एक अच्छा संकेत मानते हैं. वो कहते हैं, "जनता के लिए ज़रूरी मुद्दों के बारे में अगर राजनीतिक दल चुनाव में बात करने लगे हैं तो यह अच्छा है. देर से ही सही पर इसके शुरू होने से परिस्थितियों में ज़रूर बदलाव आएगा."
हालांकि इस मसले पर शीर्ष अदालतों और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में अरसे से लड़ाई लड़ रहे संगठन मानव सेवा संस्थान के निदेशक राजेश मणि के मुताबिक ये आवाजें फिलहाल चुनावी हथियार से ज्यादा कुछ नहीं. बकौल मणि, "इतनी देर से यह गंभीरता क्यों? कटघरे में सब हैं.
इसे चुनावी मुद्दा बनाने की बजाय साझा जिम्मेदारी का मुद्दा बनाया जाए तो ज्यादा बेहतर होगा."
फिलहाल तो यह दूर की कौड़ी ही लगती है मगर इन उम्मीदों के हकीकत में बदलने का इंतजार इस अभिशप्त इलाके को शिद्दत से है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)














