You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
कांग्रेस की असल परीक्षा मोदी के मैदान में उतरने के बाद
- Author, शकील अख्तर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, अहमदाबाद से
गुजरात में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और वहां अब धुआंधार चुनावी रैलियों का समय है.
एक तरफ कांग्रेस के राहुल गांधी दो दिन के गुजरात दौरे पर हैं और प्रचार में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं तो दूसरी तरफ हैं भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह, जो राहुल गांधी से सवालों पर सवाल पूछ रहे हैं.
एक तरफ पाटीदार और पटेल हैं जो कांग्रेस के साथ हैं तो दूसरी तरफ हैं भाजपा सरकार के वादे. सोमवार से मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उतरेंगे और कई रैलियों को संबोधित करेंगे.
लेकिन इस बार गुजरात में चुनावी हवा एक तरफ को बहती नहीं दिखती. बीते दो दशक से गुजरात भाजपा का गढ़ रहा है, लेकिन इस बार कांग्रेस उसे कड़ी चुनौती देती दिख रही है.
मैदान में कड़ा मुकाबला बनता दिख रहा है
शुरुआती दौर से रफ्ता-रफ्ता चल रहे चुनाव प्रचार में सही मायनों में तेज़ी तो अब आई है. राहुल गांधी काफी पहले से इसमें सक्रिय हैं और लगातार रैलियां कर रहे हैं.
सोमवार को चुनाव प्रचार में मोदी उतरेंगे और वो लगातार 8 रैलियां करने वाले हैं जो इस बात का संकेत है कि चुनावी सरगर्मियां अब नज़र आने लगी हैं. अब भाषणों में एक दूसरे के ख़िलाफ़ आरोपों का दौर शुरू हो चुका है.
बीते बीस सालों में ये पहला ऐसा चुनाव है जिसमें ऐसा लग रहा है कि भाजपा के ख़िलाफ़ कोई पार्टी खड़ी है, वरना इससे पहले एकतरफा जैसी स्थिति होती थी. ज़मीन पर एक मुक़ाबले की स्थिति बनती नज़र आ रही है.
राज्य में मोदी जैसा नेता नहीं
इस बार कंग्रेस ना केवल जोश में है बल्कि उसके अंदर नया कॉन्फिडेंस भी दिखता है. इसकी एक वजह ये हो सकती है कि यहां पर कुछ समुदाय जो पारंपरिक तौर पर बीजेपी को वोट देते रहे हैं इस बार उनमें भाजपा से नाराज़गी है और ये समुदाय कांग्रेस के करीब आए है.
साथ ही ये पहला चुनाव है जब प्रधानमंत्री मोदी प्रदेश की राजनीति में अधिक सक्रिय नहीं हैं और वो केंद्र में प्रधानमंत्री के तौर पर अपनी भूमिका निभा रहे हैं.
मोदी एक मज़बूत नेता रहे हैं और उनके जाने के बाद गुजरात में अब उस लेवल के नेता नहीं हैं. जो नेता हैं वो उसी स्तर पर हैं जैसे कांग्रेस के नेता हैं. ये भी एक कारण है कि यहां पर चुनाव भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण लग रहा है.
गुजरात में 'बापू' कहे जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला प्रदेश में राज्यसभा चुनावों से ठीक पहले कांग्रेस से अलग हो गए. वो अपने राजनीतिक करियर में भाजपा और जनसंघ का भी हिस्सा रहे थे. उन्होंने भी चुनाव से पहले नई पार्टी बनाने की घोषणा की है.
लेकिन गुजरात में सीधा मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच रहा है. छोटी पार्टियां जैसे कि शिव सेना, एनसीपी, वाघेला का महत्व एक-दो सीटों के लिए तो हो सकता है लेकिन प्रदेश की राजनीति में उनकी भूमिका बड़ी नहीं है, इनका ना तो सकारात्मक और ना ही नकारात्मक प्रभाव दिखाई पड़ता है.
क्या दिखेगा आर्कबिशप की अपील का असर
गुजरात के गांधीनगर स्थित चर्च के आर्कबिशप ने अहमदाबाद के तमाम चर्चों को चिठ्ठी लिखी. उनका कहना है कि प्रार्थना सभा के जरिए लोगों को बताया जाए कि किसे वोट करना है.
उनका कहना है कि आए दिन अल्पसंख्यकों, पिछड़ी जातियों और दलितों पर हमले हो रहे हैं और ऐसे लोग ऐसी पार्टी को चुनें जो देश की धर्मनिरपेक्षता बनाए रखे.
गुजरात की राजनीति में अल्पसंख्क बीते काफी सालों से उपेक्षा का शिकार हुए हैं. यहां सबसे बड़े अल्पसंख्यक मुसलमान हैं, फिर ईसाई हैं. लेकिन यहां की राजनीति कुछ इस तरह की रही है कि उनकी भूमिका राजनीति से दरकिनार हो गई है.
मुझे नहीं लगता कि इन अपीलों का कोई असर पड़ेगा. ये अल्पसंख्यक पहले भी भाजपा के ख़िलाफ़ रहे हैं और कांग्रेस को वोट देते रहे हैं. इनका अधिकतर वोट पहले भी कांग्रेस को जाता रहा है और इसमें बहुत फर्क आएगा ऐसा नहीं लगता.
रैली बनाम रैली
राहुल गांधी की रैलियों में लोगों की भारी भीड़ देखने को मिल रही है. पहली बार ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस को यहां एक सपोर्ट मिल रहा है. उनकी रैलियों में अच्छी खासी तादाद में युवा दिखाई दे रहे हैं.
भाजपा की रैलियों में भी मुझे लोगों का हुजूम दिख रहा है. लेकिन सबसे ज़रूरी बात ये है कि मोदी अभी मैदान में उतरे नहीं है.
उनके लिए गुजरात उनके सम्मान की लड़ाई है, उनके गुजरात मॉडल की स्वीकृति की लड़ाई है. उन्होंने जो अपना राजनीतिक वर्चस्व बनाया है उसके लिए भी ये चुनाव एक चुनौती है.
गुजरात में चुनाव पर्यवेक्षकों का मानना है कि मोदी किस तरह से अपना कैम्पेन करते हैं उस पर काफी कुछ निर्भर करता है. कहा जा रहा है कि वो इतने बड़े पैमाने पर अपना कैम्पेन चलाएंगे कि उससे कांग्रेस और अन्य पार्टियों को नुकसान हो सकता है.
इस चुनाव के क्या नतीजे होंगे ये काफी कुछ मोदी के कैम्पेन पर निर्भर है.
(बीबीसी संवाददाता शकील अख्तर से मानसी दाश की बातचीत पर आधारित)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)