शराबी बाप के ख़िलाफ़ बेटियों का 'हल्ला बोल'

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, भुसुर (रांची) से, बीबीसी हिंदी के लिए
सीमा ने अब घर की दहलीज़ पार कर ली है. वे रांची के भुसुर गांव में शराब के ख़िलाफ़ अभियान चला रही 30 लड़कियों में से एक हैं. छह भाई-बहनों में तीसरे नंबर की सीमा का बचपन माता-पिता की लड़ाई देखते हुए बीता.
वो बताती हैं कि उनके पिता सुबह-सवेरे ही शराब पी लेते, फिर पूरे दिन मां से लड़ाई करते. इग्नू से एमए कर रही सीमा पर घर के इस माहौल का गहरा असर पड़ा.
गांव की दूसरी लड़कियां भी अपने घरों में इन्हीं परेशानियों से गुज़र रही थीं. इससे परेशान लड़कियों ने मीटिंग कर शराब के ख़िलाफ़ अभियान चलाने का निर्णय लिया.
भुसुर की इन लड़कियों का 'सखी-सहेली' नामक ग्रुप अपने घर-गांव के लोगों से शराब नहीं पीने की अपील कर रहा है.
गांव के लोगों पर दबाव
नामकुम प्रखंड की लालखटंगा पंचायत के भुसुर गांव के इस अभियान की चर्चा राजधानी रांची में भी हो रही है. इस कारण गांव के लोगों पर दबाव है.
सीमा ने बीबीसी से कहा, "जब पापा शराब पीकर आते हैं, तो खराब लगता है. हम लोगों ने सोचा कि अगर शराब बंद हो जाए, तो परिवार और गांव की स्थिति सुधरेगी.''
वे कहती हैं, ''तब यह ग्रुप बनाकर हम लोगों ने घर-घर जाकर लोगों से शराब नहीं पीने की अपील की. शुरू में तो हमें बहुत परेशानी हुई. लोगों ने कहा कि हड़िया (देसी शराब) बेचने से दो पैसे की आमदनी होती है. हड़िया पीना आदिवासियों की परंपरा में भी शामिल है.''
सीमा कहती हैं, ''तब हम लोगों ने लालखटंगा के मुखिया रितेश उरांव से मदद ली. गांव के अखड़ा में ग्रामसभा की बैठक में भी यह मामला उठाया गया. लेकिन, अब लोग इस बात को समझने लगे हैं."

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शराब पीना परंपरा
करीब 500 लोगों की आबादी वाले भुसुर गांव में सभी घर आदिवासियों के हैं. हड़िया इनकी अपनी शराब है, जो चावल और जड़ी-बूटी के मिश्रण से बनाई जाती है. पर्व-त्यौहार और जन्म-मरण के वक्त भी हड़िया के सेवन की पुरानी परंपरा है.
ऐसे में शराब के ख़िलाफ़ अभियान चलाना आसान नहीं था. इस अभियान की रूपरेखा तैयार करने वाली शुभा तिर्की कहती हैं कि उनके अभियान को पुरुषों से अधिक महिलाओं का समर्थन मिल रहा है.
बीबीसी से बातचीत में शुभा तिर्की ने कहा, "हमारी टीम में शामिल लड़कियों ने सबसे पहले अपने घरों में लोगों को जागरुक करना शुरू किया. आदिवासी समुदाय में लड़के-लड़कियों में ज़्यादा भेदभाव नहीं है. इस कारण हमारी बात सुनी गई.''
वे कहती हैं, ''हम लोगों ने बताया कि दूसरी कम्यूनिटी के लोग अपने बच्चों का करियर प्लान करते हैं लेकिन आदिवासी लोग शराब के नशे में रहकर इन बातों पर नहीं सोचते. हम लोग इस बात पर भी बहस कर रहे हैं कि आदिवासियों की पंरपरा क्या है. क्या परंपरा की आड़ में शराब पीना जायज़ है."

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सकारात्मक प्रभाव
महिला उत्पीड़न के मुद्दों को लेकर सक्रिय संस्था 'आशा' के अजय कुमार, भुसुर की लड़कियों के इस अभियान की प्रशंसा करते हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "मुझे भरोसा था कि इसका सकारात्मक असर पड़ेगा. पिछले डेढ़ महीने से चल रहे इस अभियान के कारण लोगों ने शराब पीना कम किया है.''
अजय कुमार कहते हैं, ''वे सार्वजनिक जगहों पर पीने से बच रहे हैं. इसके सफल होने की सबसे बड़ी वजह इसका अहिंसक होना है. आम तौर पर शराब बंद कराने के लिए लोग हड़िया बनाने की जगह को तोड़ देते हैं. कई दफ़ा मारपीट तक हो जाती है. लेकिन इन लड़कियों ने लोगों को समझाकर अपना अभियान चलाया है. इसका सकारात्मक असर पड़ रहा है.''

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उम्मीद कायम है
मैंने अपना पूरा दिन इन लड़कियों के साथ गुजारा. इस दौरान मेरी मुलाकात खुशबू, सुनैना कुमारी, रश्मि टोप्पो, मनीषा टोप्पो, शीला नाग, शिल्पी तिर्की समेत कई लड़कियों से हुई.
इन्हें विश्वास है कि जल्दी ही उनके गांव के लोग शराब पीना पूरी तरह बंद कर देंगे और इनके घरों का माहौल ठीक हो जाएगा.
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