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ब्लॉग: 'कश्मीर के बहाने वोट के लिए केंद्र सरकार की 'ब्लैक कॉमेडी'
- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
लो जी हम तो ख़ुश हो गए थे कि अब इंटेलिजेंस ब्यूरो के भूतपूर्व चीफ़ दिनेश्वर शर्मा को गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कश्मीर के लिए वार्ताकार मुकर्रर कर दिया है और उन्हें खुली छुट्टी है कि अलगावादी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस समेत जिससे चाहें बातचीत करें ताकि कश्मीर में शांति की कोई योजना बन सके और इसके बाद 70 वर्ष से चल रहे मसले का कोई हल निकल सके.
मगर सिर्फ़ एक हफ़्ते बाद ही मोदी जी ने ये कह के हमारी ख़ुशी हिरण कर दी कि कांग्रेसी रहनुमा और पिछले गृहमंत्री पी चिदंबरम ने ये कहकर आज़ादी पसंदों की हिमायत कर दी है कि कश्मीर में आज़ादी का नारा इसलिए लग रहा है कि क्योंकि लोग ज़्यादा ख़ुदमुख्तारी चाहते हैं.
बकौल मोदी जी चिदंबरम का ऐसा कहना भी हमारे सैनिकों की क़ुर्बानियों की तौहीन है.
इसका मतलब ये हुआ कि दिनेश्वर शर्मा कश्मीरी अलगाववादियों से इख़्तियारात के कम या ज़्यादा होने के मुद्दे पर नहीं दरअसल वादी में पोल्ट्री फ़ॉर्मिंग इंडस्ट्री के फैलाव, अखरोट का साइज़ और कश्मीरी शाल की सब्सिडी बढ़ाने, जंगलात की कटाई के मसले, कश्मीरी जेलों की मरम्मत ओ हालात की बेहतरी, लाल की बजाए नीले रंग के ज़ाफ़़रान की पैदावार और श्रीनगर में नए ट्रैफ़िक सिग्नल्स स्थापित करने की ज़रूरत जैसे अहम मुद्दों पर बात करेंगे ताकि कश्मीर के संकट का कोई बाइज्जत हल निकल सके.
मोदी जी आपने ही तो अभी 15 अगस्त को लाल क़िले पर चढ़के फ़रमाया था कि कश्मीर का हल गोली से नहीं कश्मीरियों को गले लगाने से निकलेगा.
क्या गले इसलिए लगाया जाता है कि सीनों में भरी नफ़रतें कम हों या गले इसलिए लगाया जाता है कि कान में कहा जाए 'अबे कश्मीरी के बच्चे अगर अब तूने संविधान के आर्टिकल 370 को ओरिजनल हालात में बहाल करने की मांग की तो यहीं सीना भींच के दम घोंट दूंगा.'
बातचीत किसी से भी हो तभी सफल हो सकती है जब सामने वाले को थोड़ी बहुत इज्ज़त मिलने का एहसास हो.
मगर जैसे ही दिनेश्वर शर्मा को वार्ताकार बनाने का एलान हुआ आप ही का मीडिया चढ़ दौड़ा. बीजेपी झुक गई. पाकिस्तानी दलालों से बातचीत का एलान इत्यादि इत्यादि.
बजाए इसके कि मोदी सरकार अपनी ताज़ा कोशिश को मीडिया के सामने डिफ़ेंड करती, उल्टा वो कांग्रेस पर बरस पड़ी. जैसे चिदंबरम ने कश्मीरियों को ज़्यादा इख़्तियारात देने का नहीं कश्मीर बनेगा पाकिस्तान का नारा लगा दिया हो.
ऐसे नाजुक मामले को कर्नाटक के इलेक्शन में वोट हासिल करने के लिए एक ब्लैक कॉमेडी के तौर पर उछालना ज़ाहिर करता है कि श्री दिनेश्वर शर्मा को कितनी संजीदगी के साथ कश्मीर के माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए रवाना किया जा रहा है और वो भी ऑक्सीज़न सिलेंडर्स के बिना.
कर्नाटक में भी अगर कश्मीर याद है तो अगली चुनाव रैली में कर्नाटक के ही एक सुपुत्र फ़तेह अली टीपू पर भी टिप्पणी हो जाए.
कहीं इसलिए न कुछ कहते कहते रुक जाइयेगा कि टीपू ने भी आज़ादी की मांग की थी. यक़ीन कीजिए वो कश्मीरी नहीं था. उसने अंग्रेजों से मांग की थी आपके हिंदुस्तान के लिए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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