नज़रिया: क्या रोहिंग्या मसले पर भारत पीठ दिखा रहा है?

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- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अपने मुल्क म्यांमार में वो अनचाहे लोग हैं, उन्हें नागरिकता और बराबरी का दर्जा देने से इनकार किया जाता रहा है और उनके नाम पर लंबे समय से चले आ रहे विद्रोह से उनका जीना मुहाल हो गया है.
दूसरी तरफ़ बाहरी दुनिया में भी उनका कोई दोस्त नहीं है. अब भारत सरकार भी कह रही है कि देश में रहने वाले रोहिंग्या मुसलमान देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं.
इससे पहले इसी महीने की शुरुआत में एक सरकारी मंत्री ने ये कहकर बड़ा तूफ़ान खड़ा कर दिया था कि भारत से क़रीब 40,000 की रोहिंग्या मुसलमानों की आबादी को वापस भेज दिया जाएगा. हालांकि इसमें वो 16,000 लोग भी शामिल हैं, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र ने शरणार्थी के तौर पर पंजीकृत किया है.
अपने मुल्क में दमन से जान बचाकर भाग रहे रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार की बहुसंख्यक बौद्ध आबादी में अधिकांश लोग, बांग्लादेश से आए ग़ैरक़ानूनी प्रवासी मानते हैं. वहां इनकी कुल आबादी क़रीब 10 लाख थी.

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क्यों बढ़ा विवाद?
म्यांमार में लोगों का मानना है कि 1970 के दशक में रोहिंग्या का आना शुरू हुआ और वो पूरे देश में फैल गए. इनमें अधिकांश बहुत ही नारकीय स्थिति वाले कैंपों में रहते हैं.
लेकिन भारत सरकार की ये घोषणा ऐसे समय में हुई है, जब बहुतों का मानना है कि ये सही समय नहीं है. इसका कारण है कि म्यांमार के रख़ाइन प्रांत में हिंसा हो रही है और बीते अगस्त से, चार लाख से अधिक रोहिंग्या मुसलमान सीमा पार कर बांग्लादेश चले गए हैं.

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जब भारत सरकार की योजना के विरोध में याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया तो नरेंद्र मोदी की सरकार ने कहा कि उसके पास इस बात की ख़ुफ़िया जानकारी है कि इस समुदाय के कुछ सदस्यों के तार वैश्विक चरमपंथी संगठनों से जुड़े हुए हैं, जिनमें कुछ संगठन पाकिस्तान के हैं.
सरकार ने कोर्ट में कहा कि जो शरणार्थी यहां रह रहे हैं, वे राष्ट्रविरोधी और ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों में शामिल हैं और वो धार्मिक अशांति का कारण बन सकते हैं.

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अंतरराष्ट्रीय चरमपंथी संगठनों से नाता?
विश्लेषक मानते हैं कि म्यांमार के विद्रोही संगठन- अराकान रोहिंग्या सैल्वेशन आर्मी (आरसा) के भूमिगत सदस्यों के ख़तरे से इनकार नहीं किया जा सकता है.
रख़ाइन प्रांत में जो हिंसा का दौर जारी है, उसकी शुरुआत अगस्त में तब हुई जब हथियारबंद विद्रोहियों ने पुलिस चौकियों पर हमले कर 12 लोगों को मार डाला था.

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रिपोर्टों के अनुसार, इस ग्रुप के पास कम से कम 600 हथियारबंद लड़ाके हैं. बांग्लादेश के अधिकारियों का दावा है कि आरसा के संबंध प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन जमात-उल मुजाहिदीन बांग्लादेश (जेएमबी) से हैं.
जेएमबी को बीते जनवरी में ढाका के एक कैफ़े में हुए हमले का ज़िम्मेदार माना गया था, जिसमें 20 बंधकों की मौत हो गई थी. भारत सरकार मानना है कि आरसा जैसे गुट, क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा हो सकते हैं.
इस कदम का विरोध करने वालों को इस बात पर हैरानी है कि भारत सरकार ने जिन ख़ुफ़िया जानकारियों के आधार पर, भारत में रहने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों के संबंध को चरमपंथियों के साथ जोड़ने की बात कही है, वो कितनी भरोसेमंद है.
भारत की अंतरराष्ट्रीय संधियों के प्रति जवाबदेही है?
विश्लेषकों का कहना है कि भारत लंबे समय से पूर्वोत्तर में विद्रोही गुटों और मध्य भारत में माओवादियों लड़ रहा है और देश में यहां-वहां रह रही रोहिंग्या शरणार्थियों की आबादी की अपेक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा को उनसे ज़्यादा ख़तरा है.
कुछ लोग इस इस बात पर भी सवाल उठा रहे हैं कि सुरक्षा ख़तरे के नाम पर, कुछ लोगों के अपराध के लिए पूरी रोहिंग्या आबादी को सज़ा देना कहां तक उचित है.
दूसरी तरफ़ भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि रोहिंग्या शरणार्थी नहीं, बल्कि ग़ैरक़ानूनी प्रवासी हैं.
लेकिन आलोचकों का कहना है कि चूंकि भारत क़ानूनी तौर पर संयुक्त राष्ट्र के उस सिद्धांत के प्रति जवाबदेह है जिसके तहत कोई देश शरण चाहने वालों को ऐसी जगह वापस नहीं भेज सकता जहां उनकी जान ख़तरे में हो. उनका कहना है कि ऐसे में भारत सरकार के इस कदम का समर्थन नहीं किया जा सकता.
इसके अलावा भारत के संविधान में ये साफ़ तौर पर लिखा है कि 'लोगों के समूह के साथ बर्ताव करने में अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का पालन करने की कोशिश करेगा.'

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पहले भी आते रहे हैं शरणार्थी
एशिया में दुनिया के कुल विस्थापित लोगों की एक तिहाई यानी दो करोड़ आबादी है. शरणार्थियों की सुरक्षा के मामले में भारत का एक दिलचस्प रिकॉर्ड रहा है.
हालांकि भारत संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी संधि 1951 और इसके प्रोटोकॉल का हिस्सा नहीं है और इसकी कोई औपचारिक शरणार्थी नीति नहीं है, फिर भी शरणार्थी मामलों को लेकर संयुक्त राष्ट्र के उच्चायोग के मुताबिक, भारत में कुल दो लाख शरणार्थी हैं.
इसमें एक लाख चीन से आए तिब्बती और 60,000 श्रीलंका से आए तमिल हैं. इसी के साथ ही भारत राजनीतिक कारणों से भी शरणार्थियों को आने इजाज़त देता रहा है.
उदाहरण के लिए 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान पूर्वी पाकिस्तान से आए दसियों हज़ार शरणार्थियों को इसने अपने यहां आने की इजाज़त दी. इस युद्ध में भारत ने मुक्तिवाहिनी लड़ाकों को ट्रेनिंग और समर्थन भी दिया था. इसी युद्ध के बाद बांग्लादेश का जन्म हुआ था.
भारत में ये मुद्दा कैसे बना?
रिफ्यूजी इंटरनेशनल के पूर्व अध्यक्ष माइकल गेबाउडन की तरह कई लोगों का मानना है कि भारत ने आंतरराष्ट्रीय शरणार्थी प्रक्रिया पर आंशिक रूप से अविश्वास जताया है, क्योंकि अतीत में शरणार्थियों को इसने लिया है और इसकी वजह से उसकी तारीफ़ भी हुई है.
साल 2015 में भारतीय शोधकर्ताओं के एक समूह ने कहा था, "भारत में रोहिंग्या की छवि विदेशी, मुसलमान, देशविहीन, संदिग्ध बांग्लादेशी की है जो पूरे देश में फैले हुए हैं. इसकी वजह से उन्हें ग़ैरक़ानूनी, अनचाहा और सिरदर्द माना जाता है."
विश्लेषक सुबीर भौमिक कहते हैं कि इस वजह से भी ये, हिंदुत्ववादी राजनीति करने वालों को अपना जनाधार बढ़ाने का मुद्दा बन गया है.
वापस भेजना ठीक होगा?
वो कहते हैं, "याद करिए, पिछले आम चुनावों में मोदी और उनकी पार्टी ने कैसे बांग्लादेश के ग़ैरक़ानूनी प्रवासियों के मुद्दे को हवा दी थी?"
कई लोग इस बात से भी चिंतित हैं कि रोहिंग्या लोगों को म्यांमार वापस भेजने की बात हो रही है, जहां 'नस्लीय जनसंहार और मानवाधिकार उल्लंघन' के आरोप लग रहे हैं.
रिफ़्यूजी इंटरनेशनल के डेनियल सुलीवन का कहना है, "किसी देश का ये अधिकार और ज़िम्मेदारी है कि वो सुरक्षा कारणों पर विचार करे लेकिन इसे लोगों के एक पूरे समूह को ऐसी जगह वापस भेजने के मुद्दे से घालमेल नहीं किया जाना चाहिए जहां उनकी जान को ख़तरा और मानवाधिकार उल्लंघन, यहां तक कि मौत का सामना करना पड़े."
ये ऐसी बात है, जिसे भारत को अच्छी तरह समझने की ज़रूरत है.
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