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तीस्ता जलविद्युत परियोजना: 'एक नदी पर कितने बांध बनाएंगे?'
- Author, आरती कुलकर्णी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सिक्किम के ज़ोंगू क्षेत्र का लेप्चा समुदाय तीस्ता-4 जलविद्युत परियोजना का विरोध कर रहा है. 520 मेगावाट की इस परियोजना को उत्तर सिक्किम में तीस्ता नदी पर बनाने का प्रस्ताव है.
इस परियोजना को पर्यावरण से जुड़े मामलों पर काम करने वाले राष्ट्रीय ग्रीन ट्राइब्यूनल की मंज़ूरी मिल चुकी है लेकिन स्थानीय लोग इस पर सवाल उठा रहे हैं.
संरक्षित जैवमंडल कंचनजंगा की तलहटी में बसे ज़ोंगू में प्राकृतिक संसाधनों का भंडार है. इन पर्वतों में तीस्ता और रोंगोंग नदियां बहती हैं. सिक्किम का लेप्चा समुदाय सदियों से इन नदियों के किनारे रहता आ रहा है.
'नदी बंधी तो जीविका पर असर पड़ेगा'
मायाल्मित लेप्चा ज़ोंगू के हिग्यातांग गांव में रहती हैं. वो कहती हैं, "कंचनजंगा की चोटी और तीस्ता, रंगीत, रोंगोंग जैसी नदियां हमारे लिये पवित्र हैं."
माया के मुताबिक़, "हम मानते हैं कि हमारे शरीर कंचनजंगा के बर्फ़ से बने होते हैं और मौत के बाद हमारी आत्मा इस नदी से होकर हमारे पूर्वजों की आत्माओं के पास जाती है."
लेप्चा सिक्किम का मूल समुदाय है और ज़ोंगू उनके लिये विशेष संरक्षित भूमि है. बाहर का कोई व्यक्ति यहां न तो ज़मीन खरीद सकता है और न ही यहां आकर बस सकता है.
केवल ज़ोंगू क्षेत्र में ही करीब चार हज़ार लेप्चा रहते हैं जबकि अन्य लेप्चा लोग सिक्किम, तिब्बत, दार्जिलिंग, नेपाल और पश्चिम बंगाल में रहते हैं.
लेप्चा समुदाय इस वक़्त अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. उनकी आबादी घटकर लगभग 50 हज़ार तक आ गई है.
सिक्किम में कई जलविद्युत बांध बनाए गए हैं और कई अन्य प्रस्तावित हैं.
लेप्चाओं का मानना है कि इससे उनके अस्तित्व को और अधिक ख़तरा हो सकता है इसलिए वे तीस्ता, रोंगोंग और रंगीत जैसी नदियों को बचाने के लिए लड़ रहे हैं.
मायाल्मित कहती हैं, "ये नदियां हमारी जीवन रेखा हैं. अगर बांध बनेंगे तो नदी के पानी को रोका जायेगा. अगर नदी ही नहीं होगी तो जीवन भी नहीं रहेगा. यह हमारी धान जैसी खेती, बागवानी और मछली पकड़ने जैसे जीविका के साधनों पर असर डालेगा."
सबसे कम उम्र के पहाड़ों में से है हिमालय
मायाल्मित और उनके सहयोगियों ने मिलकर एक्ट नाम का एक एनजीओ बनाया है. वे इन परियोजनाओं के ख़िलाफ़ पिछले 10 सालों से लड़ रहे हैं. एक्ट के ज़रिए वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आवाज़ उठा रहे हैं.
सिक्किम में 20 से अधिक जलविद्युत बांध हैं. इनमें से तीस्ता नदी की चार परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं जबकि दो बाधित हैं.
तीस्ता-4 इसी सिरीज़ का हिस्सा है. यह परियोजना देश की प्रमुख जलविद्युत कंपनी एनएचपीसी की है.
ज़ोंगू के पसिंगडांग गांव के गित्सो लेप्चा भी क़ानूनी स्तर पर तीस्ता-4 परियोजना के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं.
वो कहते हैं, "कई बांधों की वजह से तीस्ता नदी सूख गई है. वे इसे रन ऑफ़ द रिवर प्रोजेक्ट कहते हैं लेकिन असल में वे नदी को रोकते हैं और फिर सुरंग के ज़रिए पावर स्टेशन तक जाने के लिए पानी के रास्ते को मोड़ देते हैं."
गित्सो लेप्चा बताते हैं, "भूगर्भविदों के अनुसार, हिमालय सबसे कम उम्र पहाड़ों में से है और ये अभी बढ़ भी रहे हैं. अगर आप मानसून में यहां आते हैं तो कई जगहों पर भूस्खलन देखेंगे. इससे पता चलता है कि ये पहाड़ कितने नाज़ुक हैं. अगर आप इतने बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियां चलायेंगे तो इससे और अधिक तबाही आएगी."
'नदी नहीं तो लेप्चा नहीं'
गित्सो लेप्चा ज़ोर देकर कहते हैं कि यह परियोजना उनके नस्ल के लिए ख़तरा है. वो कहते हैं कि, "हम बाघ की तरह हैं, अगर जंगल नहीं रहेगा तो बाघ भी जीवित नहीं रहेंगे. इसी तरह, अगर हम इस नदी और जंगल को खो देते हैं तो हमारा जीना मुश्किल होगा."
उन्होंने कहा, "तीस्ता नदी को कई जगहों पर रोक दिया गया है. इसलिए हम नदी की अंतिम धारा को बचाने के लिए लड़ रहे हैं."
एनएचपीसी भी इस ख़तरे से इनकार नहीं करता लेकिन बताता है कि वे लेप्चाओं को बचाने के लिए पहले ही क़दम उठा चुके हैं.
एनएचपीसी के सीएमडी बलराज जोशी ने बीबीसी को बताया कि, "हमने लेप्चा संस्कृति को बचाने के लिए इस परियोजना की साइट को बदल दिया है. पहले यह परियोजना कैपरिडांग मेला मैदान में प्रस्तावित थी जिसे हम इस नई जगह पर लाए हैं."
क्या है रन ऑफ़ द रिवर परियोजना?
बलराज जोशी ने बताया कि, "यह रन ऑफ़ द रिवर परियोजना है. इस तरह की परियोजनाओं के लिए हम बड़ा जलाशय नहीं बनाते हैं. इसमें हम कुछ घंटों के लिए पानी को रोकते हैं और बिजली उत्पादन के बाद पानी को फिर नदी में छोड़ दिया जाता है."
हालांकि वे इस बात से सहमत दिखे कि पहले की परियोजनाओं के चलते कुछ जगहों पर तीस्ता सूख गयी है. जोशी कहते है, " हम सावधानी बरतेंगे और इस नदी के साढ़े चार किलोमीटर के लंबाई मे जलाशय के रूप मे पानी रहेगा."
लेकिन कल्पवृक्ष के नीरज वाघोलिकर उनके इस दावे से मुतमईन नहीं दिखते. वाघोलिकर 2001 से पूर्वोत्तर में जलविद्युत परियोजनाओं से पर्यावरण और समाज पर पड़ने वाले असर का अध्ययन कर रहे हैं.
नीरज बताते हैं कि, "वे बिजली उत्पादन के बाद पानी छोड़ देते हैं लेकिन इस नदी पर कई बांध हैं इसलिए अगर एक परियोजना से पानी छोड़ते हैं तो दूसरी से बंद कर दिया जाता है. नतीजा - पूरी नदी इससे प्रभावित होती है."
'इको टूरिज़्म क्यों नहीं बढ़ाती सरकार?'
बीबीसी ने इस परियोजना के बाबत सरकारी अधिकारियों से संपर्क किया. सीएमओ के प्रमुख सचिव आर. एस. बसनेट ने कहा कि, "हम तब तक इस परियोजना को आगे नहीं ले जायेंगे जब तक लोकतांत्रिक तरीके से इसे मंज़ूर नहीं किया जाता."
मायाल्मित और गित्सो लेप्चा ज़ोर देकर कहते हैं कि, "हम विकास के ख़िलाफ़ नहीं हैं, लेकिन यदि आप विकास चाहते हैं तो हमें अच्छी सड़क, परिवहन और बुनियादी ढांचे की ज़रूरत है."
वो कहते हैं, "सिक्किम में इको टूरिज़्म को लेकर बहुत संभावनाएं हैं, यहां की सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए. यहां बांध देखने के लिए आने वाले लोग इन पहाड़ों और नदियों की सुंदरता का आनंद लेंगे."
विकास पर्यावरण की कीमत पर नहीं
तीस्ता के किनारे खड़े हो कर मायाल्मित कहती हैं कि समाज का हर व्यक्ति विकास चाहता है लेकिन यह पर्यावरण की क़ीमत पर नहीं होना चाहिए.
पर्यावरणविद इसाक किहिमकर ने भी सिक्किम में पर्यावरण को लेकर चिंता जताई है. वे सवाल करते हैं, "तीस्ता पर सिक्किम और पश्चिम बंगाल पर हर जगह बांध है. हम सहमत हैं कि सिक्किम में जलविद्युत परियोजनाओं की अच्छी संभावना है लेकिन हमें इसका अत्यधिक दोहन नहीं करना होगा. एक नदी पर कितने बांध बनाएंगे?"
वहीं जलविद्युत विशेषज्ञ कहते हैं कि बिजली उत्पादन के लिए सिक्किम की ज़मीन का इस्तेमाल करना चाहिए. रिटायर्ड चीफ़ इंजीनियर दीपक मोडक के मुताबिक़, "सिक्किम और पूर्वोत्तर राज्यों में 63 हज़ार मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता है. कोयले की तुलना में पनबिजली एक स्वच्छ ऊर्जा है. ऐसे में हमें इस तरह की जलविद्युत परियोजनाओं की ज़रूरत है."
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