You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
कश्मीर पर कितनी कारगर रहेगी मोदी सरकार की ये पहल?
- Author, डॉक्टर राधा कुमार
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
कश्मीर के मुद्दे पर नरेंद्र मोदी सरकार ने सभी संबंधित पक्षों से बातचीत करने के लिए खुफिया ब्यूरो के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा को नियुक्त किया है.
केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को इसकी घोषणा की.
राजनाथ सिंह ने कहा कि दिनेश्वर शर्मा जम्मू और कश्मीर के सभी संबंधित पक्षों से बातचीत के लिए केंद्र के प्रतिनिधि के तौर पर काम करेंगे.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ राजनाथ सिंह ने हुर्रियत से बातचीत के सवाल पर कहा कि दिनेश्वर शर्मा इसका फैसला करेंगे.
बीबीसी हिंदी के संवाददाता वात्सल्य राय ने इसी मसले पर डॉक्टर राधा कुमार से बातचीत की.
शिक्षाविद् राधा कुमार पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के दौर में बनाए गए तीन-सदस्यीय कश्मीर वार्ताकार दल की सदस्य थीं.
राधा कुमार का नज़रिया
ये कदम तीन साल पहले ही उठाया जाना चाहिए था. इन्होंने बहुत वक्त लगा दिया. फिर भी खुशी की बात है कि ये अब किया जा रहा है. ये घोषणा मेरे लिए तो खुशी की बात है.
पूर्व सरकार ने भी तीन लोगों की एक कमिटी बनाई थी. कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में सबसे ज्यादा जोर विश्वास बहाली पर दिया था.
लेकिन उस कमिटी की कई सिफारिशों पर सरकार ने अमल नहीं किया और इन सब के बीच एक और नई कमिटी बनाई गई है.
मैं मानती हूं कि उस वक्त यूपीए सरकार ने हमारी रिपोर्ट की सिफारिशों पर अमल नहीं किया.
हमने अपनी रिपोर्ट में पिछली कमिटियों की रिपोर्ट को समाहित करने की कोशिश की थी. खासकर राजनीतिक सिफारिशों पर कार्रवाई करना बहुत जरूरी था.
वाजपेयी के वक्त
लेकिन अब क्या कहा जा सकता है. जो गुजर गया सो गुजर गया. अब ये सोचना कि कितनी नाइंसाफी हुई है, कोई मायने नहीं रखता.
इसको अगर कुछ हद तक भी ठीक जा सके तो कुछ तो शुरुआत होगी. राजनीतिक स्तर पर बातचीत की जरूरत के मद्देनज़र एक नौकरशाह को वार्ता के लिए भेजा जा रहा है.
मैंने तो शुरू से ये माना है कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के साथ उच्च स्तरीय राजनीतिक वार्ता होनी चाहिए. वाजपेयी जी के वक्त ये हो चुका है.
मनमोहन सिंह के दौर में भी बातचीत की कोशिशें हुईं. ये बहुत जरूरी है कि जब उच्च स्तरीय राजनीतिक वार्ता चल रही हो तो और लोगों को भी वार्ता में शामिल किया जाना चाहिए.
शांति प्रक्रिया
ऐसे लोगों की जरूरत है जो रोज काम कर सकें. प्रधानमंत्री अपने सारे काम छोड़कर केवल एक ही मुद्दे पर तो अकेले काम नहीं कर सकते.
इसलिए ऐसे लोगों को शामिल करने की जरूरत है जिन्हें इस बात का अनुभव है कि शांति प्रक्रिया को कामयाबी से कैसे अंजाम दिया जा सकता है.
वो रोजाना आधार पर बातचीत की गाड़ी आगे बढ़ाते रहें. जब कोई बड़ी बात बन जाए तो उस वक्त राजनीतिक नेतृत्व को आगे आना चाहिए.
कश्मीर की फिलहाल जो जमीनी स्थिति है, उसके मद्देनजर सरकार के इस फैसले को एक शुरुआत कहा जा सकता है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)