आरती करती मुसलमान महिला के ख़िलाफ़ फ़तवे की क्या है हक़ीक़त?

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- Author, सरोज सिंह/सिंधुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले दिनों वाराणसी की एक तस्वीर सामने आई, जिसमें कुछ मुस्लिम महिलाएं आरती करती दिख रही थीं.
दिवाली के मौके पर ली गई यह तस्वीर सुर्खियों में छाई रही. अब आरती करने वाली महिला नाज़नीन अंसारी का दावा है कि उनके ख़िलाफ़ फ़तवा जारी किया गया है.
उनका कहना है कि उन्हें धमकियां मिल रही हैं और मुस्लिम समाज से निकाले जाने की बात कही जा रही है. नाज़नीन का दावा है कि उनकी फ़ेसबुक पोस्ट पर लोग भद्दे कमेंट्स कर रहे हैं और कह रहे हैं कि वो इस्लाम के नाम पर कलंक है.

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कैसे हुई आरती की शुरुआत?
30 साल की नाज़नीन मुस्लिम महिला फ़ाउंडेशन (एमएमएफ़) की संस्थापक और अध्यक्ष हैं. इस आरती का आयोजन एमएमएफ़ और विशाल भारत संस्थान ने मिलकर किया था.
बीबीसी ने नाज़नीन से बात की और पूछा कि उन्होंने इस तरह आरती में शामिल होने का फ़ैसला क्यों किया?
जवाब में नाज़नीन ने बताया,''हमने ये पहली बार नहीं किया है. हम पिछले 11 साल से आरती करते आ रहे हैं. संकटमोचन मंदिर में ब्लास्ट के बाद हमने महसूस किया कि शहर का माहौल बिगड़ रहा है और इसे रोका जाना चाहिए. तब हम 70 मुसलमान औरतों ने संकटमोचन मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का पाठ किया था.''
नाज़नीन ने बताया कि जब पहली बार हमने आरती की थी तब भी हमारे ख़िलाफ़ फ़तवा आया था, लेकिन हमने इसे जारी रखा.

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उन्होंने बताया कि उस वक़्त शहर के मुफ़्ती ने उनके साथ मंदिर में जाकर चरणामृत लिया और इस तरह फ़तवे का वज़ूद खत्म हो गया.''
नाज़नीन का कहना है कि तब से वो हर दीपावली और रामनवमी पर आरती में शामिल होती हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया,''हमें फ़ेसबुक पर हज़ारों धमकियां मिल रही हैं. लोग हमें घर आकर धमका रहे हैं. कोई जान से मारने की धमकी दे रहा है तो कोई बम से हमारा घर उड़ाने की.''
हालांकि बीबीसी ने जब उनके फ़ेसबुक पोस्ट की पड़ताल की तो जान से मारने की धमकी वाला कोई कमेंट नहीं दिखा. लेकिन उनकी आरती करती हुई फ़ोटो पर बहुत से आपत्तिजनक कमेंट्स हैं जिसमें उन्हें मुसलमान के नाम पर कलंक बताया गया है.
क्या कहता है दारुल उलूम देवबंद?
फ़तवे के बारे में बीबीसी ने जब दारुल उलूम देवबंद के प्रवक़्ता अशरफ़ उस्मानी से बात की तो उन्होंने कहा कि नाज़नीन के खिलाफ़ फ़तवा ज़ारी ही नहीं हुआ है. उनका दावा है कि नाज़नीन के नाम से कोई फ़तवा कहीं भी ज़ारी ही नहीं हुआ है.

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अशरफ़ ने कहा,''फ़तवा हमेशा सिर्फ़ लिखित में होता है, मौखिक रूप में नहीं. फ़तवा सिर्फ़ एक मौलवी ज़ारी नहीं कर सकता, इसके लिए एक पैनल होता है और कम से कम चार-पांच लोग इस पर दस्तख़त करते हैं.
उन्होंने कहा, ''हमें इस बात का बहुत दुख है कि हमारे ख़िलाफ़ इस तरह की बातें हो रही हैं. ये बातें इस्लाम के दुश्मनों द्वारा फैलाई जा रही हैं.''
इस सवाल पर कि क्या नाज़नीन सुर्खियों में आने के लिए ऐसा कर रही हैं? उन्होंने कहा,''मैं उसे दोष नहीं दे सकता. उस बेचारी को तो असलियत मालूम ही नहीं है. उसे मीडिया और बाकी लोगों से जो पता चला, वो उसी पर भरोसा कर रही है.''

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नाज़नीन को यह फ़तवा मिला कैसे? इस सवाल के जवाब में वो कहती हैं, ''मुझ तक कोई फ़तवा नहीं पहुंचा. मुझे अख़बारों और टीवी से ही इस बारे में पता चला.''
नाज़नीन का मानना है कि उन्होंने आरती करके हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल पेश की है. उन्होंने कहा,''जैसे हिंदू मज़ारों पर जाते हैं, इफ़्तार पार्टी में शरीक होते हैं वैसे ही हमने भी आरती की.''
उन्होंने कहा कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हर साल चिट्ठी और राखियां भी भेजती हैं.
नाज़नीन ने 21 अक्टूबर को अपने फ़ेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट करके अपनी प्रतिक्रिया भी जारी की है.

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अपने फेसबुक संदेश में नाज़नीन पूछती हैं, ''ये मौलाना तब कहां रहते हैं जब कोई मुसलमान शराब पीकर अपनी बीवी को पीटता है और तीन बार तलाक कहके उसे ठोकरें खाने के लिए छोड़ देता है? मेरा इस्लाम इतना कमज़ोर नहीं है कि आरती करने से ये खत्म हो जाए.''
हालांकि नाज़नीन के पक्ष में अब वाराणसी के दूसरे संस्थान भी सामने आने लगे है. विशाल भारत संस्थान के प्रमुख राजीव श्रीवास्तव का मानना है कि आजकल फ़तवा उन्माद फ़ैलाने का एक तरीका बन चुका है और कुछ नहीं.
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