विश्व बैंक ने भारत की रैंकिंग सुधारी, लेकिन कारोबारी परेशान क्यों?

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कारोबार करने की सहूलियत के मामले में भारत की रैंकिंग में सुधार हुआ है. विश्व बैंक की ओर से जारी पिछले साल की 130वां रैंकिंग के मुकाबले इस साल भारत की रैंकिंग 100 पर पहुंच गई है.
विश्व बैंक ने इस साल के आकलन में भारत को कारोबार करने के माहौल में सुधार करने वाले शीर्ष 10 देशों में रखा है.
यह आकलन 10 संकेतकों के आधार पर किया गया है और रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने इन 10 संकेतकों में से 8 में सुधार किए हैं.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस साल भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जिसने इतना महत्वपूर्ण बदलाव दिखाया है. भारत ने साल 2003 से अभी तक 37 सुधार किए हैं. इनमें से क़रीब आधे सुधार पिछले चार सालों में किए गए हैं.
इस रिपोर्ट में 190 देशों में 2 जून, 2016 से लेकर 1 जून, 2017 की अवधि में किए गए सुधार शामिल किए गए हैं.
यह अध्ययन सिर्फ़ दिल्ली और मुंबई में किया गया है. इन शहरों में कारोबार शुरू करना, कंस्ट्रक्शन परमिट लेना, ऋण उपलब्धता, अल्संख्यक निवेशकों की सुरक्षा, टैक्स का भुगतान, सीमा पार कारोबार, अनुबंध लागू करना और दिवालियेपन के समाधान जैसे संकेतकों में सुधार हुआ है.

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रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने अल्पसंख्यक निवेशकों की सुरक्षा, ऋण और बिजली की उपलब्धता के क्षेत्र में अच्छा प्रदशर्न किया है. भारत अल्पसंख्यक निवेश की सुरक्षा में वैश्विक रैंकिंग में चौथे स्थान पर पहुंच गया है.
साथ ही भारत में बिजली कनेक्शन मिलने का समय चार साल पहले के 138 दिनों से घटकर 45 दिन रह गया है.
वित्त मंत्री ने सरकार की नीतियों को दिया श्रेय
वहीं, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी विश्व बैंक की रिपोर्ट की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि विश्व बैंक ने भारत को ढांचागत सुधार करने वाला देश माना है.
उन्होंने कहा, "दिवालियेपन के मामले में हम 136 रैंक के बाद सीधे 33 अंक ऊपर जाकर 103 पर पहुंच गए हैं. कर भुगतान में हम 119 से 53 पर पहुंच गए हैं. भारत सरकार लगातार कुछ मसलों पर सुधार की दिशा में काम कर रही है."

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वित्त मंत्री ने कहा, "भारत सरकार अलग-अलग मंचों से देश में निवेश का न्यौता देती रही है. साथ ही स्टार्ट अप इंडिया जैसे योजनाओं के ज़रिए देश में नए कारोबार को बढ़ावा देने की कोशिश भी की गई है."
आर्थिक विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
विश्व बैंक की रिपोर्ट तमाम मोर्चों पर सरकार को कितना सफल बताती है और इस रिपोर्ट के क्या मायने हैं, इस पर बीबीसी संवाददाता पंकज प्रियदर्शी ने आर्थिक विशेषज्ञ भरत झुनझुनवाला से बातचीत की. पढ़िए उनकी राय उन्हीं के शब्दों में: -
इस रिपोर्ट की कई बातें सही हैं. करोबार को बढ़ावा देने के लिए पैन और टैक्स नंबर को आपस में इंटीग्रेट करना अच्छा है. इसी तरह कंस्ट्रक्शन परमिट को आसान किया गया है.
सरकार ने निश्चित रूप से सुधार किए हैं. विश्व बैंक का अध्ययन सही है, लेकिन मेरे हिसाब से रैंकिंग में सुधार के साथ-साथ तीन-चार जगह रैंकिंग घटी भी है. बिजली में रैंक 26 से 29 हो गया. इसी तरह सीमा पार व्यापार में रैंकिंग 143 से 146 हो गई है और कारोबार शुरू करने में 155 से 156 हो गई है.

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मेरे हिसाब से इनमें जो सबसे प्रमुख है, वह है 'एंफ़ोर्सिंग कॉन्ट्रैक्ट' जो अपने देश में बिज़नेस के लिए सबसे बड़ी समस्या है.
आज अगर कोई कारोबार के लिए अनुबंध करता है और दूसरा व्यक्ति उससे मुकर जाता है या धोखा देता है तो हम उसे नियंत्रित नहीं कर पाते. इस मामले में मामूली सुधार हुआ है.
190 देशों में हम 172वें नंबर पर थे और अब सुधरकर 164 पर आए हैं. मुझे लगता है कि यह एक प्राथमिक समस्या है.
सिर्फ़ बड़े शहरों की बात
रिपोर्ट में एक और समस्या यह है कि इन्होंने सिर्फ दिल्ली और मुंबई में अध्ययन किया है. इन शहरों में बड़े कारोबार हैं. मुख्य सवाल यह है कि क्या देश के छोटे कारोबारियों के लिए कारोबार करना आसान हो गया है?
इसमें लोगों से बातचीत के आधार पर मेरा अनुभव कहता है कि आम आदमी और छोटे बिज़नेस करने वालों के लिए सुधार नहीं हुआ है.

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वहीं, बड़े कारोबार में भी मौलिक मुद्दों पर सुधार नहीं हुआ है.
अब अगर विदेशी निवेशकों की बात करें तो वह पहले भी कारोबार के लिए रास्ता निकाल लेते थे. जब भारत की रैंकिंग ख़राब थी, तब भी निवेश आता रहा है.
एफ़डीआई में गिरावट
इसके अलावा पिछले साल क़रीब सात महीनों में जो एफडीआई (विदेशी निवेश) आया, वो 26 बिलियन डॉलर था. लेकिन उसके बाद 22 बिलियन डॉलर ही आया. यानी एफ़डीआई भी आना कम हो रहा है.
सवाल यह है कि अगर रैंकिंग सुधर रही है तो एफ़डीआई कम क्यों आ रही है?
दरअसल, मौलिक मुद्दा ये है कि देश के बाज़ार में मांग है कि नहीं. लेकिन, नीतिगत स्तर पर मांग पैदा करने का कोई उपाय नहीं हुआ है.
मुझे नहीं लगता कि छोटे शहरों में कारोबार करने वालों को कोई आसानी आई होगी क्योंकि रिज़र्व बैंक के डेटा के अनुसार छोटे बिज़नेस को दिए जाने वाले ऋण में गिरावट आ रही है. अगर उनके लिए सुधार हो रहा होता तो उनका ऋण बढ़ता.
विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि अल्पसंख्यक निवेशकों की सुरक्षा में सुधार हुआ है. लेकिन इसका छोटे कारोबार से क्या लेना-देना है? उनके लिए तो अनुबंध का लागू होना सबसे ज़रूरी है.
इस मामले में पहले हमें अनुबंध लागू करवाने में 1420 दिन लगते थे जो अब बढ़कर 1445 हो गए हैं. यानी हम पिछड़ते जा रहे हैं.

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भ्रष्टाचार का ज़िक्र नहीं
इसी तरह एक और बड़ी समस्या है भ्रष्टाचार. इस रिपोर्ट में भ्रष्टाचार का ज़िक्र नहीं है. एक नया कारोबार शुरू करने के लिए कितनी घूस देनी पड़ती है.
सरकार इस रिपोर्ट पर अपनी पीठ थपथपा सकती है, लेकिन इससे ज़मीनी सुधार नहीं हुआ है. मैं दावे से कह सकता हूं कि अब भी निवेश में बढ़ोतरी नहीं होगी, क्योंकि देश में मांग ही नहीं है.
कोई भी निवेश बिना मांग के नहीं आता है. सरकार ने जीएसटी और नोटबंदी से देश की आय को बाहर भेजना चालू कर दिया क्योंकि इसके बाद सोने की ख़रीद दोगुनी हो गई है. अब धन बाहर जा रहा है तो यहां मांग कैसे बढ़ेगी?
हालांकि, फिर भी सुधार के मामले में मोदी सरकार की स्थिति बेहतर है. लेकिन इस रिपोर्ट को मैं विशेष उपलब्धि नहीं मानता हूं.












