ब्लॉगः अगर विशाल-हुसैन टीवी देखते तो....

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- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
अगर कोई बहुत बड़ी या बुरी ख़बर नहीं है तो मुझे ताज़ा ख़बरें देने वाले टीवी चैनलों को देखना बिल्कुल पसंद नहीं है.
अलबत्ता जियोग्राफ़िक चैनल और अल जज़ीरा की दस्तावेज़ी फ़िल्में, कार्टून नेटवर्क और म्यूज़िक व डांस के रियलिटी शो ज़रूर देखता हूं.
पिछले दिनों सारेगामापा और लिटिल चैंप देख रहा था और आजकल डीआईडी यानी डांस इंडिया डांस देख रहा हूं.
शनिवार के डीआईडी में विशाल और हुसैन नाम के दो लड़कों का डांस देख कर और उनकी कहानी सुन कर ख़ासा भावुक ही हो गया.
विशाल और हुसैन एक अलग थलग पिछड़े हुए गांव से आए हुए हैं. ग़रीबी की वजह से बहुत ज़्यादा पढ़े लिखे भी नहीं पर उनमें नाचने और कुछ कर दिखाने का जुनून है.

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दोस्ती की मिसाल
दो साल पहले घर में खाना पकाते हुए स्टोव फट गया और विशाल गर्दन से लेकर टांगों तक बुरी तरह झुलस गया.
अस्पताल से आने के बाद जब उसने ख़ुद को आईने में देखा तो ख़ुद को पहचान नहीं पाया और सदमे में घर से बाहर निकलना छोड़ दिया.
लेकिन विशाल के दोस्त हुसैन ने उसका पीछा नहीं छोड़ा. उसने एक साल तक विशाल को घर से बाहर निकालने की जीतोड़ कोशिश की और वादा किया कि अगर वो उसे झुलसने से पहले वाला डांसर नहीं बना सका तो वो ख़ुद भी कभी डांस नहीं करेगा.
हुसैन ने समझा बुझा कर और वर्जिश-प्रैक्टिस करवा कर एक ही साल में उसे उसी पुराने विशाल में बदल दिया जोकि समसामयिक डांस कला के सबब पूरे गांव में हुसैन और विशाल की जोड़ी के नाम से मशहूर था.
शनिवार को मैंने देखा कि विशाल की गर्दन, सीने, बाजू और टांगों की खाल जगह जगह से जली हुई थी, लेकिन उसकी रूह किसी जले हुए शरीर को यूं नचा रही थी और पूरे स्टेज पर यहां से वहां तक ऐसी उड़ानें भरवा रही थी जैसे खाल के धब्बे न हों, बल्कि हौसले के पंख हों जो उसके दोस्त हुसैन ने उसके बाज़ुओं पर खुदा के हाथों लगवा दिए हों.
इस एपिसोड में हुसैन ने भी ऑडिशन दिया और दोनों यारों को जजों ने अगले पड़ाव के लिए चुन लिया. हुसैन ने कहा कि जब मैंने जलने के बाद इसके चेहरे पर डांस करते हुए पहली मुस्कान देखी तो जो ख़ुशी मिली उसे बयां नहीं किया जा सकता.

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टीवी और इंसानियत
विशाल और हुसैन की कहानी देख और सुन कर लाखों दूसरे दर्शकों की तरह ही मुझे जो ख़ुशी मिली वो उस पीड़ा से लाखों गुना ज़्यादा है, जिससे भारत और पाकिस्तान के शोरगुल से लिथड़े ताज़ा ख़बर दिखाने वाले टीवी चैनलों से करोड़ों दर्शक गुजरते हैं.
मैं विशाल और हुसैन के बारे में बस उतना ही जानता हूं जितना उन्होंने स्क्रीन पर बताया. लेकिन मैं दोनों की क़सम खा कर कह सकता हूं कि न तो विशाल के घर में टीवी है और न हुसैन के घर में.
वरना हमें इतनी ख़ूबसूरत और जीती जागती इंसानी कहानी शायद देखने को ना मिलती.
मेरी दुआ है कि एक दूसरे के लिए उनका जुनून ऐसे ही क़ायम रहे और वो ऐसे ही एक साथ नाचते रहें और कभी अख़बार और टीवी की शक्ल न देखें ताकि उनके चेहरे का सुकून और मुस्कान कोई आड़ा टेढ़ा न छीन सके.
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