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वुसत का ब्लॉग: पाक में गौरी लंकेश जैसी दर्जनों मिसालें!
- Author, वुसतुल्लाह खान
- पदनाम, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
उसका नाम था वली बाबर और वो पाकिस्तान के सबसे बड़े निजी टीवी चैनल जियो का रिपोर्टर था. वो अल्ताफ़ हुसैन की मुत्तहिदा क़ौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) की भी रिपोर्टिंग करता था.
अब से कोई चार साल पहले वली बाबर घर से दफ़्तर जा रहा था कि कराची के भीड़भाड़ भरे इलाके लियाक़ता बाग़ में दो मोटरसाइकिलों पर सवार चार लोगों ने उसे गोली का निशाना बना दिया और फ़रार हो गए. बाद में क़ातिल पकड़े गए और इनमें से दो एमक्यूमएम के दफ़्तर से पकड़े गए.
इनका मुक़दमा एंटी टेररिस्ट कोर्ट के हवाले कर दिया गया जिसने इन्हें मौत की सज़ा सुनाई. मगर इस बीच वली बाबर क़त्ल के तमाम चश्मदीद, गवाह एक के बाद एक करके मार डाले गए.
पत्रकार मारे जाते रहे हैं
वली बाबर का नाम मैंने इसलिए ले लिया कि पिछले 20 साल में पाकिस्तान में 70 के क़रीब पत्रकार और मीडिया से ताल्लुक रखने वाले लोग धार्मिक आतंकवादियों, राजनीतिक सशस्त्र दलों और गुप्तचर संस्थाओं के हाथों मारे जा चुके हैं.
मगर सिवाय वली बाबर के एक का भी हत्यारा क़ानून के हाथ नहीं आ सका इसीलिए जब गौरी लंकेश के क़त्ल की ख़बर हमने सीमापार सुनी तो मीडिया में किसी ने इस पर कोई ख़ास टिप्पणी नहीं की, न ही मीडिया बिरादरी को कोई आश्चर्यजनक झटका लगा. क्योंकि हमारे पास गौरी लंकेश जैसी दर्जनों मिसालें इधर-उधर बिखरी पड़ी हैं.
अब जांच की मांग नहीं होती
शुरू-शुरू में जब किसी पत्रकार के क़त्ल की सूचना बलूचिस्तान, ख़ैबर पख़्तूनख़्वा पंजाब या सिंध से मिलती थी तो मीडिया की संस्थाएं हम लोगों को काली पट्टियां बंधवाकर प्रेस क्लब के बाहर नारे भी लगवा देती थीं. कड़ी निंदा भी हो जाती थी. जांच की मांग भी हो जाती थी.
कई वारदातों की जांच भी हुई और जब जांच रिपोर्ट इस तरह की आने लगी कि हो न हो फ़लाने पत्रकार कि हत्या किसी हत्यारे ने की है तो अब हम लोग जांच की मांग भी नहीं करते.
आपके देश की सिविल सोसायटी में अभी थोड़ी बहुत जान है और जब कोई अख़लाक़ अहमद, कलबुर्गी या कोई गौरी लंकेश मारी जाती है तो कुछ न कुछ शोर उठता है. मगर अब वारदातें तो समय के साथ बढ़ती चली जाएंगी. आप कितना और कितनी देर तक चीखेंगे. हम पर तो ये आफ़त ज़ोर-ज़बरदस्ती से उतारी गई, आपने तो ख़ुद ख़रीदी है.
डूबते जहाज़ के मुसाफ़िरों जैसा शोर
कोई भी सिविल सोसायटी कितना भी शोर मचा ले वो विपक्षी दलों के समर्थन और आंदोलन के बग़ैर बहुत ज़्यादा असर नहीं डाल सकती. क्योंकि सामने वाले के शोर और फ़िर दब जाने या बिक जाने वाले मीडिया कि टीआरपी के सैलाब में सिविल सोसायटी की आवाज़ को डूबने से बचाने का काम सिर्फ़ एक मज़बूत विपक्ष ही कर सकता है.
और विपक्ष जैसे हमारे यहां बहुत अरसे पहले ख़ारिज हो चुका. आपके यहां भी विपक्षी दलों पर यहां से वहां तक क़ब्रिस्तान की ख़ामोशी छाई हुई है.
मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि आपके यहां ऐसी घटनाओं के विरोध में जो शोर उठ भी रहा है वो किसी डूबते जहाज़ के मुसाफ़िरों के शोर जैसा है. काश मेरा यह अंदाज़ा ग़लत निकले तो मुझसे ज़्यादा ख़ुश कोई और व्यक्ति न होगा.
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