पीएनबी ने विराट कोहली को लेकर क्यों दिया ये बयान?

विराट कोहली

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देश के दूसरे सबसे बड़े सरकारी बैंक पंजाब नेशनल बैंक में करीब 11,400 करोड़ रुपये का घोटाला पिछले दिनों उजागर हुआ. इसके बाद से ही बैंक तमाम वजहों से सुर्खियों में बना हुआ है.

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली पीएनबी के ब्रैंड एंबेसडर हैं और उस नाते बैंक से करीब दो साल से जुड़े हुए हैं और बैंक के विज्ञापनों में नज़र आते रहे हैं.

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया था कि कोहली अब इस बैंक के साथ अपना करार तोड़ने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं और अब शायद कोहली पीएनबी को 'मेरा अपना बैंक' कहते हुए नज़र न आएं.

लेकिन समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक शुक्रवार को पीएनबी ने एक बयान जारी करते हुए ऐसी अटकलों को निराधार बताया.

बैंक ने कहा कि विराट कोहली उनके ब्रैंड एंबेसडर बने रहेंगे. साथ ही बैंक ने उन ख़बरों को झुठलाया जिनमें दावा किया गया था कि हीरा व्यापारी नीरव मोदी और उनके साथियों द्वारा किए गए 11,400 करोड़ रुपये के घोटाले की जांच ऑडिट फ़र्म प्राइस वाटर हाउस कूपर्स (पीडब्ल्यूसी) से कराई जा रही है.

ये घोटाला मुंबई की एक शाखा में हुआ था और इस घोटाले को भारत के बैंकिंग इतिहास का सबसे बड़ा फर्ज़ीवाड़ा बताया जा रहा है.

पीएनबी

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बैंक ने 14 फ़रवरी को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज यानी बीएसई को इस फर्ज़ीवाड़े की जानकारी दी थी.

इसके अलावा, बयान में कहा गया है कि बैंक में कामकाज सामान्य रूप से चल रहा है और पैसा निकालने पर किसी तरह की बंदिश लगाने की खबरें महज अफवाह हैं.

बयान के मुताबिक, "विराट कोहली हमारे ब्रैंड एंबेसडर हैं. एंबेसडर के रूप में बैंक से अलग होने की मीडिया रिपोर्ट्स झूठ और गलत हैं."

इससे पहले, सोशल मीडिया में इस तरह की ख़बरें चल रही थी कि बैंक ने पैसा निकालने की सीमा तय की है और हर ग्राहक 3000 रुपये ही निकाल सकता है. बैंक ने इन ख़बरों को निराधार बताते हुए स्पष्ट किया, "विदड्रॉल पर किसी तरह की पाबंदी नहीं लगाई गई है और बैंक ने ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया है."

बैंक ने ये भी कहा कि अब तक 18000 कर्मचारियों के स्थानांतरण की ख़बर में किसी तरह की सच्चाई नहीं है और हक़ीकत ये है कि सिर्फ़ 1,415 ट्रांसफ़र किए गए हैं जो कि बैंक की नीति के ही मुताबिक हैं.

कैसे हुआ था घोटाला?

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अरबपति डायमंड कारोबारी नीरव मोदी और उनके साथियों ने साल 2011 में बिना तराशे हुए हीरे आयात करने को लाइन ऑफ़ क्रेडिट के लिए पंजाब नेशनल बैंक की एक ब्रांच से संपर्क साधा.

आम तौर पर बैंक विदेश से आयात को लेकर होने वाले भुगतान के लिए एलओयू या लेटर ऑफ़ अंडरटेकिंग जारी करता है. इसका ये मतलब है कि बैंक नीरव मोदी के विदेश में मौजूद सप्लायर को 90 दिन के लिए भुगतान करने को राज़ी हुआ और बाद में पैसा नीरव को चुकाना था.

लेकिन पीएनबी के कुछ कर्मचारियों ने कथित तौर पर नीरव मोदी की कंपनियों को फ़र्ज़ी एलओयू जारी किए और ऐसा करते वक़्त उन्होंने बैंक मैनेजमेंट को अंधेरे में रखा.

इन्हीं फ़र्ज़ी LoU के आधार पर भारतीय बैंकों की विदेशी शाखाओं ने पंजाब नेशनल बैंक को लोन देने का फ़ैसला किया.

साज़िश रचने वाले लोगों ने एक क़दम जाकर स्विफ़्ट या सोसाइटी फ़ॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फ़ाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशन का नाजायज़ फ़ायदा उठाने का फ़ैसला किया. ये इंटर-बैंकिंग मैसेजिंग सिस्टम है जो विदेशी बैंक पैसा जारी करने से पहले लोन ब्योरा पता लगाने के लिए इस्तेमाल करते हैं.

बैंक के कुछ कर्मचारियों ने कथित तौर पर अपने सुपरवाइज़र से बिना कोई इजाज़त लिए गारंटी को हरी झंडी दिखाने के लिए स्विफ़्ट तक अपनी पहुंच का फ़ायदा उठाया.

इसके फ़लस्वरूप भारतीय बैंकों की विदेशी शाखाओं को कोई शक़ नहीं हुआ और उन्होंने नीरव मोदी की कंपनियों को फ़ॉरेक्स क्रेडिट जारी कर दिया.

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ये रकम एक विदेशी बैंक के साथ पंजाब नेशनल बैंक के खाते में दी गई थी जिसे नोस्ट्रो एकाउंट कहते हैं. पैसा इस एकाउंट से मोदी के विदेश में मौजूद बिना तराशे हुए हीरे सप्लाई करने वाले लोगों को भेजा गया.

जब ये फ़र्ज़ी एलओयू मैच्योर होने लगे तो पंजाब नेशनल बैंक के भ्रष्ट कर्मचारियों ने सात साल तक दूसरे बैंकों की रकम का इस्तेमाल इस लोन को रिसाइकिल करने के लिए किया.

इस सारी धोखाधड़ी से तब पर्दा हटा जब इस घोटाले में लिप्त पंजाब नेशनल बैंक के कर्मचारी-अधिकारी रिटायर हो गए और नीरव मोदी की कंपनी के अफ़सरों ने जनवरी में दोबारा इसी तरह की सुविधा शुरू करने की गुज़ारिश की. नए अधिकारियों ने ये ग़लती पकड़ ली और घोटाले से पर्दा हटाने के लिए आंतरिक जांच शुरू कर दी.

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