दिल्ली में रोहिंग्या मुसलमान क्यों कर रहे हैं धर्म परिवर्तन?

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- Author, अभिमन्यु कुमार साहा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
म्यांमार से भागकर भारत पहुंचे मोहम्मद सुल्तान अब जॉन सुल्तान बन गए हैं. पांच साल पहले वो अपने परिवार के साथ दिल्ली आए थे.
दिल्ली के उत्तम नगर की रोहिंग्या बस्ती में रहने वाले जॉन सुल्तान अब ख़ुद को ईसाई मानते हैं और यीशु के संदेशों का प्रचार दोस्तों और फ़ेसबुक मित्रों के बीच करते हैं.
सिर्फ़ जॉन सुल्तान ही नहीं, उनकी बस्ती में रहने वाले करीब 120 लोग ईसाई धर्म का पालन कर रहे हैं. बस्ती में बकायदा चर्च भी है जहां लोग यीशु की प्रार्थना करते हैं.
भारत आने के बाद समुदाय में जो भी बच्चे पैदा हुए हैं, उनके नाम ईसाइयों वाले रखे गए हैं.

नमाज़ नहीं पढ़ते...
बस्ती में रहने वाले कबीर के तीन बच्चे हैं. रूबीना, फारमीन और सैमुएल. रूबीना (13) और फारमीन (7) का जन्म म्यांमार में हुआ था और सैमुएल का जन्म सात महीने पहले भारत में हुआ.
यहां रहने वाले हकीम नाम के एक शख़्स ने बताया कि भारत आने के बाद उनको एक बेटा हुआ, जिनका नाम उन्होंने पीटर रखा है.
यह नाम क्यों रखा, इस सवाल पर हकीम ने बीबीसी को बताया, "यह नाम इसलिए रखा क्योंकि बाइबल में इसका जिक्र है. हमलोग नमाज बिलकुल नहीं पढ़ते हैं. हमलोग दुआ मांगते हैं, ईसा मसीह से प्रार्थना करते हैं."
इनकी बस्ती के ठीक सामने चर्च भी है. लेकिन ये लोग वहां नहीं जाते हैं. बस्ती के अंदर बनाए गए चर्च में ही प्रार्थना करते हैं.

'झुग्गी' वाला चर्च'
जॉन सुल्तान ने बताया कि सामने वाले चर्च में उनलोगों के प्रवेश पर पाबंदी है.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "हमलोगों का बस्ती के अंदर ही 'झुग्गी' वाला चर्च है. हमलोग सामने वाले चर्च में नहीं जाते हैं. वो चर्च कैथेलिक ईसाइयों का है और हमलोग प्रोटेस्टेंट हैं. हमलोग यीशु को मानते हैं और वे लोग मदर को मानते हैं."
बस्ती में रहने वाले एक और शख़्स करीम ने बताया कि वे लोग हर रविवार को इस 'झुग्गी' वाले चर्च में सामूहिक रूप से प्रार्थना करते हैं.
जॉन फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं और लिखते हैं. अपने फ़ेसबुक प्रोफाइल पर वो अंग्रेजी में ही स्टेटस डालते हैं. ज़्यादातर उनके फ़ेसबुक पोस्ट रोहिंग्या पर हो रहे हमले और ईसाई धर्म के प्रचार से जुड़े होते हैं.

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संगठन पहुंचा रहे मदद
जॉन सुल्तान ने धर्म परिवर्तन से संबंधित एक वीडियो भी पोस्ट किया है, जिसमें एक हिंदू के ईसाई बनने की कहानी है. वो बाइबिल के उपदेश भी पोस्ट करते हैं.
उन्होंने एक फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा है, "बहुत लोग यीशु-यीशु करते हैं पर उन्हें अपने हृदय में जगह नहीं देते हैं. अगर आप उन्हें दिल में बसाते हैं तो आपको एक नया जीवन मिलेगा."
बस्ती में रहने वाले शरणार्थियों को कई धार्मिक संगठन मदद पहुंचा रहे हैं. जॉन सुल्तान ऐसे ही एक संगठन से जुड़े हैं.
वो वहां शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं. उन्होंने ओपन स्कूलिंग से दसवीं की परीक्षा भी दी है. जॉन पढ़ाई के साथ-साथ फुटबॉल भी खेलते हैं.

रोहिंग्या की बस्ती
लंबी-चौड़ी जमीन पर बसी रोहिंग्या की बस्ती चारों तरफ से दीवार से घिरी है. ज़मीन के लिए वे सालाना लाखों रुपए किराए के रूप में चुकाते हैं.
हकीम ने बताया, "हमलोग यहां देढ़ साल से रह रहे हैं. यह ज़मीन किराए पर लिया गया है. पहले साल का किराया दो लाख रुपए देना पड़ा. दूसरे साल किराया 20 हज़ार रुपए बढ़ा दिया गया. अब दो लाख 20 हजार रुपए देते हैं."
ज़मीन का किराया वहां रहने वाले सभी परिवार संयुक्त रूप से चुकाते हैं. जिस परिवार में जितने सदस्य होते हैं, उन्हें उतना ज़्यादा किराया देना पड़ता है.
हकीम बताते हैं, "किराया परिवार से सदस्यों के हिसाब से लगता है. महिला, पुरुष के साथ बच्चों को भी जोड़ा जाता है. इस तरह एक व्यक्ति पर एक साल का किराया दो हजार रुपए आता है."

सुरक्षा
पूरी बस्ती सीसीटीवी कैमरे से लैस है. यहां मेन गेट पर वॉच टावर लगे हैं, जिससे निगरानी की जाती है. बस्ती में अनजान के प्रवेश पर पाबंदी है.
यहां रहने वाली महिलाएं आपस में बर्मी भाषा में बात करती हैं और बाहरी दुनिया के कटी हैं. वहीं, मर्द बाहर कमाने तो जाते हैं, पर वो स्थानीय लोगों से बहुत घुलते-मिलते नहीं हैं.
बस्ती में धूमधाम से क्रिसमस मनाया जाता है. यहां रहने वाले युवा आने वाले क्रिसमस की तैयारियों की योजना बना रहे हैं.
जॉन सुल्तान ने बताया, "हमलोग हर साल क्रिसमस मनाते हैं, जिसमें सभी भाग लेते हैं. बच्चे भी इस दिन खूब मस्ती करते हैं. बस्ती में पार्टी का आयोजन किया जाता है."
मजदूरी कर छह लोगों का परिवार चलाने वाले हकीम कहते हैं, "अब हमलोग मुसलमान नहीं हैं. ईसाई धर्म अच्छा है इसलिए अब इसका पालन करते हैं."
'पहले ख़ुद को मुसलमान बताते थे'
भारत में करीब 40 हज़ार रोहिंग्या शरणार्थी है, जो विभिन्न राज्यों में बसे हैं. इनमें से क़रीब 16,000 के पास संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी संस्था के कार्ड भी हैं जो उन्हें रिफ़्यूजी के तौर पर भारत में रहने की इजाज़त देते हैं.
लेकिन भारत के गृह राज्य मंत्री किरण रिजूजू ने कहा था कि देश में मौजूद रोहिंग्या को वापस भेजा जाएगा. इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है.
बीते शुक्रवार को रोहिंग्या शरणार्थियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अगली सुनवाई तक इन्हें म्यांमार वापस न भेजने की बात कही है. सुनवाई 21 नवंबर के लिए स्थगित कर दी गई है.
उत्तम नगर के रोहिंग्या बस्ती के आसपास काम करने वाले लोगों का भी कहना है कि ये रोहिंग्या शरणार्थी पहले ख़ुद को मुसलमान बताते थे.
एक महिला ने बताया, "पहले ये लोग ख़ुद को मुसलमान बताते थे. सफ़ेद टोपी भी पहनते थे, मगर वो अब चर्च जाने लगे हैं."

निजी मामला
रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए काम करने वाली संस्थान ज़कात फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. सैयद ज़फर महमूद धर्म परिवर्तन को निजी मामला बताते हैं.
वो कहते हैं, "अगर रोहिंग्या ने खुद धर्म परिवर्तन का फ़ैसला लिया है तो यह उनका अधिकार है. हमारे भारत का संविधान भी इसकी इजाज़त देता है. जबरन या लालच देकर किसी का धर्म परिवर्तन कराया जाता है तो यह पूरी तरह ग़लत और असंवैधानिक है."
उन्होंने बताया कि वो संयुक्त राष्ट्र की रिफ़्यूजी एजेंसी की बैठक में भी हिस्सा लेते हैं, जिसमें तमाम संगठन (जो रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए काम करते हैं) भी भाग लेते हैं, लेकिन धर्म परिवर्तन का मुद्दा कभी नहीं उठा.
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