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ब्लॉग: क्या मुसलमान को चिंतित होने की ज़रूरत है?
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की ज़बरदस्त जीत और योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद मुस्लिम समाज में खलबली सी मच गई. व्हाट्सऐप समूह में तरह-तरह की अफवाहें फैलने लगीं, आदित्यनाथ के मुस्लिम-विरोधी पुराने वीडियोज़ शेयर किेए जाने लगे.
एक मैसेज आया, "क्या हमारा हाल अब गुजराती मुसलमानों जैसा होगा?. क्या अब हमारा भविष्य अंधकार में है?"
उत्तर प्रदेश के मुसलमान इन घटनाओं की तुलना 1992 में बाबरी मस्जिद के गिरने वाली त्रासदी से कर रहे थे. जिस तेज़ी से चीज़ें हो रही थीं उससे समुदाय के अंदर बौखलाहट पैदा हो रही थी.
ऐसे में राम मंदिर के निर्माण की मांग ज़ोर पकड़ने लगी. इसके इलावा अवैध कहे जाने वाले बूचड़खानों के खिलाफ मुहीम शुरू हो गई.
मुसलमानों के बेचैन होने का कारण ये था कि बीजेपी ने उन्हें टिकट दिए बिना और उनके वोट लिए बग़ैर इतनी भारी जीत हासिल की थी. सियासत में समुदाय की हिस्सेदारी अब ख़तरे में थी. वो सोचने लगे कि अगर सत्ता और पावर में साझेदारी ख़त्म हो गई तो समुदाय की आवाज़ कौन उठाएगा.
क्या है गुजरात का मॉडल
ऐसे में लोग गुजरात के मुसलमानों का उदाहरण दे रहे थे. यूपी में हुई घटनाओं को वो गुजरात मॉडल कह रहे थे. एक ने कहा कि भाई गुजरात में बीजेपी पिछले 25 सालों से सत्ता में है. हर चुनाव जीतती है.
मुस्लिम उम्मीदवार को चुनावी मैदान में नहीं उतारती और उनके वोट हासिल करने की कोशिश भी नहीं करती. क्या यूपी के मुसलमानों का हाल 25 साल बाद वही होगा जो आज गुजरात में मुसलमानों का हो रहा है?
यूपी के मुसलमानों के डर को ठीक से समझने के लिए और ज़मीन से सीधी जानकारी हासिल करने के लिए मैं ने उत्तर प्रदेश के कुछ इलाक़ों का दौरा किया.
वहां लोगों से मिलने पर एहसास हुआ कि वो असलियत में अधिक भयभीत हैं -- आम लोगों में और नेताओं में भी. मीट की एक दुकान के मालिक मुहम्मद कुरैशी का आरोप था कि उत्तर प्रदेश में बूचड़खानों के ख़िलाफ़ जारी अभियान मुस्लिम विरोधी है.
उन्होंने कहा, "मुसलमानों के काम पर ही हाथ डाला जा रहा है. वो मुसलमान को कारोबार से तोड़ना चाह रहे हैं. कारोबार जब टूट जाएगा, उसके पास पैसा नहीं होगा, तो ज़ाहिर है वो ग़ुलाम बन कर रहेगा."
कई लोगों को लगने लगा कि हिन्दू राष्ट्र बनने की तैयारी शुरू हो गयी है जिसमे मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनकर रहना पड़ेगा. तौसीफुर्रहमान नामी गांव के एक आदमी ने कहा, ""इस में कोई शक नहीं कि ये हिन्दू राष्ट्र होने वाला है. लोग इसकी काफ़ी कोशिश कर रहे हैं."
समुदाय के वरिष्ठ नेताओं में भी ऐसी ही भावना है. संभल से समाजवादी पार्टी के छठी बार विधायक बने और पिछली सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे इक़बाल महमूद कहते हैं कि भारत हिन्दू राष्ट्र तो आज़ादी के पहले दिन से है.
"हिन्दू राष्ट्र में रखा क्या है? हिंदुस्तान के अंदर हिन्दू मेजोरिटी में हैं. इनकी सरकारें बनती आयीं हैं पहले दिन से और आगे भी उन्हीं की सरकार होगी. मुसलमान या दूसरी माइनॉरिटी ने कभी दावा नहीं किया कि हम प्रधानमंत्री बनेंगे. हिन्दू राष्ट्र है हिन्दू ही बनेंगे."
मुस्लिम समाज की चुनौती
हैरानी इस बात पर था कि इतनी जल्दी मुस्लिम समाज ने चिंतन शुरू कर दिया. सहमति इस बात पर होती दिखाई दी कि मुसलमानों में एकता होनी चाहिए जिसकी इस समय सख्त कमी है.
उनके अनुसार समस्या ये है कि मुस्लिम एकता हासिल करता कोई दिखाई नहीं देता. इस समय मुस्लिम समुदाय कई भागों में बंटा है. कोई कद्दावर नेता नहीं. कुछ मुस्लिम युवा मुस्लिम नेताओं पर भरोसा नहीं करते. रामपुर के हामिद अली के अनुसार उनका नेता हिन्दू भी हो तो चलेगा. ऐसी बातें और लोगों ने भी कहीं.
हाल ही में में गुजरात गया. पिछले 25 से बीजेपी की सरकार में मुस्लिम समुदाय किस तरह की ज़िन्दगी बसर कर रहे हैं?
मुझे पहले से ही इस बात की जानकारी थी कि बीजेपी ने 25 सालों में किसी मुस्लिम को विधानसभा के चनाव में खड़ा नहीं किया. इस विधान सभा में केवल दो मुस्लिम विधायक हैं और वो दोनों कांग्रेस पार्टी के हैं.
सियासत और सत्ता में भागीदारी?
लेकिन गुजरात की पहली बड़ी तस्वीर इतनी पॉजिटिव थी कि ये यूपी के मुसलमानों के लिए एक बड़ा सबक़ हो सकती है. वडोदरा के दीवालेपुरा के हिन्दुओं ने नीलोफ़र पटेल नामी एक युवा मुस्लिम लड़की को सर्वसहमति से अपना सरपंच चुना था.
नीलोफ़र का कहना था उनके चुने जाने को सकारात्मक तरीके से देखना चाहिए. "नीचे से ऊपर तक जाएंगे". यानी उन्हें उम्मीद है कि मुस्लिम समुदाय को सियासत और सत्ता में भागेदारी मिलेगी.
ग़ौर करने वाली बात है कि आम मुस्लिम नागरिक अपने क्षेत्र के हिन्दू विधायकों के पास अपनी ज़रूरतें और अपनी शिकायतें लेकर जाते हैं. जमालपुर से बीजेपी के विधायक भूषण भट कहते हैं, "ना मैं किसी का नाम पूछता हूँ, ना किसी का धर्म पूछता हूँ और ना किसी की जात पूछता हूँ. वो अपना काम लेकर आते हैं. मैं उनका काम जितना हो सके, करने की कोशिश करता हूँ."
हाँ ये सही है कि 2002 में हुई भयानक हिंसा में पीड़ित होने वाले मुस्लिम अब भी इंसाफ़ की मांग कर रहे हैं सामूहिक तौर पर समुदाय अपने पैरों पर खड़ा हो रहा है. मुझे लोगों ने एक आवाज़ में बताया कि वो अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रहे हैं जिसके लिए खुद को शिक्षित करना उनकी प्राथमिकता है.
याद रहे कि 2002 के वक़्त मुसलमानों की शिक्षा से सम्बंधित संस्थाएं 200 थीं. आज उनकी संख्या 800 है.
इस्लामी भी और हिंदुस्तानी भी
मैं ऐसे ही एक स्कूल गया जहाँ छोटी लड़कियां पढ़ाई करने में मसरूफ थीं. उनका यूनिफार्म इस्लामी था, भाषा गुजराती और दिल हिंदुस्तानी. उनकी महत्वाकांक्षा डॉक्टर, इंजीनियर और फैशन डिज़ाइनर बनने की है.
उनकी सोच बहुसांस्कृतिक समाज के निर्माण की है. उनके शिक्षक ने कहा कि मुस्लमान अगर केले का ठेला भी लगाए तो कोई बात नहीं. उसे पढ़ा लिखा होना.
बेशक 2002 की हिंसा में उनकी जाने गयीं, उनके घर जलाए गए, उनकी दुकानें लूटी गयीं. इसका असर ये हुआ कि वो सालों तक अपनी मुहल्लों में दबा और सहमा रहने लगा.
लेकिन गुजरात के मुसलमानों ने किसी से मदद नहीं मांगी. खुद पर तरस नहीं खाया. अब वो अपने पैरों पर खड़ा हो गए. उसका आत्मविश्वास वापस आया.
अब लड़कियों के शमा स्कूल का उदाहरण लीजिए. उनका यूनिफार्म इस्लामी, उनकी भाषा गुजराती और दिल हिंदुस्तानी.
गुजरात में मुस्लिम समाज ने पिछले 25 सालों में अपनी पहचान, अपनी रीती-रिवाज को क़ायम रखा है. उन्होंने अपना मज़हब नहीं खोया है.
अपनी नमाज़ नहीं खोई है. अपना गर्व नहीं खोया है. सियासत और मज़हब से अलग किए जाने पर मुसलमान मुंह फुलाकर बैठा नहीं है बल्कि एक बड़ी संख्या ने शिक्षा पर ज़ोर देना शुरू किया जिसके कारण आज पेशेवर मुसलमानों की खपत हो रही है.
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