असम: क्या अब कभी इंसान और हाथी साथ रह सकेंगे?

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- Author, नवीन सिंह खड़का
- पदनाम, पर्यावरण संवाददाता, बीबीसी
असम में चाय उत्पादकों की ओर से जंगलों के अतिक्रमण ने हाथियों और मनुष्यों के बीच हिंसक संघर्ष को हवा दे दी है. ऐसा कहना है असम के स्थानीय लोगों और अधिकारियों का.
अधिकारी बताते हैं कि अतिक्रमण किए गए जंगलों के ज़्यादातर हिस्सों पर छोटे स्तर की चाय की खेती की जा रही है. लेकिन स्थानीय लोगों ने बड़े चाय बागानों पर आरोप मढ़ते हुए बीबीसी से कहा कि उनकी ज़मीनों का भी कोई नया सर्वे नहीं किया गया है.
चाय की बड़ी कंपनियों ने इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज करते हुए कहा कि जंगलों का बने रहना खुद चाय के बागानों के हित में हैं.
हालांकि, पर्यावरण मंत्रालय की 2015 की रिपोर्ट के अनुसार, "जंगल के इलाके में आई कमी की वजह इन पर अतिक्रमण, जैविक दबाव, कटाई और झूम खेती है."

हाथी के हमले से बढ़ रही हैं मौतें
आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि 2006 से 2016 के बीच असम में जंगली हाथियों ने 800 लोगों को मार डाला है.
भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक यहां हाथी या बाघ के कारण हर रोज़ एक आदमी की मौत होती है.
2014 से 2015 के दौरान, हाथियों के हमले से हुई मौतों के मामले में पश्चिम बंगाल के बाद असम का स्थान रहा, जहां इस दौरान 54 लोगों की मौत हुई.
दक्षिण असम के सेसा चाय बागान गांव की रहने वाली मरियम केरकेट्टा कहती हैं, "मैं अपनी बेटी से अंतिम समय में मिल भी नहीं सकी, हाथी ने उसे कुचल दिया था."

हाथी ने बेटी को कुचल दिया
पिछले साल अक्तूबर में हाथी ने जब हमला किया तब 26 वर्षीय बोबिता केरकेट्टा अपने दोस्त के स्कूटर पर थीं और वो वहां से कूदकर भागी थीं.
मरियम कहती हैं, "उनका दोस्त वहां से निकलने में कामयाब रहा लेकिन मेरी बेटी वहां फंस गयी क्योंकि दोनों तरफ चाय के बागान के बाड़ लगे थे."
वो कहती हैं, "हम यहां सदियों से रह रहे हैं लेकिन अब हाथियों के हमले के कारण यहां जीना बहुत मुश्किल और ख़तरनाक होता जा रहा है. इस पर जल्द ही कुछ करना होगा."

हाथियों पर भी संकट
इस संघर्ष में हाथियों की भी मौतें हुई हैं. पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, 2013 से 2014 के बीच 72 हाथियों की मौत हुई है. जबकि 2012 में यह संख्या 100 से भी अधिक थी.
संरक्षण संस्थाओं के आंकड़े के मुताबिक, 2001 से 2014 के बीच अवैध शिकार, गाड़ियों, ज़हर, करंट लगने से 225 हाथियों की मौत हो गयी.
एशिया के 60 फ़ीसदी हाथी भारत में रहते हैं.
इनकी सबसे ज़्यादा आबादी कर्नाटक में है, इसके बाद असम का नंबर आता है जहां इनकी संख्या 5,700 से भी अधिक है.
संरक्षणकर्ता कहते हैं कि असम में हाथी पहले से अधिक आक्रामक हो गये हैं क्योंकि उनके रहने की जगहें कम होती जा रही हैं और पारंपरिक गलियारों पर दिन प्रति दिन कब्जा होता जा रहा है.

जंगलों की जगह अब चाय बागान
उरलगुडी ज़िले के जंगल के वार्डन मानस शर्मा कहते हैं, "पहले ये क्षेत्र जंगल थे. पहले गांव और आरक्षित वन क्षेत्रों के बीच बफर हुआ करता था जहां हाथी रहा करते थे."
वो कहते हैं, "हाथियों के लिए भोजन, पानी की कमी नहीं थी. लेकिन जनसंख्या बढ़ने के साथ ही इन इलाकों में चाय के बागान शुरू होते गये, जो हमारे नियंत्रण में नहीं हैं."
उन्होंने कहा, "यह अतिक्रमण अब आरक्षित वनों के साथ सटे सीमा क्षेत्र तक पहुंच गए हैं, जो हमारे (असम वन विभाग) नियंत्रण में आता है."

वो आगे कहते हैं, "हाथी चाय की पत्तियां नहीं खाते, इसलिए अब वो गांवों में घुस रहे हैं. यही कारण है कि हम हाथियों और मनुष्यों के बीच हो रहे इस संघर्ष को देख रहे हैं."
शर्मा कहते हैं कि छोटे स्तर पर चाय की खेती करने वाले इन जंगलों पर अतिक्रमण किए जा रहे हैं.
असम राजस्व विभाग के अधिकारियों ने नाम न छापने के अनुरोध पर बताया कि जंगल के इलाके में छोटे स्तर पर चाय की खेती कर रहे कुछ लोगों से ज़मीन वापस ज़ब्त की जा रही है.

छोटे उत्पादकों पर नज़र
सरकारी असम चाय परिषद में 23 ज़िलों के 56 हज़ार छोटे चाय उत्पादक रजिस्टर्ड हैं.
लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि इतनी ही संख्या में ऐसे और छोटे उत्पादक हैं जिन्हें रजिस्टर नहीं किया गया है.
कई छोटे उत्पादक अपनी चाय बड़ी कंपनियों को भी बेचते हैं.

बड़े उत्पादकों पर आरोप
चाय उत्पादक ज़िलों में रहने वाले लोग कहते हैं कि बड़ी चाय कंपनियों पर भी सवाल उठाए जाने चाहिए.
बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद के नेता दिपेन बोरो कहते हैं, "उनकी ज़मीनों का कभी सर्वे क्यों नहीं किया जाता? यहां तक कि जिन लोगों को 70 साल पहले जमीनें दी गयी थीं."
"हमारे अनुमान के मुताबिक 30 से 40 फ़ीसदी अतिक्रमण (बड़ी) चाय कंपनियों की हैं और हम सर्कल अधिकारी और संबंधित अधिकारियों पर चाय बागानों की वास्तविक स्थिति बताने के लिए दबाव बना रहे हैं."
वो कहते हैं कि जल्द ही वो सूचना के अधिकार क़ानून के तहत इसकी जानकारी लेंगे.

आरोप को ग़लत बताती हैं कंपनियां
असम में बड़ी चाय कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन भारतीय चाय संघ का कहना है कि ये आरोप निराधार हैं.
संघ के सचिव संदीप घोष ने कहा, "हम वनों में जंगल नष्ट करने या पेड़ काटकर चाय के पौधे लगाने नहीं गये हैं."
वो कहते हैं, "अगर हम जंगल से पेड़ों की कटाई करेंगे तो इससे चाय को ही नुकसान होगा. इसलिए यह हमारे खुद के हित में है कि जंगल की हरियाली बनी रहे."
वो कहते हैं कि सर्वे करना उनका काम नहीं है.
उन्होंने कहा, "ज़मीन पर हमारा कोई अधिकार नहीं है. हम सरकार पर यह दबाव नहीं डाल सकते कि वो सर्वे करें या ना करें. यह सरकार का कर्तव्य है कि वो राजस्व जुटाए और ज़मीनों के सर्व कराये."
क्या सरकार कभी चाय बागानों की ज़मीनों के सर्वे करवाएगी, यह तो वक़्त ही बतायेगा. लेकिन, असम में हाथियों और इंसानों के बीच संघर्ष बड़ी तेज़ी से गंभीर रूप ले रहा है.
इंसानी आबादी के बढ़ने और लगातार होती जंगलों की कटाई से लगभग पूरा राज्य ही यह पूछ रहा है कि क्या अब कभी इंसान और हाथी एक साथ रह सकेंगे.
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