पद्मावती की इज़्ज़त बचे न बचे, सरकारों की इज़्ज़त दांव पर

करणी सेना के उपद्रव को लेकर राज्य सरकारों की चुप्पी से सवाल उठ रहे हैं कि सरकारें आख़िर किस लिए हैं?

पद्मावत फ़िल्म को लेकर जारी हंगामा और सत्ता में बैठे लोगों की ख़ामोशी से कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं.

उपद्रवी लोगों से सख़्ती से निबटने की बात तो दूर, कोई उनके उपद्रव के बारे में मुँह खोलने तक को तैयार नहीं दिख रहा, और ये सब ऐसे समय पर हो रहा है जबकि भारतीय संविधान के लागू होने का उत्सव मनाया जा रहा है.

इस उत्सव में शामिल होने आए दस आसियान देशों के राष्ट्राध्यक्ष देश में सम्मानित अतिथि हैं और उन्हें अख़बारों-टीवी पर क्या दिख रहा होगा?

देश भर में अलग-अलग समय पर हुए उत्पात और उपद्रव से राज्य सरकारें किस तरह निबटती रही हैं उसमें भारी भेदभाव दिखाई देता है, करणी सेना से निबटने के मामले में तो ये कहना भी मुश्किल है कि सरकार उनसे निबट रही है.

गुड़गाँव में स्कूली बच्चों की बस पर हमले के बाद सोशल मीडिया पर काफ़ी आक्रोश दिखाई दे रहा है, उस पर राहुल गांधी ने टिप्पणी तो की है लेकिन करणी सेना के उत्पात पर उन्होंने भी मुँह नहीं खोला है.

फ़िल्म की रिलीज़ से ठीक एक दिन पहले इस फ़िल्म का विरोध कर रही करणी सेना के प्रमुख लोकेंद्र सिंह कालवी ने जयपुर में प्रेस कांफ्रेंस करके कहा कि उनके लोग गोली चलाने तक को तैयार हैं.

बीजेपी सरकारों पर सवाल

इस फिल्म के ख़िलाफ़ गुजरात के अहमदाबाद और हरियाणा के गुरुग्राम में भारी तोड़फोड़ देखने को मिली है.

इस विरोध प्रदर्शन को देखते हुए मल्टीप्लेक्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया से संबंधित थिएटरों ने इस फ़िल्म को राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और गोआ में प्रदर्शित नहीं करने का फ़ैसला लिया है. मल्टीप्लेक्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया से देश के 75 फ़ीसदी थिएटर संबंधित हैं.

संयोग ये है कि इन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है. लेकिन इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इस विरोध प्रदर्शन पर अंकुश लगाने की कोई पहल नहीं की है और ना ही इस बारे में उनका कोई बयान आया है.

हरियाणा के गुरुग्राम में हुई हिंसा की चपेट में एक स्कूली बस आने के बाद इस राज्य में भी फिल्म प्रदर्शन को सुरक्षित नहीं माना जा रहा है. हरियाणा में भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार है.

ये सब तब हो रहा है जब सुप्रीम कोर्ट इस फ़िल्म को रिलीज करने की हरी झंडी़ दिखा चुका है. और तो और देश राष्ट्रीय गौरव का पर्व गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारी में जुटा है.

इस मौके पर आसियान देशों की बैठक दिल्ली में हो रही है. बैठक में थाईलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, म्यानामार, कंबोडिया, लाओस और ब्रुनेई जैसे देशों के राष्ट्राध्यक्ष इस बैठक में शामिल होने के लिए दिल्ली में मौजूद हैं.

गणतंत्र दिवस समारोह में ये सभी राष्ट्राध्यक्ष मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होने वाले हैं. भारत सरकार की ओर से कम से कम 100 सरकारी एजेंसियां इन मेहमानों को लेकर तैयारियों में जुटी है.

मोदी-राजनाथ की चुप्पी

लेकिन इस दौरान देश भर में चल रहे पद्मावती को लेकर तमाशे को रोकने की दिशा में कोई पहल नहीं दिखी है. केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह उसी बिरादरी से आते हैं, जिसके सम्मान के नाम पर करणी सेना विरोध प्रदर्शन कर रही है.

खुद प्रधानमंत्री की ओर से भी इस पूरे विवाद पर कोई बयान नहीं आया है. सरकार चलाने वालों की चुप्पी को देखते हुए पुलिस महकमे की ओर से भी इस विवाद को रोकने के उपायों और निर्देशों पर स्पष्टता से कुछ भी नहीं कहा जा रहा है.

हालांकि केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह जैसे लोगों के कुछ बयान ज़रूर आए हैं, लेकिन उन बयानों में फ़िल्म पद्मावत की आलोचना ही देखने को मिली है, करणी सेना के ख़िलाफ़ सबकी जुबान बंद है.

यहां तक कि विपक्ष भी इस मुद्दे पर बीजेपी सरकारों को घेरने में नाकाम रहा है.

ऐसे में लग यही रहा है कि पद्मावत के बहाने भारतीय जनता पार्टी ही नहीं बल्कि तमाम राजनीतिक दल राजपूती आन बान शान के नाम पर इस तबके को भावनात्मक तौर पर बढ़ावा देकर राजनीतिक लाभ लेने का इंतजार कर रही हैं.

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