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नज़रिया- तो मुसलमान नहीं 'जेंटलमैन मुसलमान' चाहिए बीजेपी को
- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी
वकीलों की दलीलों में एक अजीब सी मासूमियत छिपी होती है.
जब राम जेठमलानी, कपिल सिब्बल, पी चिदंबरम, अरुण जेटली या रविशंकर प्रसाद भरी अदालत में ज्ञानी न्यायमूर्तियों के सामने अपनी दलीलें पेश कर रहे होते हैं तो वो सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के पवित्र अवतार नज़र आते हैं.
चाहे ये वकील किसी बलात्कारी, अपराधी, काला बाज़ारिए, सट्टेबाज़, हत्यारे, देशद्रोही, जासूस, ठग या आतंकवादी का ही बचाव क्यों न कर रहे हों, दलीलें सुनने वाले को लगता है कि इनका मुवक़्क़िल ही अन्याय और ज़ुल्म का शिकार है.
उसके ख़िलाफ़ पूरी दुनिया साज़िश कर रही है और वो बेचारा निरीह प्राणी इन महँगे वकीलों की शरण में जाने को मजबूर हुआ है.
मुसलमान का वोट
रविशंकर प्रसाद चुनिंदा सफल वकीलों में गिने जाते हैं.
वो भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में वरिष्ठ मंत्री हैं और टीवी चैनलों में अपने तर्कों से विरोधियों को पानी पिलाने में माहिर हैं.
रविशंकर प्रसाद ने शुक्रवार को दिल्ली में एक सेमीनार के दौरान वकील-सुलभ मासूमियत से एक सवाल पूछा, "क्या आज तक हमने उद्योग और सेवाक्षेत्र में काम करने वाले किसी मुसलमान जेंटलमेन को परेशान किया है?"
उन्होंने आगे पूछा- "क्या हमने आज तक उन्हें निकाला है? मैं साफ़गोई से स्वीकार करता हूँ कि हमें मुसलमान का वोट नहीं मिलता पर हमने उन्हें महत्व दिया है या नहीं?"
उम्मीद के मुताबिक़ इत्तेहादुल मुसलमीन के असदुद्दीन ओवैसी ने इस पर कड़ा प्रतिवाद किया और कहा कि मुसलमानों को इज़्ज़त देने वाले ये "हम" यानी बीजेपी कौन होती है? मुसलमानों को संविधान ने अधिकार दिए हैं और उसी संविधान के तहत हमारे अधिकार सुरक्षित हैं.
'जेंटलमैन' मुसलमान
रविशंकर प्रसाद के इस बयान को थोड़ा और ग़ौर से पढ़ा जाना चाहिए.
उन्होंने ये दावा नहीं किया कि देश की सत्ता चला रही बीजेपी ने किसी 'मुसलमान' को परेशान नहीं किया, उनका सवाल है कि क्या कभी हमने किसी ऐसे "जेंटलमैन" (खाता-पीता, शरीफ़?) मुसलमान को परेशान किया है जो उद्योगपति हो या सेवा क्षेत्र में काम करता हो.
गुजरात से काँग्रेस सांसद रहे एहसान जाफ़री को 'जेंटलमैन' मुसलमान कहा जा सकता है जिन्हें 2002 में हुए मुस्लिम-विरोधी दंगों में मार डाला गया था.
उनकी विधवा ज़किया जाफ़री अब भी कहती हैं कि एहसान जाफ़री ने मारे जाने से पहले गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को बार बार फ़ोन करके मदद माँगी थी पर वो मदद कभी नहीं आई. पर अभी इस मुद्दे की बजाए रविशंकर प्रसाद के बयान की बात करते हैं.
उनके सवाल में दम है कि बीजेपी ने क्या कभी किसी जेंटलमेन मुसलमान को परेशान किया. एक सधे हुए वकील की तरह उन्होंने जिरह के दौरान वही तथ्य सामने रखे जो उनको माफ़िक आते हैं— सभी वकील यही करते हैं.
जुनूनी भीड़
पर सवाल यह है कि 'नॉन-जेंटलमैन' मुसलमानों पर भी क्या भारतीय जनता पार्टी उतनी ही मेहरबान रही है? कौन हैं ये मुसलमान जो 'जेंटलमैन' के दर्जे में नहीं आते और जिनका ज़िक्र रविशंकर प्रसाद की दलील में नहीं आता?
ये हैं गाँव के मेले-ठेले में गाय, भैंस, बैल की ख़रीद फ़रोख़्त करने वाले, दरवाज़े-दरवाज़े जाकर रूई धुनने वाले धुनिए, लोहार, सड़क किनारे बैठकर साइकिल का पंचर जोड़ने वाले, मोहल्ले में मीट की छोटी सी दुकान चलाकर अपना और अपने परिवार का पेट भरने वाले क़साई.
इनमें शामिल है दादरी का अख़लाक़ जिसे हिंदुओं की जुनूनी भीड़ ने घर में गोमांस रखने की अफ़वाह के आधार पर पीट पीट कर मार डाला.
इनमें शामिल है हरियाणा का पहलू ख़ान जिनके साथियों रिश्तेदारों ने पर्चा दर्ज कराया कि दिन दहाड़े जींस-टी शर्ट पहले 'गोरक्षक' उन पर टूट पड़े और मार मार कर अधमरा कर दिया. बाद में उसने अस्पताल में दम तोड़ दिया. अख़लाक़ और पहलू ख़ान 'जेंटलमैन' मुसलमान नहीं थे.
क़ानून का इस्तेमाल
इनमें शामिल हैं झारखंड के लातेहार ज़िले का मोहम्मद मज़लूम और बारह साल का इनायतुल्ला ख़ान, जो जानवरों की ख़रीद-फ़रोख़्त करके आजीविका चलाते थे और जिन्हें मार्च 2016 में कथित गोरक्षकों ने पहले पीटा और बाद में पास के पेड़ से फाँसी पर लटका दिया.
ये दोनों मुसलमान थे पर उद्योगों या सेवाक्षेत्र में काम करने वाले 'जेंटलमैन' नहीं.
केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद से ऐसे मुसलमानों की लिस्ट लगातार लंबी होती जा रही है जो सिर्फ़ मुसलमान होने की वजह से सरेआम पीटे जा रहे हैं, जिंदा मार दिए जा रहे हैं या फिर क़ानून का इस्तेमाल करके जिनकी रोज़ी रोटी छीन ली जा रही है.
क्या ये अचानक या अनायास हो रहा है? आख़िर 13 राज्यों में राज करने वाली बीजेपी के नेता रविशंकर प्रसाद को ये क्यों खुलेआम स्वीकार करना पड़ा कि भारतीय जनसंख्या का एक बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा यानी मुसलमान उन्हें वोट नहीं देता?
सवाल दूसरी तरह से पूछा जाना चाहिए: क्या बीजेपी को मुसलमानों के वोटों की ज़रूरत भी है जबकि वो उत्तर प्रदेश में 18 प्रतिशत मुसलमानों को राजनीति के हाशिए पर डालकर भी शान से सत्ता में आ सकती है?
बीजेपी का समर्थन
भारतीय जनता पार्टी और मुसलमानों के रिश्ते की गहरी पड़ताल ज़रूरी है. ये पड़ताल आधुनिक भारतीय गणतंत्र और उसके समन्वेषी संविधान की सुरक्षा के लिए भी ज़रूरी है.
लेकिन इसे समझने के लिए उन तमाम कसौटियों को किनारे रखना पड़ेगा जिन पर भारत की दूसरी राजनीतिक पार्टियों को कसा जाता है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी बाक़ी सभी पार्टियों - काँग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, वामपंथी पार्टियाँ आदि - सबसे अलग है.
ये भारत की एकमात्र बड़ी राष्ट्रीय पार्टी है जिसका अपना कोई छात्र संगठन या मज़दूर संगठन नहीं है. कुल मिलाकर भारतीय जनता युवा मोर्चा ही बीजेपी के नियंत्रण में है.
बीजेपी का समर्थन करने वाले बाक़ी सभी संगठन जैसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मज़दूर संघ, भारतीय किसान संघ, वनवासी कल्याण आश्रम, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, दुर्गा वाहिनी, स्वदेशी जागरण मंच और इनके अलावा शहर-शहर और क़स्बे-क़स्बे में खुली तमाम तरह की हिंदू सेनाएँ और हिंदू जागरण मंच सीधे सीधे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं.
आत्मरक्षा के नाम पर
संघ चुनाव नहीं लड़ता इसलिए उसे चुनावी राजनीति की मजबूरियों के हिसाब से अपना नैरेटिव तैयार नहीं करना पड़ता है.
संघ अपने सभी आनुषांगिक संगठनों को अपने फ़ैसले करने की स्वायत्तता देता है — बशर्ते ये फ़ैसले संघ के दूरगामी लक्ष्य यानी भारत को हिंदुओं का सशक्त राष्ट्र बनाने के रास्ते में रोड़े न अटकाएँ.
ये सभी संगठन अपने कार्यकर्ताओं को अपनी आत्मरक्षा के नाम पर उग्र और हिंसक कार्रवाइयों की ट्रेनिंग भी देते हैं.
इसी ट्रेनिंग के असर में अगर कुछ लोग अपने स्तर पर किसी बड़ी वारदात को अंजाम देते हैं तो संगठन सबसे पहले ख़ुद को किनारे कर लेता है और विवादित बयान या हिंसक कार्रवाई को व्यक्ति का निजी फ़ैसला बता दिया जाता है.
सियासी ध्रुवीकरण
मामला चाहे गाय भैंस की ख़रीद फ़रोख़्त करने वाले मुसलमानों को पीटने या उनकी हत्या करने का हो, गिरजाघरों पर हमला करना और उनमें आग लगाना हो, कश्मीरियों को उत्तर प्रदेश छोड़ने की धमकी देना हो — इन कार्रवाइयों की वजह से हिंदुओं और मुसलमानों का ध्रुवीकरण होता है जिसका सीधा चुनावी फ़ायदा बीजेपी को मिलता है.
जबकि तथ्य ये है कि उसके पास न अपना कोई छात्र संगठन है, न मज़दूर संगठन और न किसान संगठन. बीजेपी ख़ुद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तमाम आनुषांगिक संगठनों में से एक है.
संघ परिवार की ये एक ऐसी कार्यप्रणाली है जिससे हर सूरत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कभी सीधे ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.
जब आरएसएस के पूर्व सदस्य नाथूराम गोडसे ने 1948 में महात्मा गाँधी की हत्या की तब देश के गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने लिखा भी था कि आरएसएस ने देश भर में महात्मा गाँधी के ख़िलाफ़ ऐसा माहौल तैयार कर दिया था जिसके कारण गोडसे ने उनकी हत्या कर दी.
आज राष्ट्रवादी-देशद्रोही और गोभक्त-गोहंता का देशव्यापी विवाद भी एक ख़ास तरह का माहौल तैयार करने के लिए रचा जा रहा है.
ऐसा चतुर और कारगर मॉडल भारत की किसी और राजनीतिक पार्टी के पास नहीं है.
इसलिए बीजेपी के विजयरथ के पहियों की धड़धड़ाहट से घबरा कर एकजुट होने की कोशिश कर रही राजनीतिक पार्टियों के सामने चुनौती विकराल है. और फ़िलहाल उनके पास संघ परिवार की तरह न कोई विस्फोटक एजेंडा है और न कोई उचित ठहराने वाला कोई वकील.
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