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ब्लॉग: मीडिया मुसलमानों को एक ही तरह से क्यों देखती है?
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बॉलीवुड की फ़िल्में अक्सर एक मुस्लिम परिवार या एक मुस्लिम व्यक्ति को एक ख़ास अंदाज़ में दिखाती हैं. दाढ़ी, पर्दा, मस्जिद, अज़ान और नमाज़ इस स्टीरियो टाइप पेशकश का हिस्सा होते हैं.
मैंने ऐसी फ़िल्में देख कर खुद से पूछा है क्या मैं मुस्लिम नहीं हूँ? बॉलीवुड मेरे जैसे मॉडर्न मुस्लिम को अपनी कहानियों में जगह क्यों नहीं देता?
कुछ ऐसा ही एहसास हो रहा है इन दिनों तीन तलाक़ पर छपने वाली ख़बरों को पढ़ कर या टीवी पर इन ख़बरों को देख कर.
तीन तलाक़ को लेकर छपने वाली किसी ख़बर को पढ़ता हूँ तो इस में ढेर सारी बुर्क़ा पोश ख़्वातीन की तस्वीरें नज़र आती हैं. कुछ तस्वीरों में एक या दो औरतों को दिखाया जाता जो सर से पैर तक काले बुर्क़े में होती हैं.
उनकी केवल आंखें नज़र आती हैं. अगर तस्वीरें एक से अधिक इस्तेमाल की जाती हैं तो फिर मस्जिद में नमाज़ पढ़ते हुए मर्दों को दिखाया जाता है. या फिर मदरसों में ज़मीन पर बैठे क़ुरान पढ़ते बच्चे. यही हाल टीवी और ऑनलाइन पर प्रसारित हुई ख़बरों का है.
दूसरे पहलुओं को करें उजागर
ये एक ऐसी मूर्खता है जिसका शिकार अक्सर हम खुद भी हो जाते हैं. शायद ध्यान नहीं देते या आलस्य में ऐसा करते हैं. अब देखिये इस ब्लॉग के साथ जो पिक्चर हम इस्तेमाल कर रहे हैं उन में बुर्का और दाढ़ी भी ला रहे हैं.
मीडिया में इस्तेमाल होने वाली ये तस्वीरें ग़लत नहीं हैं लेकिन अगर केवल ऐसी ही तस्वीरें हमेशा दिखाई जाएँ और मुस्लिम समुदाय के दूसरे पहलुओं को उजागर न किया जाए तो हम भी बॉलीवुड की सफ (पंक्ति) में शामिल हो जाएंगे यानी मुसलमानों को एक ख़ास तरह से पेश करने की ग़लती के मुल्ज़िम कहलाएंगे.
मुस्लिमों में भी उतनी ही विविधताएं हैं...
शायद अख़बारों के न्यूज़रूम में काम करने वाले पत्रकार जानबूझ कर ऐसा नहीं करते लेकिन मेरे जैसे मुसलमानों को नाइंसाफ़ी का एहसास जो होता है वो आप महसूस नहीं कर सकते.
भारत जैसे महान देश में अलग-अलग समुदाय ही नहीं बसते बल्कि हर समुदाय में विविधता भी होती है. भारत का मुसलमान समुदाय एक मोनोलिथिक या अखंड समाज नहीं है.
इसमें एक साथ तीन तलाक़ के जितने हामी मिलेंगे उतने इसके विरोधी भी. जितने दाढ़ी वाले मुसलमान नज़र आएंगे इससे कहीं अधिक क्लीन शेव वाले. जितनी हिजाबी महिलाएं नज़र आएँगी उससे कहीं ज़्यादा बुर्का और पर्दा के बग़ैर ज़िन्दगी बसर करने वाली औरतें.
स्वर्गीय गायक मोहम्मद रफ़ी को आप किस श्रेणी में रखेंगे? वो अल्लाह की शान में जिस खूबी से हम्द गाते उसी जज़्बे से भगवान राम की शान में भजन भी गाते. वो और उनके परिवार वाले न दाढ़ी रखते थे और न उनकी औरतें बुर्का पहनती थीं, लेकिन वो थे मुसलमान.
मुस्लिम समुदाय पर लिखे लेख पर रफ़ी के परिवार वाली छवि क्यों नहीं इस्तेमाल की जाती?
बहुत अहमियत है तस्वीरों की
मेरे जैसे लाखों मुस्लिम और उनके परिवार वाले न्यूज़रूम में काम करने वाले ग़ैर मुस्लिमों की तरह ही ज़िन्दगी बसर करते हैं. शादी और तलाक़ तो मुस्लिम समाज के इस तबक़े में भी है. तो मॉडर्न मुस्लिम की तस्वीरें क्यों नहीं छपती है?
आजकल के कमर्शियल पैकेजिंग और मार्केटिंग के दौर में छवि या इमेज की बड़ी अहमियत होती है.
एक स्टडी के मुताबिक़ तस्वीरों और वीडियो के साथ इस्तेमाल किये गए लेख बग़ैर तस्वीरों वाले लेख की तुलना में 94 प्रतिशत अधिक पढ़े जाते हैं.
मीडिया में तस्वीरों का बहुत महत्त्व है. मुसलमानों की जो तस्वीरें सोशल मीडिया पर दिखाई जाती हैं उससे सोशल मीडिया से जुड़ी नयी पीढ़ी क्या नतीजा निकालेगी?
हमसे जाने अनजाने में जो खता हो रही है, वो आसानी से दूर की जा सकती है. केवल मेरे समुदाय के प्रति सेंसिटिव और संवेदनशील होने की ज़रूरत है.
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