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कश्मीर: अलगाववादियों के बिना बात आगे बढ़े कैसे?
- Author, बशीर मंज़र
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
मोदी सरकार की ओर से कश्मीर के लिए नियुक्त वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा घाटी का दौरा करके लौट गए हैं.
अपनी तीन दिन की कश्मीर यात्रा के दौरान उन्होंने दर्जनों प्रतिनिधिमंडलों से मुलाक़ात की लेकिन अलगाववादी कैंप से कोई भी उनसे मिलने आगे नहीं आया और यहां तक कि मुख्यधारा के कुछ नेता भी उनसे थोड़ा बेदिली से ही मिले.
इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व चीफ़ दिनेश्वर शर्मा को भारत सरकार ने कश्मीर के लिए वार्ताकार मुकर्रर किया है और उन्हें जम्मू और कश्मीर के मुद्दों को सुलझाने में मदद के लिए 'किसी से और सभी से' बात करने की आज़ादी दी है.
शुरुआत से पहले ही ख़त्म हो गई वार्ता
हालांकि शर्मा की नियुक्ति के कुछ दिनों के बाद ही कश्मीर में अलगाववादी तिकड़ी, सैयद अली गिलानी, मीरवाइज़ उमर फ़ारूक और यासीन मलिक ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि वे वार्ताकार से मुलाकात नहीं करेंगे.
अलगाववादी नेताओं के इस निर्णय के बाद बातचीत की यह प्रक्रिया शुरुआत से पहले ही ख़त्म सी हो गई क्योंकि कश्मीर में संघर्ष का मुख्य कारण ही अलगाववादी राजनीति है.
बातचीत की इस प्रक्रिया को एक और झटका तब लगा जब मुख्य विपक्षी पार्टी नेशनल कॉन्फ़्रेंस (एनसी) ने भी संदेह व्यक्त किया और पार्टी अध्यक्ष डॉक्टर फारुख़ अब्दुल्ला ने इस प्रयोग को बेकार बताया.
बातचीत की प्रक्रिया को बड़ा झटका
सत्तारूढ़ पीडीपी के अलावा जम्मू और कश्मीर की मुख्यधारा की किसी भी राजनीतिक पार्टी ने शर्मा से मुलाक़ात नहीं की. इस वजह से उन्हें नेशनल कॉन्फ़्रेंस के उमर अब्दुल्ला, सीपीएम के मोहम्मद यूसुफ तारिगामी और राज्य कांग्रेस के जीए मीर का दरवाज़ा खटखटाने को विवश होना पड़ा.
हालांकि दिनेश्वर शर्मा ने यह साफ़ कर दिया कि वो जल्द ही एक बार और राज्य के दौरे पर जाएंगे और फिर अलगाववादी नेताओं से मिलने की कोशिश करेंगे. यह पूरी प्रक्रिया कश्मीर घाटी में लोगों को विभिन्न कारणों से उत्साहित करने में नाकाम रही.
जब केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने दिनेश्वर सिंह की वार्ताकार के रूप में नियुक्त की घोषणा की थो तो घाटी में इसे लेकर कुछ चर्चा शुरू हो गई थी लेकिन केंद्र की ओर से आए कड़े बयानों के बाद इनका तुरंत ही ख़ात्मा भी हो गया और इसी से बातचीत प्रक्रिया के विचार को बड़ा झटका लगा.
केंद्र सरकार परेशान
जब पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने वार्ताकार की नियुक्ति के बाद जम्मू और कश्मीर की स्वायत्तता को बहाल करने की बात कही, तो केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया उन लोगों के लिए चौंकाने वाली थी जिन्होंने इस नई पहल से उम्मीदें जताना शुरू कर दिया था.
यदि भारत सरकार संविधान के तहत दी गई 'स्वायत्तता' शब्द का उल्लेख करने मात्र से इतना परेशान हो जाती है तो कइयों ने ये सवाल उठाया कि ये अलगाववादियों से बातचीत करने के लिए आगे आने की उम्मीद कैसे कर सकती है जो मुख्य रूप से अलगाव के पक्ष में हैं.
मुख्यधारा की पार्टियां
विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही दिनेश्वर शर्मा सच्चे और नेकनीयत जान पड़ते हैं और साथ ही आबादी के बड़े वर्ग के साथ जुड़ने की क्षमता रखते हैं, लेकिन दिल्ली से सत्तारूढ़ बीजेपी नेताओं के आ रहे बयान उनके काम को इतना कठिन बना रहे हैं.
हालात कुछ ऐसे बन गए हैं कि यहां कि मुख्यधारा की पार्टियां भी वार्ताकार से जुड़ने से कतरा रही हैं. दिनेश्वर शर्मा कहते हैं कि उनका पहला लक्ष्य कश्मीर में शांति बहाल करना है, क्योंकि इससे ही उस अवस्था में पहुंचा जा सकता है जब राजनीतिक समाधान ढूंढने के लिए कदम उठाए जा सकें.
हालांकि, इस पर लोगों को आश्चर्य हो सकता है कि अगर अलगाववादी समूह ही इस प्रक्रिया में शामिल नहीं होंगे तो शांति कैसे बहाल हो सकती है.
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