चीफ़ जस्टिस के सामने प्रशांत भूषण को क्यों गुस्सा आया?

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सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने कहा है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा मेडिकल कॉलेज रिश्वत मामले को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं.
प्रशांत भूषण ने कहा कि यह देखना होगा कि उनके खिलाफ़ महाभियोग चलाया जाना चाहिए या इन-हाउस कार्यवाही होनी चाहिए, क्योंकि मामला बहुत गंभीर हो चुका है.
दरअसल, शुक्रवार को प्रशांत भूषण उस समय कोर्ट रूम से बाहर चले आए थे, जब मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पांच जजों की खंडपीठ मेडिकल कॉलेज रिश्वत मामले की जांच एसआईटी से करवाने की मांग कर रही याचिका की सुनवाई कर रही थी.

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प्रशांत भूषण के शब्दों में ही पढ़िए उनका पक्ष
सुप्रीम कोर्ट में चल रहे प्रसाद एजुकेशनल ट्रस्ट के एक मेडिकल कॉलेज के मामले में सीबीआई ने 19 सितंबर को एक एफ़आईआर दर्ज़ की थी.
सीबीआई को जानकारी मिली है कि जजों को रिश्वत देकर मामले को प्रभावित करने के लिए एक साज़िश रची गई है, जिसमें इस ट्रस्ट के कुछ लोग और दलाल शामिल हैं.
इनमें ओडिशा हाई कोर्ट के एक रिटायर्ड जज जस्टिस आई. एम. कुद्दूसी शामिल हैं, जो फ़ैसला अपने हक़ में करवाने के लिए पैसे इकट्ठे कर रहे हैं. इस मामले में छापा भी मारा गया और जस्टिस कुद्दूसी को गिरफ़्तार किया गया.
हमें लगा कि यह मामला संगीन है, जिसमें सरकार न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित कर सकती है, क्योंकि सीबीआई सरकारी एजेंसी है. चूंकि यह केस जस्टिस दीपक मिश्रा की अदालत में चला गया था और उन्होंने कई आदेश जारी किए थे.

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ऐसे में शंका पैदा होती है कि सीबीआई की जांच से सुप्रीम कोर्ट को प्रभावित किया जा सकता है. इसलिए हमने याचिका दायर की कि इस जांच को सीबीआई से हटाकर स्वतंत्र एसआईटी को सौंपा जाए, जिसकी निगरानी पूर्व मुख्य न्यायधीश करें.
बुधवार को हमने कहा कि जल्दी सुनवाई होनी चाहिए. चूंकि मुख्य न्यायाधीश संवैधानिक बेंच में थे और उनका इस मामले से सीधा-सीधा ताल्लुक था. इसलिए इसे जस्टिस चेलमेश्वर के यहां मेंशन किया.
उन्होंने आदेश दिया कि केस शुक्रवार को उन्हीं के यहां लिस्ट होना चाहिए. मगर दोपहर को हमें सूचना मिली कि चीफ़ जस्टिस ने आदेश दिया है कि इसे चेलमेश्वर के यहां नहीं, बल्कि दूसरी बेंच के यहां लिस्ट किया जाए.
अगले दिन यानी गुरुवार को ऐसी ही एक अन्य याचिका कामिनी जायसवाल ने दायर की. दुष्यंत दवे ने उसे जस्टिस चेलमेश्वर के यहां मेंशन किया, जिसे उन्होंने दोपहर बाद 12.45 पर अपने यहां लिस्ट करने का आदेश किया.
इतने में 12 बजे चीफ़ जस्टिस की संवैधानिक बेंच उठ गई और 12.45 पर इस याचिका पर सुनवाई शुरू हुई. ऐसे में रजिस्ट्री ने जल्दी से जस्टिस चेलमेश्वर को नोट भेजा कि चीफ़ जस्टिस का आदेश है कि जो भी मामला मेंशन हो, उसके लिए पहले चीफ़ जस्टिस से आदेश लिए जाएं.

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जस्टिस चेलमेश्वर ने उस दिन आदेश दे दिया कि मामला गंभीर है, इसलिए इसकी सुनवाई सोमवार को पांच वरिष्ठतम जजों की खंडपीठ में होनी चाहिए.
हमारा केस कोर्ट नंबर 6 में लगा. मैंने कहा कि ऐसे ही एक मामले को पहले ही पांच वरिष्ठतम जजों की बेंच में सोमवार को लगाने का आदेश हुआ है. मुझे लगा कि कोर्ट ने कहा है कि मामला इस केस के साथ कनेक्ट हो जाएगा.
मगर पौने 3 बजे मुझे रजिस्ट्री से फोन आया कि चीफ जस्टिस के आदेश पर 7 जजों की बेंच बैठ रही है, आप आ जाइए. मैं वहां गया तो 7 कुर्सियां लगी थीं, जिनमें से 2 हटा दी गईं. पांच जजों में चीफ़ जस्टिस के अलावा 4 जज और थे, जिनमें सीनियर कोई नहीं था. उन्होंने छांटकर बेंच बनाई थी.
सुनवाई शुरू हुई तो मैंने कहा कि मामला गंभीर है और इसमें चीफ़ जस्टिस की भी जांच होगी क्योंकि उनकी ही अदालत ने इस मेडिकल कॉलेज सारे केस सुने थे.
सीबीआई की एफ़आईआर में आरोप है कि उन्हीं को प्रभावित करने के लिए यह साजिश रची गई. इस वजह से उन्हें इस केस की सुनवाई खुद नहीं करनी चाहिए.

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मैंने उनसे कहा कि आपको इस केस से ख़ुद को अलग कर लेना चाहिए. तो उन्होंने कहा कि हमारे ख़िलाफ़ इसमें कुछ नहीं है, एफ़आईआर में किसी जज का नाम नहीं लिखा है.
इसके बाद वहां मौजूद वकील, जो केस में शामिल नहीं थे, उनसे पूछा जाने लगा कि आप बताओ इस मामले पर आपका क्या कहना है. तो वे वकील कहने लगे कि कामिनी जायसवाल वाली याचिका में यह कैसे मेंशन हो सकता था कि इसे पांच सीनियर जजों वाली बेंच में लगाया जाए.
मैंने कई बार अपनी बात कहने की कोशिश की मगर मुझे रोक दिया गया. दूसरे लोगों से ही बात करते रहे. लोग चिल्लाने लगे कि मैंने कंटेंप्ट किया है और मेरे ख़िलाफ़ एक्शन होना चाहिए. कोर्ट में मछली बाज़ार जैसे हालात बन गए.
मैंने कई बार कहने की कोशिश की मगर मुझे बोलने नहीं दिया गया. तो मैंने कहा कि ठीक है अगर आप सुनना नहीं चाहते तो मेरे यहां बैठने से कोई फ़ायदा नहीं है. इसके बाद मैं बाहर आ गया.
मेरे बाहर आने के बाद उन्होंने आदेश दिया है कि किस बेंच में कौन सा केस सुना जाएगा, इसका अधिकार चीफ़ जस्टिस को होता है, ऐसे में किसी भी जज को यह कहने का अधिकार नहीं है कि इस केस को कहां सुना जाएगा.

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अगर ऐसा कोई भी आदेश अगर किसी बेंच ने पास किया है तो चीफ़ जस्टिस उसकी अनदेखी कर सकता है. मगर इसपर उन्होंने कुछ नहीं कहा कि उन्हें केस सुनना चाहिए या नहीं, क्योंकि उनका इसमें सीधा हित जुड़ा है.
कामिनी जायसवाल का जो केस है, पहले उसे पांच सीनियर मोस्ट जजों की बेंच में चलाने का आदेश दिया गया था. मगर अब उसे सोमवार को तीन जूनियर जजों के सामने लगा दिया है.
ये जज कल उन्हीं (चीफ़ जस्टिस) वाली बेंच में बैठे थे. मेरे केस को उन्होंने दो हफ़्तों के बाद लगाने को कहा है. पहले कामिनी जायसवाल का केस सोमवार को लगेगा.
अब हम सोचकर तय करेंगे कि इसमें क्या करना चाहिए. लेकिन बहुत गंभीर स्थिति पैदा हो गई है. चीफ़ जस्टिस इस मामले में असाधारण रुचि दिखा रहे हैं.
उन्होंने उस दिन जस्टिस चेलमेश्वर को रजिस्ट्रार द्वारा जो नोट पास करवाया, वह भी बैक डेट का नोट है. इसी तरह से चीफ़ जस्टिस का इस केस को ख़ुद सुनना न्याय के बुनियादी सिद्धांत के ख़िलाफ़ है.
बताए जाने के बावजूद ऐसा करना मेरी राय में सही आचरण नहीं है. इस केस में उनका बेंच बदलना भी गंभीर मुद्दा है. हमें देखना होगा कि इस मामले में उनपर महाभियोग लगना चाहिए या इन हाउस प्रोसीडिंग्स चलनी चाहिए.

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अब तो मामला गंभीर हो गया है. जिस मामले में चीफ़ जस्टिस की भी जांच होनी है, उसे प्रभावित करने करने की कोशिश की गई.
इस पूरे मामले पर वरिष्ठ वक़ील सूरत सिंह की राय
प्रशांत भूषण को इतना ग़ुस्सा नहीं दिखना चाहिए था, क्योंकि यह क़ानूनी बात थी. इसमें मतभेद हो सकते हैं और जजों से अलग राय रख सकते हैं मगर मर्यादित ढंग से.
बेंच और बार का आपसी सम्मान और विश्वास का रिश्ता होना चाहिए चाहिए. ऐसी चीज़ें मर्यादित नहीं होतीं कि आप कोर्ट छोड़कर चले जाएं या यह कहें कि आप जो भी फ़ैसला कर लें. मुख्य न्यायाधीश क़ानून की स्थिति को ही स्पष्ट कर रहे थे.
अगर आपको पसंद नहीं आता है तो इसका मतलब यह नहीं कि आप अमर्यादित भाषा बोलकर कोर्ट से चले जाएं.
सुप्रीम कोर्ट में पूरे भारत के केस आते हैं और कोई भी आरोप लगा सकता है. अगर किसी के आरोप मात्र से मुख्य न्यायाधीश ख़ुद को अलग करने लगें, तो फिर अगर कोई चाहेगा कि किसी मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश न करें तो आरोप लगा देगा कि इसका तो इसमें हित है.
फिर तो ख़ुद को वो सभी मामलों से हटाते जाएंगे. ऐसे में मुख्य न्यायाधीश नहीं बल्कि आरोप लगाने वाले तय करेंगे, यह तो ठीक नहीं है न.
यह सोचकर कि मेरे अलावा सभी भ्रष्ट हैं, ऐसे में काम नहीं चलता. ठीक है, वह अच्छा काम कर रहे हैं और कई अच्छे मामले उन्होंने रखे हैं और सरकार और अन्य कमियां भी दिखाई हैं.
मगर इसका मतलब यह नहीं कि तीनों अंगों में सबसे ज्यादा विश्वास और सम्मान पाने वाली न्यायपालिका को अपमानित किया जाए.
(प्रशांत भूषण और सूरत सिंह से बीबीसी संवाददाता आदर्श राठौर की बातचीत पर आधारित)












